Tuesday , September 1 2026

विधायिका की उपेक्षा से बेलगाम होती ब्यूरोक्रेसी

(डॉ. एस.के. गोपाल)

उत्तर प्रदेश की अट्ठारहवीं विधानसभा अब अपने अंतिम पड़ाव पर है। अगले छह-सात महीने में इसका कार्यकाल पूरा हो जाएगा। ऐसे में सरकार के कामकाज के साथ-साथ विधायिका की भूमिका और उसकी प्रभावशीलता का आकलन भी होना चाहिए। दुर्भाग्य से इस कार्यकाल में विधानसभा की संस्थागत शक्ति और कार्यपालिका के प्रति उसकी जवाबदेही सुनिश्चित करने की क्षमता को लेकर कई गंभीर प्रश्न खड़े हुए हैं।

विधानसभा में डिप्टी स्पीकर का संवैधानिक पद पिछले दो दशकों से सत्ता पक्ष की प्राथमिकताओं की उपेक्षा का शिकार है। सत्रहवीं विधानसभा में नितिन अग्रवाल डिप्टी स्पीकर बने थे लेकिन अट्ठारहवीं विधानसभा में इस पद का चुनाव ही नहीं हुआ। किसी संवैधानिक पद का लंबे समय तक रिक्त रहना केवल एक पद की अनुपस्थिति नहीं अपितु विधायी परंपराओं और संस्थागत संतुलन से जुड़ा विषय है।

विधानमंडलीय समितियां विधायिका की निगरानी व्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार हैं। सदन में हर विषय पर विस्तार से चर्चा संभव नहीं होती, इसलिए समितियां विभागों के कामकाज, जनहित के मामलों और प्रशासनिक निर्णयों की पड़ताल करती हैं। इनके माध्यम से कार्यपालिका की जवाबदेही सुनिश्चित होती है।

अट्ठारहवीं विधानसभा के आरंभ में काफी समय तक समितियां गठित ही नहीं हुईं। बाद में समितियां गठित हुईं, लेकिन उनकी कार्यशैली और लंबित मामलों के निस्तारण को लेकर संतोष का पर्याप्त आधार नहीं दिखाई देता। अनेक मामले लंबे समय तक अटके रहते हैं। विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना ने करीब दो दशक पुराने कानपुर के तत्कालीन विधायक सलिल विश्नोई के विशेषाधिकार हनन मामले में छह पुलिसकर्मियों को एक दिन के कारावास की सजा सुनाकर यह स्पष्ट संदेश दिया था कि विधायिका के विशेषाधिकारों की अवहेलना स्वीकार नहीं की जा सकती। इससे उम्मीद जगी थी कि कार्यपालिका भी विधायिका के अधिकारों और निर्णयों को अधिक गंभीरता से लेगी। लेकिन व्यापक स्तर पर अपेक्षित बदलाव अभी दिखाई नहीं देता।

वास्तविक चिंता यह है कि विधायिका कहीं स्वयं ही अपनी शक्ति को सीमित तो नहीं कर रही। सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों की जिम्मेदारी है कि सदन पर्याप्त समय तक चले और जनहित के प्रश्नों पर सार्थक बहस हो। विधानसभा चलेगी तो सरकार से प्रश्न पूछे जाएंगे, विभागों को उत्तर देना होगा और नीतियों तथा प्रशासनिक निर्णयों पर चर्चा होगी। सदन का समय सीमित होगा तो स्वाभाविक रूप से संसदीय निगरानी भी सीमित होगी। यही वह स्थिति है, जिसमें कार्यपालिका की जवाबदेही कमजोर पड़ने लगती है।

विधानसभा के नियम 51 और 301 के अंतर्गत उठाए जाने वाले मामलों को लेकर भी प्रभावी और समयबद्ध कार्रवाई की अपेक्षा रहती है। यदि याचिकाएं और संदर्भ ठोस परिणाम तक पहुंचने के बजाय औपचारिक निस्तारण तक सीमित हो जाएं तो विधायी प्रक्रिया की प्रभावशीलता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। विधायक द्वारा उठाया गया विषय व्यक्तिगत नहीं, जनता से जुड़ा हुआ विषय होता है। इसलिए उसका समाधान भी कागजी कार्रवाई से आगे जाना चाहिए।

उत्तर प्रदेश के सर्वश्रेष्ठ विधायक का पुरस्कार पाने वाले सरकार के वरिष्ठ मंत्री सुरेश कुमार खन्ना का लंबा विधायी अनुभव है। पक्ष और विपक्ष में उनका लंबा संसदीय अनुभव रहा है और पिछले लगभग साढ़े नौ वर्षों से वे संसदीय कार्य मंत्री हैं। ऐसे में उनसे यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि सरकार का पक्ष रखने के साथ-साथ वे विधायिका की संस्थागत गरिमा और सदस्यों के अधिकारों के संरक्षण की आवाज भी मजबूती से उठाएं।

जनसुनवाई पोर्टल भी शासन की जवाबदेही का महत्वपूर्ण माध्यम है। यदि शिकायतों का वास्तविक समाधान करने के बजाय औपचारिक या उल्टी-सीधी रिपोर्ट लगाकर प्रकरणों का निस्तारण कर दिया जाए तो आंकड़ों में व्यवस्था सफल दिखाई दे सकती है, लेकिन जनता के अनुभव में नहीं। शासन की कसौटी शिकायतों की संख्या घटाना नहीं, अपितु शिकायतों की वजह खत्म करना है।

प्रदेश की कई संस्थाएं भी अपेक्षित सक्रियता के साथ काम नहीं कर पा रही हैं। अनेक निगमों में महत्वपूर्ण पद रिक्त हैं। वर्ष 2022 में भोजपुरी, अवधी, ब्रज और बुंदेली अकादमियों की स्थापना की दिशा में पहल हुई, लेकिन ये संस्थाएं आज तक अपेक्षित स्वरूप में सामने नहीं आ सकीं। घोषणाओं और बजट प्रावधानों का वास्तविक संस्थागत परिणाम दिखाई देना चाहिए।

कागजों में दावे बड़े-बड़े हो सकते हैं, लेकिन शासन की वास्तविक परीक्षा धरातल पर होती है। प्राचीन काल में राजा भेष बदलकर प्रजा के बीच जाते और राजकाज की वास्तविक स्थिति का आकलन करते थे। आज ऐसी परंपरा संभव नहीं लेकिन शासन के मुखिया वास्तविकता जानने का कोई प्रभावी उपक्रम तो कर ही सकते हैं। दफ्तरों में तैयार रिपोर्ट और जनता के अनुभव के बीच का अंतर कम करना शासन की जिम्मेदारी है।

लोकतंत्र केवल चुनाव और बहुमत से सरकार बनाने का नाम नहीं है। उसकी असली शक्ति विधायिका की सक्रियता, कार्यपालिका की जवाबदेही और जनता के प्रति शासन के उत्तरदायित्व में निहित है। कार्यपालिका आवश्यक है और सक्षम भी होनी चाहिए, लेकिन वह निर्वाचित विधायिका का विकल्प नहीं हो सकती। इसलिए प्रश्न कार्यपालिका को कमजोर करने का नहीं, उसे विधायिका के प्रति जवाबदेह बनाए रखने का है। इसके लिए विधायिका को पहले स्वयं अपने अधिकारों और दायित्वों के प्रति सजग होना होगा। संवैधानिक पद रिक्त नहीं रहने चाहिए, समितियां प्रभावी ढंग से काम करें और विधायी प्रश्नों तथा याचिकाओं का समयबद्ध निस्तारण सुनिश्चित हो।

विधायिका मजबूत होगी तो कार्यपालिका लोकतांत्रिक शासन की सक्षम सहयोगी रहेगी। विधायिका कमजोर होगी तो कार्यपालिका का प्रभाव बढ़ना स्वाभाविक है। लोकतंत्र के संतुलन की रक्षा के लिए सबसे पहले विधायिका को अपनी शक्ति, गरिमा और संवैधानिक भूमिका को पहचानना होगा।

(लेखक डॉ. एस.के. गोपाल स्वतंत्र पत्रकार और विधायी मामलों के जानकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं)