लखनऊ (टेलीस्कोप टुडे संवाददाता)। भारतीय इतिहास के सबसे विवादित प्रश्नों में से एक है- शूद्र कौन थे और उनकी वास्तविक सामाजिक स्थिति क्या थी? लेखक मिथिलेश कुमार सिंह की पुस्तक “शूद्रों का सच” इसी प्रश्न की गहन और शोधपरक पड़ताल करती है। यह कृति उन स्थापित धारणाओं को चुनौती देती है, जिनमें शूद्रों को पराजित, अनार्य अथवा जन्मजात रूप से निम्न वर्ग के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
पुस्तक वैदिक साहित्य, स्मृति ग्रंथों, रामायण-महाभारत तथा आधुनिक इतिहासकारों के अध्ययन के आधार पर यह तर्क प्रस्तुत करती है कि शूद्रों की स्थिति भारतीय समाज प्रायः वैसी नहीं थी जैसा दिखलाया जाता है। बल्कि वे कृषि, शिल्प, व्यापार, प्रशासन और सैन्य क्षेत्र में सक्रिय भूमिका निभाने वाली एक सशक्त सामाजिक शक्ति थे।

लेखक अनेक मानक ऐतिहासिक स्रोतों के आधार पर शूद्रों की उत्पत्ति, वर्ण व्यवस्था, दास प्रथा, अस्पृश्यता और औपनिवेशिक इतिहास-लेखन की धारणाओं की आलोचनात्मक समीक्षा करते हैं। यह पुस्तक इतिहास के उन मौन कराए गए पक्षों को सामने लाने का प्रयास करती है, जिन्हें लंबे समय तक उपेक्षित या विकृत रूप में प्रस्तुत किया गया।
“शूद्रों का सच” केवल अतीत का अध्ययन नहीं, बल्कि भारतीय समाज में सामाजिक समरसता, ऐतिहासिक सत्य और बौद्धिक संवाद की नई संभावनाओं को खोलने वाली एक महत्वपूर्ण कृति है।
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