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फाइलों में दबी योजनाओं की अनसुनी आवाज़

(डा. एस.के. गोपाल)

राज्य की विकास यात्रा केवल नीतियों और घोषणाओं से आगे नहीं बढ़ती अपितु उनके प्रभावी क्रियान्वयन से ही सार्थक होती है। उत्तर प्रदेश जैसे विशाल और विविधतापूर्ण राज्य में सरकारी योजनाओं का महत्व और भी बढ़ जाता है क्योंकि ये योजनाएं समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचने का माध्यम होती हैं। किंतु दुर्भाग्यवश योजनाओं के क्रियान्वयन में लापरवाही, उदासीनता और प्रशासनिक जड़ता की शिकायतें लगातार सामने आती रहती हैं। यह स्थिति न केवल योजनाओं की उपयोगिता पर प्रश्नचिह्न लगाती है, शासन-प्रशासन की विश्वसनीयता को भी प्रभावित करती है।

यह कटु सत्य है कि वर्षभर निष्क्रियता का आलम बना रहता है और जैसे ही वित्तीय वर्ष का अंतिम महीना अर्थात मार्च आता है, अचानक गतिविधियों में तेजी आ जाती है। इसे सामान्य बोलचाल में मार्च रश कहा जाता है। इस समय योजनाओं की गुणवत्ता, पारदर्शिता और वास्तविक जरूरतों की अनदेखी कर केवल बजट खपाने की प्रवृत्ति हावी हो जाती है। यह प्रवृत्ति किसी भी दृष्टि से उचित नहीं कही जा सकती। योजनाओं का उद्देश्य केवल धन खर्च करना नहीं बल्कि समाज में ठोस और सकारात्मक बदलाव लाना होता है।

उत्तर प्रदेश में किशोर एवं बाल पुस्तकालयों की स्थापना की महत्वाकांक्षी योजना इसका एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। इस योजना का उद्देश्य बच्चों और किशोरों में पठन-पाठन की संस्कृति विकसित करना, उन्हें ज्ञान और संस्कारों से जोड़ना तथा डिजिटल युग में पुस्तकों के प्रति उनकी रुचि को बनाए रखना था। यह योजना निस्संदेह दूरदर्शी और समाजोपयोगी है। किंतु इसके क्रियान्वयन की स्थिति निराशाजनक है। दो वर्षों से अधिक समय बीत जाने के बावजूद कई जनपदों में यह योजना अधूरी पड़ी है, जबकि कुछ स्थानों पर ही इसका आंशिक क्रियान्वयन हो सका है। यह असमानता प्रशासनिक इच्छाशक्ति पर गंभीर प्रश्न खड़े करती है।

समस्या केवल धीमी गति की नहीं है, प्रक्रिया में व्याप्त अनियमितताओं की भी है। जैम पोर्टल के माध्यम से खरीददारी को पारदर्शी बनाने का प्रयास किया गया था लेकिन व्यवहार में यह प्रक्रिया कई बार जटिल और सीमित प्रतिस्पर्धा वाली बन गई है। निविदाओं की शर्तें इस प्रकार बनाई जाती हैं कि छोटे और स्थानीय प्रकाशक या विक्रेता उसमें भाग ही न ले सकें। परिणामस्वरूप कुछ चुनिंदा बड़े आपूर्तिकर्ताओं का वर्चस्व स्थापित हो जाता है। यह स्थिति न केवल प्रतिस्पर्धा को बाधित करती है बल्कि स्थानीय स्तर पर उपलब्ध उत्कृष्ट साहित्य को भी नजरअंदाज कर देती है।

पुस्तकों के चयन में मनमानी के आरोप भी कम गंभीर नहीं हैं। बाल एवं किशोर पुस्तकालयों के लिए पुस्तकों का चयन अत्यंत संवेदनशील कार्य है क्योंकि यही सामग्री बच्चों के बौद्धिक और नैतिक विकास की दिशा तय करती है। यदि चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता और विशेषज्ञता का अभाव होगा तो पुस्तकालयों का उद्देश्य ही विफल हो जाएगा। यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि पुस्तकों का चयन शिक्षाविदों, साहित्यकारों और बाल मनोविज्ञान के जानकारों की समिति द्वारा किया जाए न कि केवल प्रशासनिक सुविधा के आधार पर। साथ ही, क्षेत्रीय भाषाओं और लोक साहित्य को भी पर्याप्त स्थान मिलना चाहिए, ताकि बच्चों का जुड़ाव अपनी जड़ों से बना रहे।

राज्य स्तर पर जारी शासनादेशों की अनदेखी और पर्यवेक्षण की कमी भी इस समस्या को और जटिल बना रही है। योजनाओं के क्रियान्वयन में नियमित मॉनिटरिंग और मूल्यांकन की व्यवस्था अत्यंत आवश्यक होती है। यदि उच्च स्तर पर निगरानी का अभाव होगा तो निचले स्तर पर लापरवाही स्वाभाविक हो जाती है। कुछ मंडलों में समीक्षाएं हुई हैं और कुछ अधिकारियों के निलंबन जैसी कार्रवाई भी सामने आई है लेकिन यह कार्रवाई व्यापक स्तर पर प्रभावी नहीं दिखती। अधिकांश जनपदों में स्थिति यथावत बनी हुई है जो प्रशासनिक तंत्र की जवाबदेही पर प्रश्न उठाती है।

राजकीय पुस्तकालयों आदि के लिए विविध मदों से पुस्तकों की खरीद में भी गड़बड़ियों के आरोप चिंता का विषय हैं। वर्षों तक फाइलों में अटकी रहने वाली खरीद प्रक्रिया अचानक मार्च में सक्रिय हो जाती है और आनन-फानन में औपचारिकताएं पूरी कर बजट खर्च कर दिया जाता है। इस प्रक्रिया में गुणवत्ता और उपयोगिता की अनदेखी होना स्वाभाविक है। पुस्तकालय केवल पुस्तकों का भंडार नहीं होते अपितु वे ज्ञान, संवाद और बौद्धिक विकास के केंद्र होते हैं। यदि वहां अनुपयुक्त या कम उपयोगी सामग्री पहुंचती है तो यह पूरे समाज के बौद्धिक विकास के साथ अन्याय है।

यह प्रश्न भी महत्वपूर्ण है कि आखिर ऐसी स्थिति क्यों उत्पन्न होती है? इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं। जवाबदेही की कमी, कार्य के प्रति उदासीनता, भ्रष्टाचार या फिर प्रशासनिक तंत्र की जटिलता। कई बार अधिकारियों पर कार्य का अत्यधिक बोझ भी होता है जिससे प्राथमिकताएं गड़बड़ा जाती हैं। किंतु इन कारणों को आधार बनाकर लापरवाही को उचित नहीं ठहराया जा सकता। प्रशासनिक सेवा का मूल उद्देश्य ही जनहित है।

समाधान की दिशा में सबसे पहले योजनाओं के क्रियान्वयन में समयबद्धता सुनिश्चित की जानी चाहिए। प्रत्येक चरण के लिए स्पष्ट समय-सीमा तय हो और उसके पालन की जिम्मेदारी निश्चित की जाए। दूसरे, पारदर्शिता को बढ़ावा देने के लिए सभी प्रक्रियाओं को सार्वजनिक किया जाए। डिजिटल प्लेटफॉर्म का उपयोग केवल औपचारिकता तक सीमित न रहे बल्कि उसे प्रभावी निगरानी और जन-सहभागिता के उपकरण के रूप में विकसित किया जाए।

तीसरे, स्थानीय स्तर पर सहभागिता को बढ़ावा दिया जाए। पुस्तकालयों की स्थापना और संचालन में स्थानीय शिक्षकों, अभिभावकों, साहित्यकारों और सामाजिक संगठनों को जोड़ा जाए। इससे न केवल पारदर्शिता बढ़ेगी बल्कि योजनाओं की उपयोगिता भी सुनिश्चित होगी। चौथे, पुस्तकों के चयन के लिए एक स्वतंत्र और विशेषज्ञ समिति का गठन किया जाए जो गुणवत्ता, विविधता और प्रासंगिकता को प्राथमिकता दे।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जवाबदेही तय की जाए। यदि किसी अधिकारी या विभाग की लापरवाही के कारण योजना प्रभावित होती है तो उसके विरुद्ध सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। निलंबन जैसी कार्रवाई केवल प्रतीकात्मक न रहकर एक स्पष्ट संदेश दे कि लापरवाही किसी भी स्तर पर स्वीकार्य नहीं है। साथ ही, उत्कृष्ट कार्य करने वाले अधिकारियों को प्रोत्साहित करने की व्यवस्था भी होनी चाहिए ताकि सकारात्मक प्रतिस्पर्धा विकसित हो।

यह समझना होगा कि योजनाएं केवल सरकारी दस्तावेज नहीं, जनता के विश्वास का प्रतीक होती हैं। जब योजनाएं धरातल पर उतरती हैं तभी जनता को यह महसूस होता है कि शासन उनके जीवन को बेहतर बनाने के लिए प्रतिबद्ध है। किशोर एवं बाल पुस्तकालयों की योजना केवल एक परियोजना नहीं, भविष्य की पीढ़ी के बौद्धिक और सांस्कृतिक निर्माण का आधार है। इसे फाइलों में उलझाकर या औपचारिकताओं में सीमित कर देना एक गंभीर चूक होगी।

राज्य सरकार को इस दिशा में ठोस, पारदर्शी और परिणामोन्मुखी कदम उठाने होंगे। योजनाओं का भाग्य फाइलों में नहीं, बल्कि उनके प्रभावी और ईमानदार क्रियान्वयन में तय होता है। यदि यह सुनिश्चित किया जाए कि हर योजना समय पर, गुणवत्ता के साथ और जनहित को केंद्र में रखकर लागू हो तो उत्तर प्रदेश न केवल विकास के नए आयाम स्थापित करेगा अपितु सुशासन का एक सशक्त और अनुकरणीय उदाहरण भी प्रस्तुत करेगा।

(लेखक डा. एस.के. गोपाल स्वतंत्र पत्रकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं)