Varanasi : उत्तर प्रदेश के काशी (वाराणसी) में सोमवार को शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद महाराज ने एक महत्वपूर्ण घोषणा की है। उन्होंने कहा कि वह अपनी नई सेना, जिसे ‘चतुरंगिणी सेना’ कहा जाएगा, का गठन करने जा रहे हैं। इस सेना का उद्देश्य गौ-रक्षा, धर्म रक्षा, शास्त्र रक्षा और मंदिर सुरक्षा है।शंकराचार्य ने बताया कि उनकी इस चतुरंगिणी सेना में कुल 2 लाख 18 हजार 700 सदस्यों को शामिल किया जाएगा। उन्होंने कहा कि अभी तक उन्होंने 27 सदस्यीय सेना के पदाधिकारियों की घोषणा भी कर दी है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि देशभर के लोग इस सेना में भाग ले सकते हैं।शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि यह सेना पीले वस्त्र में नजर आएगी और उनके हाथ में परशु (फरसा) होगा। उन्होंने सेना के संचालन के तरीके के बारे में भी बताया। उन्होंने कहा, “पहले टोको, यानी टोकेंगे. कहो कि यह गलत हो रहा है, नहीं माने तो रोको. भाई, आपको रुकना पड़ेगा. नहीं तो फिर ठोको.” इस ‘ठोको’ का अर्थ सीधे प्रहार करना नहीं है, बल्कि मुकदमा करना, शिकायत करना और पंचायत जैसी संवैधानिक तरीके अपनाना है।10 महीने में तैयार होगी चतुरंगिणी सेनाशंकराचार्य ने बताया कि यह चतुरंगिणी सेना माघ मेले में पूरी तरह तैयार हो जाएगी और अगले 10 महीनों के भीतर धरातल पर उतर जाएगी। उन्होंने इसका स्लोगन भी जारी किया है, जिसमें मुख्य उद्देश्य गौ रक्षा है। उन्होंने यह भी कहा कि 1 टीम में 10 लोग होंगे, यानी कुल 21,870 टीमें बनेंगी। अगर हर जिले में 27 टीमें यानी 270 लोग तैयार हो जाएं, तो कुल 2 लाख 16 हजार लोग सेना में शामिल हो सकते हैं।चतुरंगिणी सेना का अर्थ क्या है?‘चतुरंगिणी सेना’ का अर्थ है चार अंगों से मिलकर बनी सेना। इसमें पदाति (पैदल सैनिक), अश्व (घुड़सवार), रथ और गज (हाथी) शामिल हैं। प्राचीन भारत में यह सेना बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती थी। महाभारत और रामायण जैसे ग्रंथों में इसका उल्लेख मिलता है। वैदिक काल से इसकी शुरुआत मानी जाती है, और बाद में यह व्यवस्था और विकसित हुई। यह न केवल युद्ध कौशल का प्रतीक है, बल्कि प्राचीन भारतीय सैन्य संगठन और रणनीति की भी पहचान है।
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