डॉ. एस.के. गोपाल
लखनऊ में आयोजित 86वाँ अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारी सम्मेलन ऐसे समय में हो रहा है जब भारतीय संसदीय लोकतंत्र आत्ममंथन की माँग कर रहा है। यह सम्मेलन केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं अपितु विधायिका की भूमिका, उसकी प्रभावशीलता और उसकी मर्यादा पर गंभीर विचार का अवसर है। देश के लगभग सभी राज्यों से आए पीठासीन अधिकारियों की उपस्थिति यह संकेत देती है कि लोकतांत्रिक संस्थाओं को सुदृढ़ करने का प्रश्न अब टाला नहीं जा सकता।
संसदीय लोकतंत्र की सफलता का आधार केवल नियमित चुनाव नहीं अपितु सदनों के भीतर होने वाला सार्थक संवाद, विचार विमर्श और जवाबदेही है। इस पूरी प्रक्रिया में पीठासीन अधिकारी की भूमिका केंद्रीय होती है। वह केवल कार्यवाही संचालित करने वाला अधिकारी नहीं अपितु सदन की गरिमा, निष्पक्षता और संतुलन का संरक्षक होता है। स्वतंत्रता के बाद भारत ने अनेक ऐसे पीठासीन अधिकारी देखे हैं जिनके आचरण ने संसदीय लोकतंत्र को विश्व में सम्मान दिलाया। यह विरासत हमारी ताकत है लेकिन वर्तमान चुनौतियाँ इस विरासत को नए सिरे से परख रही हैं।
यह निर्विवाद सत्य है कि सदन का अध्यक्ष किसी राजनीतिक दल से निर्वाचित होकर आता है। किंतु अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठते ही उससे यह अपेक्षा की जाती है कि वह दलगत पहचान से ऊपर उठकर कार्य करे। विपक्ष को पर्याप्त अवसर न मिलना, प्रश्नों का अस्वीकार होना या महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा का समय सीमित किया जाना आदि घटनाएँ लोकतांत्रिक चिंता को जन्म देती हैं। आलोचना यहाँ आवश्यक है क्योंकि बिना आलोचना के सुधार संभव नहीं।
पीठासीन अधिकारी के सामने संतुलन की कठिन चुनौती होती है। एक ओर सदन की मर्यादा बनाए रखना, दूसरी ओर सभी पक्षों को बोलने का अवसर देना। यही वह बिंदु है जहाँ नेतृत्व, अनुभव और संवैधानिक समझ की वास्तविक परीक्षा होती है।
राज्य विधानसभाओं और संसद, दोनों में चर्चा और कार्यवाही का समय निरंतर कम होना गहरी चिंता का विषय है। कई बार सत्र इतने संक्षिप्त होते हैं कि विधेयकों पर गहन बहस संभव ही नहीं हो पाती। लोकतंत्र में कानून बनाना जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्वपूर्ण है उस पर चर्चा करना। सुझाव के रूप में यह आवश्यक है कि न्यूनतम सत्र अवधि और चर्चा के लिए सुनिश्चित समय की परंपरा को सुदृढ़ किया जाए। यह कार्य केवल सरकार का नहीं, बल्कि पीठासीन अधिकारियों की सक्रिय पहल से संभव है।
कार्यपालिका और विधायिका के बीच संतुलन भी आज के विमर्श का अहम मुद्दा है। कार्यपालिका का मजबूत होना शासन के लिए आवश्यक है लेकिन यदि वह विधायिका की भूमिका को सीमित करने लगे तो लोकतांत्रिक संतुलन बिगड़ता है। अध्यादेशों का बढ़ता प्रयोग और नीतिगत घोषणाओं का सदन के बाहर होना इस असंतुलन की ओर संकेत करता है। यहाँ समाधान यह है कि विधायिका को नीति निर्माण की प्रक्रिया में फिर से केंद्रीय स्थान दिया जाए और पीठासीन अधिकारी इस प्रक्रिया के संरक्षक बनें।
विधानमंडलीय समितियाँ लोकतंत्र का एक प्रभावी औज़ार हैं। लोक लेखा समिति, प्राक्कलन समिति, याचिका समिति, नियम समिति, स्थानीय निकायों की लेखा परीक्षा प्रतिवेदनों की जांच संबंधी समिति, प्रतिनिहित विधायन समिति जैसी संस्थाएँ कार्यपालिका पर निगरानी रखती हैं और प्रशासन को जवाबदेह बनाती हैं। किंतु कई राज्यों में ये समितियाँ अपेक्षित सक्रियता नहीं दिखा पा रही हैं। आलोचना के साथ यह सुझाव भी आवश्यक है कि समितियों की बैठकें नियमित हों, उनकी रिपोर्टों पर सदन में चर्चा अनिवार्य की जाए और उनकी सिफारिशों को गंभीरता से लिया जाए। पीठासीन अधिकारी इस दिशा में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं। बजट प्रक्रिया भी लोकतांत्रिक स्वास्थ्य का पैमाना है। बजट केवल आय–व्यय का विवरण नहीं अपितु सरकार की प्राथमिकताओं का दर्पण होता है। यदि बजट पर पर्याप्त बहस नहीं होगी तो जनहित से जुड़े प्रश्न अनुत्तरित रह जाएंगे। यहाँ समाधान स्पष्ट है कि बजट सत्र के लिए पर्याप्त समय, कटौती प्रस्तावों पर वास्तविक चर्चा और वित्तीय जवाबदेही को प्राथमिकता।
86वें अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारी सम्मेलन की सार्थकता इसी में निहित है कि वह केवल समस्याओं की पहचान तक सीमित न रहे अपितु व्यावहारिक समाधान भी सुझाए। यह सम्मेलन एक साझा दृष्टिकोण विकसित कर सकता है कि पीठासीन अधिकारी निष्पक्षता को व्यवहार में कैसे उतारें, सदन की कार्यवाही को कैसे अधिक उत्पादक बनाएं और लोकतांत्रिक मर्यादाओं को कैसे सुदृढ़ करें। यह भी आवश्यक है कि इस सम्मेलन से निकलने वाले सुझाव केवल काग़ज़ों तक सीमित न रहें। यदि सदन की कार्यवाही का समय बढ़ाने, समितियों को सशक्त करने और विपक्ष के अधिकारों की रक्षा के लिए ठोस दिशा-निर्देश सामने आते हैं, तो यह आयोजन ऐतिहासिक सिद्ध होगा।
लोकतंत्र की शक्ति बहस, असहमति और सहमति, तीनों में निहित है। पीठासीन अधिकारी इन तीनों के संतुलनकर्ता होते हैं। यदि वे निर्भीक, निष्पक्ष और संवेदनशील रहेंगे तो सदन जीवंत रहेगा और जनता का विश्वास बना रहेगा। आलोचना आवश्यक है लेकिन उसका उद्देश्य व्यवस्था को कमजोर करना नहीं अपितु उसे बेहतर बनाना होना चाहिए। लखनऊ का यह सम्मेलन लोकतंत्र के लिए अवसर है आत्मावलोकन का, सुधार का और संकल्प का। यदि यहाँ से यह संदेश जाता है कि विधायिका अपनी केंद्रीय भूमिका को पुनः सशक्त करेगी और पीठासीन अधिकारी संविधान के सच्चे संरक्षक बनकर उभरेंगे तो यही इस आयोजन की सबसे बड़ी सफलता होगी।

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