नई दिल्ली (टेलीस्कोप टुडे संवाददाता)। वैश्विक बायोफार्मास्यूटिकल अग्रणी कंपनी एबवी ने ग्लूकोमा जागरूकता हेतु राष्ट्रीय मीडिया कॉन्क्लेव #DefeatGlaucoma का आयोजन इंडिया हैबिटेट सेंटर, नई दिल्ली में विश्व ग्लूकोमा सप्ताह के दौरान किया। ताकि ग्लूकोमा पर ध्यान आकृष्ट किया जा सके। जो विश्व स्तर पर अपरिवर्तनीय अंधेपन के प्रमुख कारणों में से एक है। इस कॉन्क्लेव में प्रमुख ग्लूकोमा विशेषज्ञों और नेत्र चिकित्सकों को एक मंच पर लाया गया। ताकि रोग के कारण होने वाली दृष्टि हानि को रोकने के लिए शीघ्र पहचान, नियमित नेत्र जाँच और समय पर उपचार के महत्व के प्रति जागरूकता बढ़ाई जा सके।
भारत में, ग्लूकोमा से अनुमानित 1.2 करोड़ लोग प्रभावित हैं, जिससे देश विश्व स्तर पर सर्वाधिक प्रभावित देशों में से एक है। चिंताजनक रूप से, ग्लूकोमा के लगभग 90% मामले अभी भी निदान नहीं हो पाए हैं। क्योंकि प्रारंभिक अवस्था में यह रोग बिना किसी स्पष्ट लक्षण के चुपचाप बढ़ता रहता है। कॉन्क्लेव में विशेषज्ञों ने इस बात पर जोर दिया कि समय पर निदान और उपचार के अभाव में ग्लूकोमा अपरिवर्तनीय दृष्टि हानि का कारण बन सकता है। जन स्वास्थ्य चुनौती के रूप में ग्लूकोमा से निपटने की बढ़ती आवश्यकता है, जिसके लिए आम जनता, स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं और बहु-स्तरीय नेत्र स्वास्थ्य सेवा तंत्र को शामिल करते हुए समन्वित प्रयासों की जरूरत है।
सुरेश पट्टाथिल (प्रबंध निदेशक एवं महाप्रबंधक, एबवी इंडिया) ने कहा, “ग्लूकोमा को अक्सर ‘दृष्टि का मूक चोर’ कहा जाता है, क्योंकि कई मरीज़ तब तक रोग से अनजान रहते हैं, जब तक काफी हद तक दृष्टि हानि न हो जाए। एबवी में, वैश्विक स्तर पर 75 वर्षों से अधिक की नेत्र देखभाल विशेषज्ञता का लाभ उठाते हुए, हम नेत्र देखभाल को आगे बढ़ाने और मरीज़ों के परिणामों को बेहतर बनाने के प्रति गहराई से प्रतिबद्ध हैं। इस कॉन्क्लेव जैसी पहलों के माध्यम से, हम न केवल शीघ्र पहचान के बारे में जागरूकता सुदृढ़ करना चाहते हैं बल्कि नियमित नेत्र जाँच को भी प्रोत्साहित करना चाहते हैं। हम प्रयासरत हैं कि अधिक से अधिक लोग अपनी दृष्टि की रक्षा कर सकें, अपने जीवन की गुणवत्ता को सुरक्षित रख सकें और #DefeatGlaucoma के मिशन में हमारे साथ जुड़ सकें।”
कॉन्क्लेव में ग्लूकोमा देखभाल के प्रमुख विशेषज्ञों के साथ एक ज्ञानवर्धक पैनल चर्चा का आयोजन किया गया। जिसमें डॉ. सुनीता दुबे (एसोसिएट मेडिकल डायरेक्टर, ग्लूकोमा सेवाओं की प्रमुख और क्वालिटी एश्योरेंस की चेयरपर्सन, डॉ. श्रॉफ चैरिटी आई हॉस्पिटल), डॉ. हर्ष कुमार (मोतियाबिंद और ग्लूकोमा विशेषज्ञ, सेंटर फॉर साइट, दिल्ली), डॉ. रमनजीत सिहोता (ग्लूकोमा विशेषज्ञ, श्रॉफ आई सेंटर) शामिल रहे। सत्र का संचालन डॉ. देवेन तुली (ग्लूकोमा विशेषज्ञ, नेत्रम आई फाउंडेशन) द्वारा किया गया।

प्रतिभागियों को ग्लूकोमा के वास्तविक जीवन पर पड़ने वाले प्रभाव को बेहतर ढंग से समझाने के लिए, कार्यक्रम की शुरुआत एक ग्लूकोमा विज़न एक्सपीरियंस डेमॉन्स्ट्रेशन से हुई। जिससे प्रतिभागी इस रोग से पीड़ित लोगों द्वारा अनुभव की जाने वाली दृश्य सीमाओं का अनुभव कर सकें। इस गतिविधि ने लोगों को यह प्रत्यक्ष अनुभव करने का अवसर दिया कि ग्लूकोमा किस प्रकार परिधीय दृष्टि को क्रमशः प्रभावित करता है, जिससे शीघ्र जाँच के महत्व को और अधिक बल मिला।
कॉन्क्लेव में बोलते हुए, डॉ. सुनीता दुबे ने समय पर निदान के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा, “ग्लूकोमा अक्सर धीरे-धीरे विकसित होता है और कोई स्पष्ट लक्षण नहीं दिखाता, यही कारण है कि कई मरीज़ों के रोग का तब तक पता नहीं चल पता जब तक अपरिवर्तनीय क्षति न हो जाए। विशेष रूप से 40 वर्ष की आयु के बाद नियमित नेत्र जाँच शीघ्र पहचान और दृष्टि संरक्षण के लिए आवश्यक है।”
डॉ. हर्ष कुमार ने बेहतर जागरूकता और स्क्रीनिंग प्रथाओं की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा, “ऑप्टिक तंत्रिका का मूल्यांकन और इंट्राओक्युलर दबाव (अंतःनेत्र दाब) का मापन सहित नियमित नेत्र जाँच ग्लूकोमा का शीघ्र पता लगाने में मदद कर सकती है। शीघ्र निदान और उचित प्रबंधन के साथ, रोग की प्रगति को अक्सर काफी हद तक धीमा किया जा सकता है।”
डॉ. रमनजीत सिहोता ने रोगी शिक्षा और दीर्घकालिक देखभाल के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने कहा, “ग्लूकोमा के प्रबंधन में आजीवन निगरानी और उपचार का पालन आवश्यक है। रोग के बारे में सार्वजनिक जागरूकता बढ़ाकर और नेत्र विशेषज्ञों से समय पर परामर्श को प्रोत्साहित करके अपरिवर्तनीय दृष्टि हानि को रोका जा सकता है।”
चर्चा का संचालन करते हुए, डॉ. देवेन तुली ने रोग के बोझ से निपटने में सहयोगात्मक प्रयासों की आवश्यकता को रेखांकित किया। उन्होंने बताया कि “ग्लूकोमा से निपटने के लिए चिकित्सकों, नीति-निर्माताओं और जनता को शामिल करते हुए सामूहिक दृष्टिकोण की आवश्यकता है। जागरूकता को मजबूत करना और स्क्रीनिंग तथा उपचार सेवाओं तक पहुँच को बेहतर बनाना भारत में ग्लूकोमा-संबंधी अंधेपन को कम करने के लिए महत्वपूर्ण होगा।”
ग्लूकोमा एक दीर्घकालिक नेत्र रोग है जो अक्सर अंतःनेत्र दबाव (इंट्राओक्युलर प्रेशर) बढ़ने के कारणऑप्टिक तंत्रिका को क्षति पहुँचाता है। चूँकि यह बीमारी धीरे-धीरे बढ़ती है और प्रारंभिक चरणों में कोई स्पष्ट लक्षण नहीं दिखाती, इसलिए कई व्यक्ति तब तक रोग से अनजान रहते हैं जब तक महत्वपूर्ण दृष्टि हानि न हो जाए। हालाँकि, नियमित नेत्र जाँच, समय पर निदान और उचित उपचार के साथ, ग्लूकोमा की प्रगति को अक्सर धीमा किया जा सकता है, जिससे मरीज़ अपनी दृष्टि और जीवन की गुणवत्ता को संरक्षित रख सकें।
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