भारत की उच्च शिक्षा का वास्तविक संकट
डॉ. राकेश कुमार यादव
भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था आज एक ऐसे गंभीर संकट से गुजर रही है, जिस पर अपेक्षित स्तर पर चर्चा नहीं हो रही है। हर वर्ष विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में प्रवेश लेने वाले छात्रों की संख्या बढ़ रही है, नए निजी विश्वविद्यालय स्थापित हो रहे हैं, आधुनिक कैंपस, स्मार्ट क्लासरूम और डिजिटल सुविधाओं का विस्तार हो रहा है। इसके बावजूद एक चिंताजनक सच्चाई लगातार सामने आ रही है—छात्र प्रवेश तो ले रहे हैं, लेकिन नियमित रूप से कक्षाओं में उपस्थित नहीं होना चाहते। स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि अनेक संस्थानों का बड़ा हिस्सा केवल छात्रों की उपस्थिति सुनिश्चित करने में ही व्यतीत हो रहा है। कहीं छात्रों और अभिभावकों को बार-बार फोन किए जा रहे हैं, कहीं बायोमेट्रिक उपस्थिति लागू की जा रही है, तो कहीं टेस्ट, असाइनमेंट और इंटरनल मार्क्स के दबाव के माध्यम से छात्रों को कक्षा में लाने का प्रयास किया जा रहा है। कई संस्थानों में परीक्षा से रोकने या प्लेसमेंट से वंचित करने जैसी चेतावनियाँ भी दी जा रही हैं। आज अनेक कॉलेजों में उपस्थिति प्रेरणा, जिज्ञासा और सीखने की इच्छा से नहीं, बल्कि डर और दबाव से संचालित हो रही है, और यहीं से उच्च शिक्षा का वास्तविक संकट प्रारम्भ होता है।
उपस्थिति की समस्या वास्तव में केवल उपस्थिति की समस्या नहीं है। अधिकांश शिक्षण संस्थान यह मानते हैं कि इसका समाधान कठोर अनुशासन, सख्त नियमों और निगरानी में छिपा है, लेकिन शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि कम उपस्थिति कोई मूल बीमारी नहीं, बल्कि उस गहरी समस्या का केवल एक लक्षण है जो आज की उच्च शिक्षा व्यवस्था में धीरे-धीरे बढ़ रही है। वास्तविक चुनौती यह है कि अनेक छात्र अपने कैंपस और शिक्षण वातावरण से भावनात्मक जुड़ाव महसूस नहीं करते। उन्हें कक्षाएँ नीरस, एकतरफा और केवल औपचारिकता जैसी लगती हैं। शिक्षा उन्हें वास्तविक जीवन, करियर और समाज से जुड़ी हुई दिखाई नहीं देती। कई संस्थानों में छात्रों को स्वतंत्र सोच, संवाद और अभिव्यक्ति का पर्याप्त अवसर नहीं मिलता, जबकि संस्थागत संस्कृति सहभागिता और विश्वास की बजाय नियंत्रण और अनुशासन पर अधिक केंद्रित दिखाई देती है। उत्तर भारत के एक वरिष्ठ प्रोफेसर के शब्दों में, “छात्र शिक्षा से नहीं भाग रहे, बल्कि ऐसे वातावरण से दूर जा रहे हैं जहाँ उन्हें केवल नियंत्रित किया जाता है, समझा नहीं जाता।” यही सोच आज उच्च शिक्षा के सामने खड़े सबसे बड़े प्रश्न को उजागर करती है।केस स्टडी
देश के अनेक निजी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में आज उपस्थिति को केवल शैक्षणिक अनुशासन का विषय नहीं माना जा रहा, बल्कि उसे सीधे इंटरनल मार्क्स, सेमेस्टर परीक्षा, प्रयोगशाला कार्य, प्लेसमेंट पात्रता और यहाँ तक कि स्कॉलरशिप से भी जोड़ दिया गया है। इसका परिणाम यह हुआ कि छात्र शारीरिक रूप से तो कक्षाओं में उपस्थित होने लगे, लेकिन शिक्षकों के अनुसार मानसिक रूप से वे अब भी अनुपस्थित रहते हैं। अनेक शिक्षक स्वीकार करते हैं कि बड़ी संख्या में छात्र केवल बायोमेट्रिक उपस्थिति दर्ज कराने के लिए कक्षा में आते हैं, जबकि उनकी वास्तविक सहभागिता लगातार कम होती जा रही है। कक्षा में संवाद, जिज्ञासा और रचनात्मकता घट रही है तथा मोबाइल और सोशल मीडिया पर मानसिक निर्भरता बढ़ती जा रही है। एक शिक्षक के शब्दों में, “कई बार छात्र हमारे सामने बैठे होते हैं, लेकिन उनका मन पूरी तरह कहीं और होता है।” यह स्थिति स्पष्ट रूप से दिखाती है कि डर और दबाव के माध्यम से उपस्थिति तो सुनिश्चित की जा सकती है, लेकिन सीखने की वास्तविक इच्छा, उत्साह और बौद्धिक जुड़ाव पैदा नहीं किया जा सकता।
शिक्षा मनोवैज्ञानिकों ने हाल के वर्षों में एक अत्यंत रोचक और महत्वपूर्ण तुलना प्रस्तुत की है। आज का छात्र घंटों कैफे में बैठ सकता है, पूरा दिन मॉल में व्यतीत कर सकता है, देर रात तक दोस्तों के साथ चर्चा कर सकता है, खेल मैदान में सक्रिय रह सकता है, सोशल मीडिया के लिए कंटेंट बना सकता है तथा संगीत, गेमिंग और डिजाइनिंग जैसी गतिविधियों में गहरी रुचि दिखा सकता है। लेकिन यही छात्र कई बार कक्षा में केवल एक घंटे तक ध्यान और रुचि बनाए रखने में संघर्ष करता दिखाई देता है। इसका कारण केवल पढ़ाई से दूरी नहीं, बल्कि वह वातावरण है जिसमें छात्र स्वयं को महसूस करता है। कैफे, खेल मैदान या रचनात्मक गतिविधियों में उसे स्वतंत्रता, संवाद, आत्म-अभिव्यक्ति, मानसिक सहजता, रचनात्मकता और अपनी पसंद का वातावरण मिलता है। इसके विपरीत अनेक शैक्षणिक परिसरों में आज भी प्रतिबंध, दबाव, एकतरफा संवाद, भय आधारित संस्कृति और अत्यधिक कठोर व्यवस्थाएँ प्रमुख रूप से दिखाई देती हैं। यही कारण है कि छात्र स्वाभाविक रूप से उन स्थानों की ओर आकर्षित होते हैं जहाँ वे स्वयं को अधिक जीवंत, स्वीकार्य और मानसिक रूप से स्वतंत्र महसूस करते हैं। यह तुलना स्पष्ट संकेत देती है कि शिक्षा का वास्तविक संकट केवल उपस्थिति का नहीं, बल्कि सीखने के वातावरण और संस्थागत संस्कृति का संकट है।
आज की उच्च शिक्षा व्यवस्था की सबसे बड़ी भूल यह प्रतीत होती है कि शिक्षा को केवल कक्षा, प्रयोगशाला और पाठ्यक्रम तक सीमित मान लिया गया है, जबकि वास्तविक शिक्षा का उद्देश्य इससे कहीं अधिक व्यापक होता है। सच्ची शिक्षा वह है जो छात्र के मानसिक, नैतिक और भावनात्मक विकास को मजबूत करे, उसमें नेतृत्व क्षमता विकसित करे, आत्मविश्वास बढ़ाए तथा संवेदनशीलता और सहानुभूति जैसे मानवीय गुणों का निर्माण करे। शिक्षा केवल जानकारी देने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि व्यक्तित्व निर्माण की सतत यात्रा है। दुर्भाग्यवश वर्तमान व्यवस्था में शिक्षा अक्सर उपस्थिति रजिस्टर, असाइनमेंट, प्रैक्टिकल फाइल, परीक्षा और अंकों तक सीमित होकर रह जाती है। परिणामस्वरूप छात्र डिग्री तो प्राप्त कर लेते हैं, लेकिन उनका समग्र व्यक्तित्व विकास अधूरा रह जाता है। वे ज्ञान तो अर्जित कर लेते हैं, परंतु जीवन के वास्तविक कौशल, मानवीय मूल्य, संवाद क्षमता और सामाजिक उत्तरदायित्व जैसी आवश्यक विशेषताओं से वंचित रह जाते हैं। यही कारण है कि आज उच्च शिक्षा को केवल अकादमिक उपलब्धि नहीं, बल्कि मानव विकास के व्यापक दृष्टिकोण से देखने की आवश्यकता है।
आज की नई पीढ़ी ऐसे दौर में जी रही है जहाँ इंटरनेट, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डिजिटल मीडिया और वैश्विक अवसरों ने सीखने की पूरी प्रक्रिया को बदल दिया है। आधुनिक छात्र अब केवल किताबों और पारंपरिक व्याख्यानों पर निर्भर नहीं है। वह यूट्यूब के माध्यम से नई स्किल्स सीख रहा है, ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से कोडिंग और तकनीकी ज्ञान प्राप्त कर रहा है, पॉडकास्ट से संचार कला और व्यक्तित्व विकास समझ रहा है तथा सोशल मीडिया के माध्यम से डिजाइनिंग, मार्केटिंग और रचनात्मक अभिव्यक्ति के नए आयाम खोज रहा है। ऐसे समय में यदि कक्षाएँ वास्तविक जीवन, उद्योग, तकनीक और व्यावहारिक अनुभवों से जुड़ी हुई नहीं होंगी, तो छात्रों का उनमें रुचि खो देना स्वाभाविक है। इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि छात्र सीखना नहीं चाहते, बल्कि इसका वास्तविक अर्थ यह है कि अनेक शिक्षण संस्थान अब भी पुराने ढांचे, पारंपरिक तरीकों और एकतरफा शिक्षण प्रणाली के माध्यम से नई पीढ़ी को शिक्षित करने का प्रयास कर रहे हैं। आज का छात्र केवल डिग्री नहीं, बल्कि अर्थपूर्ण, व्यावहारिक और जीवन से जुड़ी शिक्षा चाहता है, जो उसे भविष्य के लिए सक्षम और आत्मविश्वासी बना सके।
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य के विश्वविद्यालय केवल भवनों, नियमों और प्रशासनिक व्यवस्थाओं तक सीमित संस्थान नहीं होने चाहिए, बल्कि उन्हें एक जीवंत शैक्षणिक पारिस्थितिकी तंत्र के रूप में विकसित होना चाहिए। ऐसे कैंपस जहाँ छात्र केवल परीक्षा की तैयारी के लिए न आएँ, बल्कि सीखने, सोचने, संवाद करने और स्वयं को विकसित करने के लिए स्वाभाविक रूप से आकर्षित हों। भविष्य का आदर्श कैंपस वह होगा जहाँ छात्र पढ़ाई के साथ-साथ लाइब्रेरी में समय बिता सके, खेल और शारीरिक गतिविधियों में भाग ले सके, संगीत, कला और रचनात्मक अभिव्यक्ति के अवसर प्राप्त कर सके, स्टार्टअप, रिसर्च और इनोवेशन पर कार्य कर सके तथा मानसिक शांति और सकारात्मक सामाजिक वातावरण का अनुभव कर सके। ऐसे परिसरों में चर्चा समूह, ओपन इंटरैक्शन, सहयोगात्मक सीखने और बहुआयामी विकास की संस्कृति को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। वास्तव में अब सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि “छात्रों को जबरन कक्षा में कैसे लाया जाए?”, बल्कि यह होना चाहिए कि “ऐसा प्रेरणादायक और जीवंत कैंपस कैसे बनाया जाए जहाँ छात्र स्वयं आना चाहें?” यही सोच भविष्य की शिक्षा व्यवस्था की दिशा तय करेगी।
आज उच्च शिक्षा क्षेत्र में सबसे बड़ी कमी यदि किसी चीज़ की स्पष्ट रूप से दिखाई देती है, तो वह है बौद्धिक और मानवीय नेतृत्व की कमी। अनेक शिक्षण संस्थान अब मुख्य रूप से ब्रांडिंग, एडमिशन संख्या, रैंकिंग और प्रशासनिक नियंत्रण पर अधिक केंद्रित होते जा रहे हैं। आधुनिक भवन, आकर्षक विज्ञापन और तकनीकी सुविधाएँ शिक्षा की गुणवत्ता का विकल्प नहीं बन सकतीं, क्योंकि शिक्षा केवल प्रशासनिक प्रक्रियाओं से संचालित नहीं होती। एक सशक्त शिक्षण संस्थान के निर्माण के लिए ऐसे शिक्षाविदों की आवश्यकता होती है जो छात्रों के मनोविज्ञान को समझ सकें, अनुशासन और स्वतंत्रता के बीच संतुलन स्थापित कर सकें तथा ऐसा संवेदनशील और प्रेरणादायक वातावरण तैयार करें जहाँ सीखना स्वाभाविक अनुभव बन जाए। साथ ही संस्थानों को नवाचार, नैतिकता, संवाद और मानवीय मूल्यों को बढ़ावा देने वाली संस्कृति विकसित करनी होगी। वास्तव में एक विश्वविद्यालय को नियंत्रित फैक्ट्री जैसा नहीं, बल्कि विचार, रचनात्मकता और मानवीय विकास के केंद्र के रूप में महसूस होना चाहिए, जहाँ छात्र केवल डिग्री नहीं, बल्कि जीवन की दिशा प्राप्त करें।
भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था की चुनौती केवल कम उपस्थिति तक सीमित नहीं है, बल्कि उससे कहीं अधिक गहरी और व्यापक है। वास्तविक समस्या यह है कि अनेक शिक्षण संस्थान आज छात्रों को प्रेरित करने, उनसे भावनात्मक जुड़ाव स्थापित करने और उन्हें सीखने के प्रति उत्साहित करने में सफल नहीं हो पा रहे हैं। छात्रों को केवल उपस्थिति पूरी करने या दंड से बचने के लिए कैंपस नहीं आना चाहिए, बल्कि उन्हें इसलिए आना चाहिए क्योंकि संस्थान उन्हें समझते हैं, उनके व्यक्तित्व को विकसित करते हैं, उन्हें पहचान और अभिव्यक्ति का अवसर देते हैं तथा उनके जीवन को उद्देश्य प्रदान करते हैं। शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य केवल डिग्री प्रदान करना नहीं, बल्कि ऐसे संवेदनशील, नैतिक, रचनात्मक और जिम्मेदार नागरिक तैयार करना होना चाहिए जो समाज और राष्ट्र के विकास में सकारात्मक योगदान दे सकें। यह परिवर्तन कठोर नियमों, भय और दबाव से संभव नहीं है। इसके लिए शिक्षा व्यवस्था को अधिक मानवीय, सहानुभूतिपूर्ण और छात्र-केंद्रित बनाना होगा, जहाँ सीखना एक बोझ नहीं, बल्कि प्रेरणा और आत्म-विकास का माध्यम बन सके।

(लेखक डॉ. राकेश कुमार यादव, महर्षि यूनिवर्सिटी ऑफ इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी के एसोसिएट प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष (कंप्यूटर साइंस एंड इंजीनियरिंग), डिप्टी डीन, एमएसओईटी हैं और ये उनके निजी विचार हैं)
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