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उच्च शिक्षा क्षेत्र पर केंद्रीय बजट 2023 के प्रभाव को समझना चाहिए

लेखक : हिमांशु राय (निदेशक, आईआईएम, इंदौर)

केंद्रीय बजट की घोषणा मीडिया का अत्यधिक ध्यान आकर्षित करती है, क्योंकि यह नए वित्तीय वर्ष में प्रवेश करने की तैयारी के क्रम में लोगों की मनोदशा, भावनाओं और आशाओं को दिशा देती है। बजट-घोषणा के बाद, विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञ, इसका विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करते हैं, क्योंकि वे विशिष्ट क्षेत्र पर बजट के प्रभाव को समझने की कोशिश करते हैं, आगामी रुझानों का पूर्वानुमान लगाते हैं और भविष्य की चुनौतियों या अवसरों का अनुमान लगाते हैं।

बजट बनाने की तरह, बजट विश्लेषण की कला भी जटिल है और इसके लिए न केवल विशेषज्ञता और अनुभव की आवश्यकता होती है, बल्कि सूक्ष्म विवरणों के लिए पैनी नज़र भी होनी चाहिए, क्योंकि किसी व्यक्ति का आकलन गलत भी हो सकता है, यदि वह बारीकी से पूरा अर्थ समझने में विफल रहता है। यदि हम इस वर्ष उच्च शिक्षा क्षेत्र की समग्र भावना पर ध्यान दें, तो इसे सकारात्मक कहा जा सकता है। हालांकि, कुछ पहलुओं की आलोचना की गई है, जो केवल “संख्या” की दृष्टि से सतही जांच पर आधारित हैं और इनमें उन आंकड़ों को गंभीरता से समझने की कोशिश नहीं की गयी है। मैं कठिन सन्दर्भों को रेखांकित करने और एक स्पष्ट परिदृश्य प्रस्तुत करने के लिए विवरणों को गहराई से समझने का प्रयास कर रहा हूं।

कुछ लोगों को ऐसा प्रतीत हो सकता है कि पिछले वर्ष के 653.92 करोड़ रुपये की तुलना में, भारतीय प्रबंधन संस्थानों (आईआईएम) की वित्तीय सहायता के आवंटन में लगभग 300 करोड़ रुपये की कमी की गयी है। तथ्य यह है कि आईआईएमएस, कैबिनेट अनुमोदन के तहत अवसंरचना (इमारतों और अन्य भौतिक संपत्ति) के विकास के लिए पूंजी मद में वित्तीय सहायता प्राप्त करते हैं। एक सीमित अवधि के लिए, आवर्ती धन भी उपलब्ध कराया जाता है। आईआईएम परियोजना समाप्त होने के बाद (जैसा कैबिनेट द्वारा अनुमोदित होता है) उस मद में आईआईएम को कोई और धनराशि नहीं दी जाती है। इस कारण, आईआईएम के बजट प्रावधान न्यूनतम स्तर पर सीमित होते हैं, जो कैबिनेट की अनुमति के साथ अनुदान की शेष राशि का भुगतान करने के लिए पर्याप्त होते हैं।

इसी तरह, कुछ टिप्पणीकारों ने तर्क दिया है कि बजट में उच्च शिक्षा वित्त पोषण एजेंसी (एचईएफए) के लिए आवंटन का कोई उल्लेख नहीं है। अब तक, सरकार ने एचईएफए में 4812.50 करोड़ रुपये की सरकारी इक्विटी का निवेश किया है। एचईएफए के बैंक भागीदार, केनरा बैंक ने भी इक्विटी के रूप में 481.25 करोड़ रुपये का योगदान दिया है। 5293.75 करोड़ रुपये की इस इक्विटी का उपयोग करते हुए विभिन्न उच्च शिक्षा संस्थानों को 52,937 करोड़ रुपये तक के ऋण दिए जा सकते हैं। नयी इक्विटी की कोई आवश्यकता नहीं है, जब तक कि इस इक्विटी का पूरी तरह से फायदा नहीं उठाया जाता है। इस वजह से, वित्त वर्ष 2023-2024 के लिए एचईएफए इक्विटी प्रावधान को शून्य पर रखा गया है और जरूरत पड़ने पर इसे बढ़ाया भी जा सकता है।

कुछ लोगों ने इंप्रेस (आईएमपीआरईएसएस) योजना और एमओओसी के लिए बजट में प्रावधान की कमी की बात कही। इम्प्रेस योजना को 31 मार्च, 2021 तक उपयोग के लिए अनुमोदित किया गया था और तब से इसे उच्च शिक्षा संस्थानों में सामाजिक विज्ञान अनुसंधान को बढ़ावा देने के लिए लागू किया जा रहा है। जब तक इसके प्रभाव का तीसरे पक्ष द्वारा मूल्यांकन नहीं किया जाता है, तब तक इस प्रावधान को आगे बढ़ाने का कोई अर्थ नहीं है। इसके अलावा, एमओओसी और ई-शोध सिंधु (ई-एसएस) अब विशिष्ट कार्यक्रम नहीं हैं। उन्हें एनएमईआईसीटी के अलग-अलग घटकों के रूप में जोड़ा गया है और इसके लिए पर्याप्त प्रावधान किए गए हैं।

अंत में, कुछ लोगों ने यह भी महसूस किया है कि उच्च शिक्षा के लिए 2022-23 के 55,078 करोड़ रुपये की तुलना में 2023-24 में 50,094 करोड़ रुपये आवंटित किये गए हैं, जो आवंटन में हुई कमी को दर्शाते हैं। वास्तविक सन्दर्भ को समझने के लिए, हमें इसके लेखे-जोखे में जाना होगा।

वर्तमान व्यवस्था के अनुसार, उपकर निधियों को सकल बजट आवंटन में दो बार शामिल किया जाता है। शुद्ध बजट आवंटन, जिसे वास्तविक बजट आवंटन भी कहा जाता है, के निर्धारण के लिए सकल बजटीय आवंटन में से “आरक्षित निधि में स्थानांतरण” राशि एक बार घटा दी जाती है।

केवल शिक्षा उपकर (एमयूएसके) में कमी की गयी है और इसके परिणामस्वरूप, ऐसा प्रतीत होता है कि सकल बजट आवंटन में भी कमी आई है। वास्तविक बजट आवंटन 40828.35 करोड़ रुपये (वित्त वर्ष 2022-23) से बढ़कर 44094.62 करोड़ रुपये (वित्त वर्ष 2023-24) हुआ है, जैसा उपरोक्त तालिका में दिखाया गया है। यह वास्तविक बजट है, जो उच्च शिक्षा विभाग को वित्त वर्ष 2023-24 के दौरान उपयोग के लिए उपलब्ध कराया जाएगा।

निष्कर्ष के तौर पर, यह कहा जा सकता है कि हर उद्योग या क्षेत्र को प्रत्येक वर्ष आवंटन में वृद्धि की अपेक्षा रहती है, लेकिन प्रभावी बजट बनाने के प्रयास में, कुछ ऐसी बातें भी होती हैं, जिनका उद्देश्य मौजूदा बाधाओं के भीतर विकास के अवसरों को अनुकूल बनाना होता है। इस प्रकार गतिशील पुनर्आवंटन तकनीकों के उपयोग की आवश्यकता होती है, लेकिन इसके साथ ही प्रमुख क्षेत्र के लिए धन आवंटन में वृद्धि करने, जितना संभव हो सके, का लक्ष्य भी रखा जाता है। केंद्रीय बजट और शिक्षा क्षेत्र पर इसका प्रभाव; निश्चित रूप से सही दिशा में उठाया गया कदम है और उचित जरूरतों पर पर्याप्त ध्यान दिया गया है।