(डॉ. एस.के. गोपाल)
रीतिकाल के अनेक कवि श्रृंगार के अनूठे शिल्पी रहे हैं, किंतु घनानंद का स्थान उन सबसे अलग और विशिष्ट है। उन्होंने प्रेम का चित्रण केवल काव्य-कौशल के लिए नहीं किया, अपितु उसे जीवन की सबसे बड़ी साधना माना। उनके शब्दों में अलंकारों का चमत्कार नहीं, हृदय की धड़कन सुनाई देती है। यही कारण है कि उन्हें रीतिमुक्त काव्यधारा का सर्वश्रेष्ठ कवि माना जाता है।
घनानंद के जीवन के संबंध में प्रामाणिक ऐतिहासिक सामग्री अत्यंत अल्प उपलब्ध है। जो कुछ ज्ञात है, उसका बड़ा भाग साहित्यिक परंपराओं, लोकश्रुतियों और बाद के साहित्येतिहासकारों के विवरणों पर आधारित है। इसलिए उनके जीवन के अनेक प्रसंगों को इतिहास नहीं, अपितु लोकस्मृति के रूप में देखना अधिक उचित होगा।
अनेक साहित्येतिहासकारों के अनुसार घनानंद मुगल सम्राट मुहम्मद शाह रंगीला के दरबार से जुड़े थे और उन्हें मीर मुंशी अथवा खास-कलम माना जाता है। यद्यपि इस संबंध में कोई समकालीन शाही अभिलेख उपलब्ध नहीं है, फिर भी यह मत व्यापक रूप से स्वीकार किया जाता है।
घनानंद के जीवन की सबसे प्रसिद्ध कथा सुजान से जुड़ी है। उनकी अनेक रचनाओं में सुजान का उल्लेख मिलता है। इसी आधार पर जनश्रुति प्रचलित हुई कि सुजान दिल्ली दरबार की एक रूपवती नर्तकी अथवा गणिका थी और घनानंद उससे गहरा प्रेम करते थे। कुछ विद्वान सुजान को वास्तविक स्त्री मानते हैं, जबकि अन्य उसे प्रेम का प्रतीक या कवि की काव्य-कल्पना मानते हैं। इस प्रश्न का कोई अंतिम ऐतिहासिक उत्तर उपलब्ध नहीं है।
लोकश्रुति के अनुसार एक दिन किसी दरबारी ने बादशाह से कहा कि घनानंद अत्यंत मधुर गायक हैं। बादशाह ने उन्हें गाने का आदेश दिया किंतु उन्होंने विनम्रतापूर्वक स्वयं को केवल एक मुंशी बताया। तब किसी ने सुझाव दिया कि यदि सुजान को बुला लिया जाए तो घनानंद स्वयं गाने लगेंगे।
बादशाह के आदेश पर सुजान दरबार में आई। कहा जाता है कि उसे देखते ही घनानंद का स्वर फूट पड़ा। ऐसा राग बिखरा कि पूरा दरबार मंत्रमुग्ध हो गया। किंतु प्रेम में डूबे कवि को यह ध्यान ही न रहा कि वह राजदरबार में है। उसकी दृष्टि केवल सुजान पर टिकी रही और उसकी पीठ बादशाह की ओर हो गई। राजदरबार की मर्यादा में यह गंभीर अपराध माना जाता था।
कथा आगे कहती है कि गायन समाप्त होने पर बादशाह ने पुरस्कार माँगने को कहा। घनानंद ने उत्तर दिया कि मुझे तो केवल सुजान चाहिए। लोककथा के अनुसार सुजान ने उनके साथ जाने से इंकार कर दिया। कहते हैं कि इस घटना ने घनानंद के जीवन की दिशा ही बदल दी। उन्होंने दिल्ली छोड़ दी और वृंदावन आकर बस गए। इतिहास इन घटनाओं की पुष्टि नहीं करता किंतु उनकी कविता में व्याप्त विरह की गहन अनुभूति इस लोककथा को भावनात्मक विश्वसनीयता अवश्य प्रदान करती है।
वृंदावन में उनका प्रेम एक नई ऊँचाई प्राप्त करता है। व्यक्तिगत अनुराग धीरे-धीरे कृष्ण-प्रेम और भक्ति में रूपांतरित होने लगता है। उनके काव्य में लौकिक और अलौकिक प्रेम का जो अद्भुत समन्वय दिखाई देता है, वह हिंदी साहित्य में विरल है।
घनानंद का प्रेम-दर्शन उनकी इन अमर पंक्तियों में साकार हो उठता है- अति सूधो सनेह को मारग है/जहाँ नेकु सयानप बाँक नहीं/तुम कौन धौं पाटी पढ़े हो लला/मन लेहु पै देहु छटांक नहीं। प्रेम के मार्ग में चतुराई, तर्क और स्वार्थ का कोई स्थान नहीं है; वहाँ केवल निष्कपट समर्पण ही स्वीकार्य है।
एक अन्य कवित्त में वे अपने हृदय की करुण पुकार व्यक्त करते हैं- परकारज देह को धारें फिरौ/परजन्य जथारथ ह्वै दरसौ/निधि-नीर सुधा के समान करौ/सबही बिधि सज्जनता सरसौ/घनआनंद जीवनदायक हौ/कछु मेरी हू पीर हिये सरसौ/कबहूँ वा बिसासी सुजान के
आँगन मो असुअनहि लै बरसौ। यह केवल विरह नहीं, बल्कि अपने आँसुओं को भी प्रिय के आँगन तक पहुँचा देने की करुण अभिलाषा है।
घनानंद का आत्मविश्वास और काव्य-दर्शन उनकी एक अत्यंत प्रसिद्ध पंक्ति में भी झलकता है- लोग हैं लागि कवित्त बनावत/मोहि तो मेरे कवित्त बनावत। यहाँ कवि मानो कह रहा है कि अन्य लोग कविता रचते हैं, किंतु उसकी अपनी पीड़ा ही कविता बनकर उसे नया स्वरूप देती है।
घनानंद की प्रमुख कृतियों में सुजानहित, वियोगबेली, प्रेमपत्रिका, इश्कलता, रसकेलिवल्ली, कृपाकंद, प्रेमसरोवर तथा व्रजविलास का उल्लेख मिलता है। इनमें प्रेम, विरह, भक्ति और मानवीय संवेदना का अद्वितीय संगम दिखाई देता है। विशेष रूप से सुजानहित को उनकी प्रतिनिधि कृति माना जाता है।
घनानंद के जीवन के अंतिम दिनों को लेकर भी एक अत्यंत मार्मिक जनश्रुति प्रचलित है। कहा जाता है कि 1757 ई. में अहमदशाह अब्दाली के वृंदावन आक्रमण के समय किसी ने सैनिकों से कह दिया कि बादशाह का पूर्व मीर मुंशी घनानंद अपार धन लेकर यहाँ आया है। सैनिकों ने उनसे धन की माँग की- ज़र! ज़र! लोककथा के अनुसार घनानंद ने वृंदावन की रज अपनी हथेली में उठाकर कहा- यही रज मेरा धन है। सैनिक उनकी भावना न समझ सके। जनश्रुति कहती है कि उन्होंने घनानंद पर अत्याचार किया और उन्हें गंभीर रूप से घायल कर दिया। एक कथा यह भी कहती है कि उनके हाथ काट दिए गए। मृत्यु के अंतिम क्षणों में उन्होंने अपनी प्रिय सुजान का स्मरण करते हुए कहा- प्रान करत प्रयान आज/चाहन चलत ये संदेसौ लै सुजान कौ। इस प्रसंग का ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है किंतु लोकस्मृति में यह कथा आज भी उतनी ही श्रद्धा और करुणा के साथ सुनाई जाती है।
घनानंद का जीवन चाहे इतिहास के लिए अनेक प्रश्न छोड़ता हो, किंतु उनका काव्य किसी प्रमाण का मोहताज नहीं। उन्होंने प्रेम को भोग नहीं, साधना बनाया, विरह को दुर्बलता नहीं, आत्मा की सबसे बड़ी शक्ति माना। यही कारण है कि रीतिकाल के असंख्य कवियों के बीच घनानंद आज भी अपनी अलग पहचान बनाए हुए हैं। वृंदावन की रज में उन्हें धन दिखाई देता था और प्रेम में परम सत्य। संभवतः इसी कारण उनकी कविता आज भी पाठकों के हृदय को उसी तरह स्पर्श करती है, जैसे तीन शताब्दियों पहले करती थी। इतिहास चाहे मौन रहे, किंतु घनानंद का काव्य आज भी प्रेम, विरह और समर्पण की सबसे प्रामाणिक गवाही देता है।

Telescope Today | टेलीस्कोप टुडे Latest News & Information Portal