Sunday , April 12 2026

अभी न जाओ छोड़कर कि दिल अभी भरा नहीं

संगीत के आशा युग का अवसान

(डॉ. एस.के. गोपाल)

भारतीय संगीत जगत के लिए 12 अप्रैल का दिन गहरे शोक और स्मरण का दिन बन गया। भारतीय चित्रपट जगत की मशहूर पार्श्वगायिका आशा भोंसले ने सदा के लिए अपनी आंखें मूंद लीं। परंतु यह कहना अधूरा होगा कि वे चली गईं। वे अपने सुरों में, अपने गीतों में, हमारी स्मृतियों में सदा जीवित रहेंगी। उनका स्वर केवल ध्वनि नहीं अपितु भावनाओं का ऐसा प्रवाह था जिसने पीढ़ियों को जोड़ा, संवेदनाओं को दिशा दी और जीवन के हर रंग को संगीत में ढाल दिया। उनके जाने की खबर ने संगीत जगत को स्तब्ध कर दिया किंतु उसी क्षण उनके गीतों की अनुगूंज ने यह विश्वास भी जगाया कि कुछ आवाज़ें समय की सीमाओं में नहीं बंधतीं। वे पीढ़ियों के बीच सेतु बनकर जीवित रहती हैं और आशा भोंसले का स्वर ऐसा ही एक सेतु था, जो अतीत, वर्तमान और भविष्य को जोड़ता है।

आशा भोंसले केवल एक पार्श्वगायिका नहीं थीं वे भावों की अनंत साधिका थीं। उन्होंने प्रेम, विरह, उल्लास, वेदना, चंचलता और भक्ति, हर भाव को अपनी आवाज़ में इस प्रकार ढाला कि वह श्रोता के भीतर उतरकर उसकी अपनी अनुभूति बन जाता था। अभी न जाओ छोड़कर में प्रेम की कोमलता और बिछुड़ने की कसक है, पिया तू अब तो आजा में जीवंत चंचलता और उन्मुक्त ऊर्जा, तो दिल चीज़ क्या है में उनकी नज़ाकत और शास्त्रीय गरिमा का अद्भुत संतुलन दिखाई देता है। इन आंखों की मस्ती के मस्ताने हजारों हैं में भाव की गहराई है, जो सीधे आत्मा को स्पर्श करती है। यही बहुरंगी स्वर-संसार उन्हें विशिष्ट बनाता है। वे केवल गीत नहीं गाती थीं बल्कि हर बार एक नई अनुभूति रचती थीं, एक ऐसा भावलोक निर्मित करती थीं जिसमें श्रोता स्वयं को विलीन पाता था।

आशा जी के गीतों की सबसे बड़ी शक्ति यह थी कि वे जीवन के हर मोड़ पर हमारे साथ खड़े रहते थे। सुख के क्षणों में उनके स्वर आनंद को और अधिक गहरा करते थे तो दुख के समय वही आवाज़ संबल बन जाती थी। ये मेरा दिल प्यार का दीवाना जैसी चंचलता जीवन की सहजता का बोध कराती है, तो चुरा लिया है तुमने जो दिल को में प्रेम की मधुरता और आत्मीयता झलकती है। रात अकेली है में एकाकीपन की धड़कन सुनाई देती है, जबकि दम मारो दम में समय की युवा चेतना और उन्मुक्तता का विस्फोट दिखाई देता है। ओ मेरे सोना रे और जाने जान ढूंढता फिर रहा जैसे गीतों में उनकी आवाज़ एक अलग ही सहजता और आत्मीयता के साथ सामने आती है। यही कारण है कि उनके गीत केवल मनोरंजन नहीं रहे बल्कि जीवन के अनुभव बन गए। ऐसे अनुभव जो हर सुनने वाले के भीतर अलग-अलग रूपों में आकार लेते रहे।

आशा भोंसले की गायकी की सबसे बड़ी विशेषता उनकी अद्भुत बहुमुखी प्रतिभा थी। वे हर शैली में समान अधिकार के साथ गाती थीं और हर शैली को अपनी विशिष्ट पहचान देती थीं। ये है रेशमी जुल्फों का अंधेरा में उनकी स्वर-माधुरी श्रोताओं को सम्मोहित कर देती है तो दिलबर दिल से प्यारे में वही स्वर अपनापन और स्नेह से भर उठता है। उन्होंने शास्त्रीयता, लोकधुन, फिल्मी संगीत, ग़ज़ल और आधुनिक प्रयोगों के बीच एक अद्भुत संतुलन स्थापित किया। उनकी आवाज़ में तकनीकी निपुणता थी किंतु उससे कहीं अधिक भाव की गहराई थी। ऐसा प्रतीत होता था मानो वे प्रत्येक श्रोता से सीधा संवाद कर रही हों। उनके गीत केवल सुने नहीं जाते थे अपितु अनुभव किए जाते थे। यही कारण है कि उनका हर गीत समय के साथ और अधिक प्रासंगिक होता चला गया। उनका संगीत केवल एक युग का नहीं बल्कि अनेक युगों का प्रतिनिधि बन गया।

आज जब वे हमारे बीच नहीं हैं, तो एक गहरी रिक्तता का बोध स्वाभाविक है। यह केवल एक महान गायिका का जाना नहीं बल्कि उस युग का मौन हो जाना है जिसने संगीत को नई ऊँचाइयाँ दीं। गीतों के रूप में उनकी उपस्थिति सदा बनी रहेगी। जब भी उनके गीत गूंजेंगे, ऐसा प्रतीत होगा मानो वे यहीं कहीं आसपास हैं। अपने सुरों के साथ, अपनी सहज मुस्कान के साथ।

(लेखक डा. एस. के. गोपाल कला समीक्षक, साहित्यकार और स्वतंत्र पत्रकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)