नई दिल्ली (टेलीस्कोप टुडे संवाददाता)। भारतीय वाणिज्य एवं उद्योग मंडल (आईसीसी) द्वारा “रीइमैजिनिंग बैंकिंग इन द एज ऑफ डिसरप्शन” विषय पर आयोजित चौथे आईसीसी इमर्जिंग एशिया बैंकिंग कॉन्क्लेव-2026 में भारत, श्रीलंका और नेपाल के केंद्रीय बैंक अधिकारियों, नियामकों और बैंकिंग क्षेत्र के वरिष्ठ विशेषज्ञों ने भाग लिया। ली मेरिडियन होटल में आयोजित इस सम्मेलन में बिम्सटेक क्षेत्र के नीति-निर्माताओं और बैंकिंग विशेषज्ञों ने इस बात पर मंथन किया कि वित्तीय संस्थान तेज़ी से हो रहे तकनीकी बदलाव के बीच परिचालन क्षमता, वित्तीय स्थिरता और वित्तीय समावेशन के बीच संतुलन कैसे बनाए रखें।
सम्मेलन के स्वागत भाषण में आईसीसी की राष्ट्रीय बीएफएसआई विशेषज्ञ समिति के अध्यक्ष तथा टाटा और बंधन समूह की कंपनियों के बोर्ड सदस्य अतनु सेन ने कहा कि तकनीक भले ही बैंकिंग का स्वरूप बदल रही हो, लेकिन विश्वास (ट्रस्ट) आज भी बैंकिंग की सबसे बड़ी पूंजी है। उन्होंने कहा कि बैंकिंग का मूल उद्देश्य सभी हितधारकों का विश्वास अर्जित करना है। आज बैंकिंग क्षेत्र तकनीकी नवाचार, भू-राजनीतिक अनिश्चितता, जलवायु जोखिम और साइबर खतरों जैसी कई चुनौतियों का एक साथ सामना कर रहा है, जिससे बदलाव ही नया सामान्य बन गया है।
उन्होंने बताया कि विश्व बैंक के अनुसार दक्षिण एशिया में लगभग 80 प्रतिशत वयस्कों के पास अब बैंक खाता है।जबकि विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में डिजिटल व्यापारी भुगतान वर्ष 2021 के 35 प्रतिशत से बढ़कर 2025 में 42 प्रतिशत हो गया है। भारत में वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान जमा (डिपॉजिट) में 12 प्रतिशत, जबकि ऋण (एडवांस) में 15 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। देशभर में 200 से अधिक डिजिटल बैंकिंग इकाइयों के संचालन तथा यूपीआई के माध्यम से लगभग ₹230 लाख करोड़ के लेनदेन ने बैंकिंग प्रणाली को नई मजबूती प्रदान की है।
श्रीलंका के केंद्रीय बैंक के उप-गवर्नर के.जी.पी. सिरिकुमारा ने कहा कि उभरता हुआ एशिया वैश्विक आर्थिक विकास में लगभग 60 प्रतिशत योगदान दे रहा है, लेकिन इसी तेज़ विकास के साथ वित्तीय जोखिम भी बदल रहे हैं। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि भविष्य का कोई भी वित्तीय संकट किसी बैंक से नहीं, बल्कि साइबर हमले, जलवायु आपदा या क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर में व्यवधान से शुरू हो सकता है।
उन्होंने कहा कि लचीलापन (रेजिलिएंस) का अर्थ केवल संकट के बाद उबरना नहीं, बल्कि संकट के दौरान भी आवश्यक वित्तीय सेवाओं को लगातार जारी रखना है। श्रीलंका के हालिया आर्थिक संकट का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि सतर्कता और समय रहते की गई तैयारियों के कारण देश का बैंकिंग क्षेत्र बड़े वित्तीय संकट से बच सका। उनके अनुसार वित्तीय समावेशन और विवेकपूर्ण बैंकिंग एक-दूसरे के पूरक हैं, जबकि मजबूत प्रशासन (गवर्नेंस) ही किसी संस्थान को संकट से सुरक्षित बनाता है।
नेपाल राष्ट्र बैंक के बैंकिंग विभाग के कार्यकारी निदेशक हेम प्रसाद न्यौपाने ने नेपाल में डिजिटल बैंकिंग की तेज़ प्रगति की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि 44 अरब डॉलर की अर्थव्यवस्था वाले नेपाल में वित्त वर्ष 2025-26 में 3.85 प्रतिशत जीडीपी वृद्धि और 2.13 प्रतिशत मुद्रास्फीति का अनुमान है। देश में वर्तमान में 106 लाइसेंस प्राप्त बैंक एवं वित्तीय संस्थान 11,300 से अधिक शाखाओं के माध्यम से सेवाएं दे रहे हैं।
उन्होंने कहा कि महामारी से पहले जहां डिजिटल वॉलेट उपयोगकर्ताओं की संख्या 60 लाख थी, वहीं अब यह बढ़कर 2.7 करोड़ से अधिक हो गई है। मोबाइल बैंकिंग उपयोगकर्ता 80 लाख से बढ़कर 3 करोड़ से अधिक हो चुके हैं। पिछले वर्ष नेपाल में क्यूआर कोड आधारित लगभग 800 अरब नेपाली रुपये के भुगतान हुए, जो देश की जीडीपी का लगभग 12 प्रतिशत है। यह आंकड़ा पिछले पांच वर्षों में छह गुना बढ़ा है। वर्तमान में नेपाल सरकार के 95 प्रतिशत से अधिक भुगतान डिजिटल माध्यम से किए जा रहे हैं।
उन्होंने यह भी बताया कि नेपाल का वित्तीय समावेशन सूचकांक वर्ष 2021 के 0.40 से बढ़कर 2025 में 0.53 हो गया है। नेपाल अपने राष्ट्रीय भुगतान प्लेटफॉर्म को भारत के यूपीआई से जोड़ रहा है और भारतीय पर्यटक पहले ही नेपाल में क्यूआर कोड स्कैन कर भुगतान कर सकते हैं। इसके साथ ही नेपाल राष्ट्र बैंक इस वर्ष सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी (CBDC) का पायलट प्रोजेक्ट चला रहा है, जिसे वर्ष 2027 तक पूरी तरह लागू करने की योजना है।

पीडब्ल्यूसी इंडिया की चेयरमैन सलाहकार गायत्री पार्थसारथी ने अपने संबोधन में कहा कि बैंकिंग की नई परिकल्पना कोई नारा नहीं, बल्कि एक कठिन और सतत प्रक्रिया है। उन्होंने कहा कि पहला बड़ा बदलाव डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर है, जिसमें भारत वैश्विक अग्रणी रहा है और नेपाल व श्रीलंका ने भी उल्लेखनीय प्रगति की है। दूसरा बदलाव फिनटेक प्लेटफॉर्म आधारित अर्थव्यवस्था है, जहां बैंकिंग अब अलग व्यवस्था न रहकर विभिन्न डिजिटल सेवाओं का हिस्सा बन चुकी है।
उन्होंने कहा कि तीसरा और सबसे दीर्घकालिक परिवर्तन जनरेटिव एवं एजेंटिक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) है, जो बैंकिंग को अधिक दक्ष बना रहा है। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि प्रशिक्षित बैंक अधिकारियों का स्थान एआई अभी नहीं ले सकता। उन्होंने कहा कि जोखिम प्रबंधन और अनुपालन (रिस्क एंड कंप्लायंस) अब केवल मुख्य जोखिम अधिकारी (सीआरओ) का विषय नहीं, बल्कि मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) की प्राथमिक जिम्मेदारी बन चुका है। साइबर सुरक्षा, डेटा संरक्षण और तकनीक व बैंकिंग विशेषज्ञता से युक्त हाइब्रिड बैंकर्स भविष्य की सबसे बड़ी आवश्यकता होंगे।
समापन सत्र में भारतीय वाणिज्य एवं उद्योग मंडल (आईसीसी) के महानिदेशक डॉ. राजीव सिंह ने कहा कि पिछले छह वर्षों में वैश्विक अर्थव्यवस्था में अभूतपूर्व परिवर्तन हुए हैं। दुनिया अनिश्चितताओं के दौर से गुजर रही है, आपूर्ति श्रृंखलाएं प्रभावित हो रही हैं और नए वैश्विक गठबंधन बन रहे हैं। ऐसे समय में बैंकिंग क्षेत्र को विश्वास, दक्षता और विश्वसनीयता जैसे अपने मूल मूल्यों को बनाए रखते हुए इन बदलावों के साथ कदम मिलाना होगा।
चौथे संस्करण में आयोजित यह कॉन्क्लेव बिम्सटेक क्षेत्र के केंद्रीय बैंक अधिकारियों, नियामकों और वित्तीय क्षेत्र के विशेषज्ञों को एक साझा मंच प्रदान करता रहा है, जहां डिजिटल परिवर्तन के दौर में बैंकिंग क्षेत्र के भविष्य और उससे जुड़ी चुनौतियों पर व्यापक चर्चा की जाती है।
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