डॉ. एस.के. गोपाल
बहुधा हम सबका जीवन एक ही ढर्रे पर चलता दिखाई देता है। मन में यह भाव गहराई से बैठा रहता है कि अभी नहीं, बाद में जिएँगे। अभी तो हालात ठीक नहीं हैं, जिम्मेदारियाँ बहुत हैं, समय अनुकूल नहीं है। जब यह काम हो जाएगा, जब वह बोझ उतर जाएगा, तब चैन से साँस लेंगे। इसी सोच में बचपन खेलकूद में निकल जाता है, जवानी पढ़ाई, नौकरी, परिवार और भागदौड़ में खप जाती है और बुढ़ापे में जब पीछे मुड़कर देखते हैं तो लगता है कि जीवन तो जैसे किसी और के लिए जिया गया। तब मन से अनायास ही निकलता है- “बृथा जन्म गवांयो।” एक फिल्मी गीत में ठीक ही कहा है- “लड़कपन खेल में खोया, जवानी नींद भर सोया, बुढ़ापा देख कर रोया, वही किस्सा पुराना है।” यह पंक्तियाँ केवल कविता नहीं हैं, बल्कि हमारे जीवन की सच्ची तस्वीर हैं। हम सब इसे जानते-समझते हुए भी खुद को इससे अलग नहीं कर पाते, क्योंकि हमें लगता है कि अभी तो जीवन शुरू ही कहाँ हुआ है, असली जीवन तो बाद में आएगा।
यह सोच उस संत की कथा में बहुत सहज ढंग से सामने आती है, जो नदी के किनारे बैठकर उसके सारे पानी के बह जाने की प्रतीक्षा कर रहे थे। देखने वाले को यह व्यवहार पागलपन लगा। नदी का सारा पानी कैसे बह सकता है? नदी तो बहती ही रहती है। लेकिन संत का उत्तर बहुत गहरा था। उन्होंने कहा कि वह नदी के उस पार जाना चाहता है, पर तब जाएगा जब सारा पानी बह जाएगा। जब व्यक्ति ने इसे असंभव बताया तो संत ने हँसते हुए कहा कि यही तो तुम लोग जीवन में करते हो। तुम लोग भी तो यही सोचते रहते हो कि जब जीवन की सारी परेशानियाँ खत्म हो जाएँगी, तब जीना शुरू करेंगे। जब बच्चों की पढ़ाई पूरी हो जाएगी, जब उनकी शादी हो जाएगी, जब मकान बन जाएगा, जब बैंक बैलेंस बढ़ जाएगा, तब शांति से जिएँगे। जीवन भी नदी की तरह है। उसका पानी, यानी उसकी स्थितियाँ, कभी पूरी तरह खत्म नहीं होतीं। अगर जीवन को जीने के लिए तुम नदी के सूखने की प्रतीक्षा करोगे तो वह दिन कभी नहीं आएगा। यह कथा हमें आईना दिखाती है कि हम जीवन के किनारे बैठे केवल बहाव को देखते रहते हैं लेकिन उसमें उतरने का साहस नहीं करते।
सच तो यह है कि जीवन में कभी ऐसा समय नहीं आता जब सब कुछ पूरी तरह ठीक हो। हर उम्र की अपनी परेशानियाँ होती हैं। बचपन में निर्भरता होती है, जवानी में संघर्ष और जिम्मेदारी, प्रौढ़ावस्था में चिंता और बुढ़ापे में असहजता। अगर हम यह सोचते रहें कि पहले सारी मुश्किलें खत्म हों, तब खुश होंगे, तो खुशी कभी नहीं आएगी। हम हर आनंद को भविष्य पर टाल देते हैं। आज हँस लेंगे, यह सोचकर कि अभी काम बहुत है। आज अपनों के साथ बैठ लेंगे, यह कहकर कि अभी समय नहीं है। आज अपने मन की सुन लेंगे, यह सोचकर कि अभी हालात अनुकूल नहीं हैं। धीरे-धीरे ‘आज नहीं’ जीवन का स्थायी उत्तर बन जाता है। समय चुपचाप निकलता रहता है और हमें इसका आभास भी नहीं होता। काल करे सो आज कर हम रोज़ सुनते हैं, पर इसे जीवन में उतारने का साहस कम ही कर पाते हैं।
हम भविष्य की तैयारी में इतने उलझ जाते हैं कि वर्तमान हमारे हाथ से फिसल जाता है। आवश्यकता इस बात की है कि हम जीवन को कल पर टालना छोड़ें। इसका अर्थ यह नहीं कि हम जिम्मेदारियों से भाग जाएँ या भविष्य की योजना न बनाएँ। इसका अर्थ केवल इतना है कि जीवन को जीने के लिए किसी आदर्श स्थिति की प्रतीक्षा न करें। जिम्मेदारियों के बीच भी मुस्कराया जा सकता है, चिंताओं के बीच भी सुकून के पल चुराए जा सकते हैं। जीवन नदी की तरह बहता है और उसी बहाव में रास्ता बनाना पड़ता है। अगर हम हर बार यह कहेंगे कि अभी नहीं, तो अंत में केवल पछतावा ही बचेगा। जीवन पूछेगा कि तुमने इंतजार किया या जिया? बेहतर यही है कि हम आज को अपनाएँ, अभी को स्वीकार करें और इसी क्षण में जीवन का अर्थ खोजें। क्योंकि जीवन किसी आने वाले कल का वादा नहीं है, वह तो अभी बह रहा है, और जो अभी नहीं जिया, उसने शायद जीवन को कभी जिया ही नहीं।
Telescope Today | टेलीस्कोप टुडे Latest News & Information Portal