कोलकाता (टेलीस्कोप टुडे संवाददाता)। पैरागॉन फुटवियर इस दुर्गा पूजा पर एक नई ब्रांड फिल्म लेकर आ रहा है। यह फिल्म उन लोगों की कहानी पर केंदित है, जिनकी अनदेखी मेहनत से हमारे त्यौहारों में रौनक आती है। पूजा की तैयारियों के बीच यह फिल्म एक ऐसे व्यक्ति की कहानी को उजागर करती है, जो अपने मोहल्ले के लिए बाँस का पंडाल तैयार करता है।
कहानी में उस व्यक्ति और उसकी छोटी बेटी के खूबसूरत रिश्ते की झलक भी देखने मिलती है। दोनों के साथ बिताए रोजमर्रा के छोटे-छोटे पल उसके काम से परे उसकी दुनिया से हमें रूबरू कराते हैं। अपनी मेहनत को लेकर उसके मन में गर्व है, भले ही पंडाल तैयार होने के बाद वहाँ आने वाले लोगों की नजर शायद कभी उस मेहनत तक न पहुँचे।
इस फिल्म की परिकल्पना टर्मरिक ने की है, जो कि दुर्गा पूजा को एक सादगी भरे और करीब से महसूस करने वाले अंदाज में पेश करती है। इसमें त्यौहार की रौनक दिखाने के बजाय उस रौनक के पीछे छिपे इंतजार, तैयारियों और उन लोगों की कहानी पर ध्यान दिया गया है, जिनकी मेहनत से पूरा माहौल जीवंत हो उठता है। कहानी एक खाली मोहल्ले के मैदान के धीरे-धीरे पंडाल का रूप लेने और उसे तैयार करने वाले व्यक्ति की रोजमर्रा की जिंदगी को साथ लेकर चलती है। इसी के साथ उसकी मेहनत और योगदान की अहमियत भी बिना किसी दिखावे के सामने आती है।

कैम्पेन पर बात करते हुए सचिन जोसेफ (एग्जीक्यूटिव वाइस प्रेसिडेंट, मार्केटिंग एंड आईटी, पैरागॉन फुटवियर) ने कहा, “दुर्गा पूजा साथ होने, परंपरा और समुदाय की भावना से गहराई से जुड़ा त्यौहार है। पैरागॉन में हम हमेशा से लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी में एक भरोसेमंद साथी बने रहने और हर कदम पर चुपचाप उनका साथ देने में विश्वास रखते हैं। इस फिल्म के जरिए हम इस भावना को त्यौहार की कहानी में पिरोना चाहते थे, एक ऐसी सरल और दिल से जुड़ी कहानी के साथ, जो उन तमाम छोटी-बड़ी कोशिशों को सामने लाए, जिनसे मिलकर त्यौहार की खुशियाँ हमारे बीच आकार लेती हैं।”
कैम्पेन पर अपने विचार व्यक्त करते हुए, राहुल गुहा (फाउंडर और सीईओ, टर्मरिक) ने कहा, “इस कहानी का विचार पूजा की चमक-दमक से आगे जाकर उन लोगों और उनकी मेहनत को देखने से आया, जिनकी वजह से यह पूरा उत्सव संभव हो पाता है। बाँस का पंडाल तैयार करने वाला व्यक्ति इस कहानी का केंद्र है। हम चाहते थे कि फिल्म सहज और सादगी भरी लगे। पिता और बेटी का रिश्ता कहानी में भावनाओं की एक खूबसूरत परत जोड़ता है, लेकिन कहानी के मूल विचार से ध्यान नहीं हटाता। हमारी कोशिश थी कि दर्शक भी बेटी के साथ-साथ धीरे-धीरे उसके काम की अहमियत को समझें।”
यह फिल्म पश्चिम बंगाल की संस्कृति और वहाँ दुर्गा पूजा से जुड़े माहौल को करीब से महसूस कराती है। यहाँ पंडाल बनना भी दुर्गा पूजा के इंतजार का एक अहम् हिस्सा है। तैयार पंडाल की भव्यता दिखाने के बजाय फिल्म उन दिनों की कहानी कहती है, जब इसकी तैयारियाँ चल रही होती हैं। धीरे-धीरे आकार लेता पंडाल, पास से गुजरते जाने-पहचाने चेहरे, पूजा की तैयारियों की बढ़ती हलचल और उस व्यक्ति के चेहरे पर अपने काम को लेकर संतोष बिन कुछ कहे काफी कुछ बयाँ करता है, जो जानता है कि इस पूरी खूबसूरती के पीछे उसकी मेहनत भी शामिल है।
यह कैम्पेन दुर्गा पूजा के दौरान डिजिटल और सोशल प्लेटफॉर्म्स पर रिलीज किया जाएगा। इसका फोकस पश्चिम बंगाल और उन दर्शकों पर रहेगा, जो इस त्यौहार की संस्कृति, भावनाओं और उससे जुड़े इंतजार को दिल से महसूस करते हैं।
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