विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस (14 अगस्त) पर विशेष
(डॉ. एस.के. गोपाल)
एक दिन पहले तक सब कुछ अपना था। घर अपना, खेत अपने, बाजार अपना और पड़ोसी भी अपने। फिर एक लकीर खिंची और लाखों लोगों की दुनिया बदल गई। किसी को घर छोड़ना पड़ा, किसी को गांव, किसी को शहर और किसी को अपनी जन्मभूमि। अगस्त 1947 की 15 तारीख को भारत स्वतंत्र हुआ लेकिन स्वतंत्रता की इस सुबह के साथ विभाजन का गहरा घाव भी मिला। 14 अगस्त का विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस इसी पीड़ा को याद करने का अवसर है।
विभाजन को केवल तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों का परिणाम मानकर आगे बढ़ जाना पर्याप्त नहीं है। एक ही सभ्यतागत भूभाग को धर्म के आधार पर बांटने का निर्णय क्या वास्तव में स्थायी समाधान दे सका? इतिहास का उत्तर हमारे सामने है। लाखों लोग विस्थापित हुए, परिवार टूटे, असंख्य लोगों की जान गई और उपमहाद्वीप में भारत पाकिस्तान के बीच स्थायी अविश्वास की नींव पड़ी। विभाजन ने समस्या समाप्त नहीं की बल्कि नई समस्याओं को जन्म दिया।
विभाजन की त्रासदी को साहित्य ने आंकड़ों से आगे ले जाकर मनुष्य के दर्द में बदला। खुशवंत सिंह का ट्रेन टू पाकिस्तान, भीष्म साहनी का तमस, अमृता प्रीतम का पिंजर, यशपाल का झूठा सच और राही मासूम रजा का आधा गांव बताते हैं कि राजनीतिक सीमाओं का सबसे बड़ा भार सामान्य मनुष्य ने उठाया। इन रचनाओं की संवेदना हमें यह सोचने को विवश करती है कि जिस विभाजन ने इतने जीवन उजाड़े, उसे इतिहास की अपरिहार्य उपलब्धि मान लेना उचित नहीं होगा।
विभाजन की सबसे बड़ी ऐतिहासिक विडंबना यह है कि पाकिस्तान भी अपने मूल स्वरूप में स्थिर नहीं रह सका। 1971 में पूर्वी पाकिस्तान अलग होकर बांग्लादेश बना। भाषा, क्षेत्रीय पहचान, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और आर्थिक असमानताओं ने अंततः उस राज्य को भीतर से तोड़ दिया। यह घटना इस प्रश्न को मजबूत करती है कि केवल एक राजनीतिक पहचान या धार्मिक आधार पर बनाया गया राष्ट्र क्या विविध समाजों को लंबे समय तक एक सूत्र में बांध सकता है। पूर्वी पाकिस्तान का बांग्लादेश बनना विभाजन की स्थायित्व संबंधी धारणाओं पर गंभीर प्रश्न खड़ा करता है।
आज पाकिस्तान के भीतर भी असंतोष के अनेक स्वर सुनाई दे रहे हैं। बलूचिस्तान में अलगाववादी आंदोलन और हिंसा लंबे समय से जारी है। 11 अगस्त को बलूच राष्ट्रवादी और कथित अलगाववादी समूह स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाते हैं। बलूचिस्तान के ताजा हालात पाकिस्तान की आंतरिक चुनौतियों को दर्शाता है। किसी भी क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान और जन आकांक्षाओं की उपेक्षा दीर्घकाल में असंतोष को जन्म दे सकती है।
जम्मू कश्मीर का प्रश्न भी 1947 की अधूरी विरासत से जुड़ा है। भारत सरकार का स्पष्ट रुख है कि पाकिस्तान जम्मू कश्मीर और लद्दाख के कतिपय भारतीय भूभाग पर अवैध कब्जा किए हुए है। भारत की दृष्टि में यह क्षेत्र भारत का अभिन्न हिस्सा है। विभाजन की स्मृति हमें याद दिलाती है कि उस समय खींची गई सीमाओं से जुड़े प्रश्न आज भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं।
इन परिस्थितियों को देखते हुए विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस केवल शोक का अवसर नहीं होना चाहिए। यह आत्ममंथन का अवसर भी है। यदि विभाजन स्थायी शांति नहीं ला सका, यदि पूर्वी पाकिस्तान अलग होकर बांग्लादेश बन गया और यदि आज भी पाकिस्तान के भीतर क्षेत्रीय असंतोष मौजूद है, तो भारत को अपने सभ्यतागत आत्मविश्वास के साथ भविष्य की दिशा पर विचार करना चाहिए।
यहीं से अखंड भारत की अवधारणा को नए अर्थ में देखने की आवश्यकता है। अखंड भारत का अर्थ किसी देश पर बलपूर्वक अधिकार करना, युद्ध करना या हिंसा के माध्यम से सीमाएं बदलना नहीं होना चाहिए। इसका अर्थ ऐसी दीर्घकालिक सभ्यतागत पहल हो सकती है, जिसमें भारत अपने ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और मानवीय संबंधों के आधार पर दक्षिण एशिया को संवाद, सहयोग और साझा विकास की दिशा दे।
भारत को इस दिशा में पहल करनी चाहिए। शुरुआत राजनीतिक विलय से नहीं, बल्कि सांस्कृतिक संपर्क, व्यापार, शिक्षा, तीर्थ, पर्यटन, मानवीय संवाद और साझा विरासत के संरक्षण से हो सकती है। सीमाएं अपनी जगह रहें, लेकिन लोगों के बीच बनी मानसिक दीवारें धीरे धीरे टूटें। भारत की आर्थिक शक्ति, लोकतांत्रिक परंपरा और सांस्कृतिक प्रभाव उसे इस पहल का स्वाभाविक केंद्र बना सकते हैं। पाक अधिकृत कश्मीर से भारत के पक्ष में उठती आवाज़ें, बलूचों का भारत के प्रति आशा भरी निगाहों से देखना, सकारात्मक प्रतीत होता है।
अखंड भारत की चेतना का भी सकारात्मक अर्थ यही है कि जो भूभाग इतिहास में एक दूसरे से जुड़े रहे हैं, वे भविष्य में शत्रुता के बजाय सहयोग का क्षेत्र बनें। अखंड भारत की अवधारणा को केवल राजनीतिक सीमा परिवर्तन के रूप में नहीं, बल्कि साझा संस्कृति, व्यापार, शिक्षा, तीर्थ, पर्यटन और जनसंपर्क के माध्यम से आगे बढ़ाया जाना चाहिए। अखंड भारत की दिशा में भारत की पहली पहल सीमाएं बदलना नहीं अपितु दिलों और समाजों के बीच की दूरियां मिटाना होनी चाहिए।

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