(डॉ. एस.के. गोपाल)
हाल के दिनों में एक ओर राममंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा अर्पित दान की कथित चोरी का मामला चर्चा में रहा। दूसरी ओर लखनऊ में आय से अधिक संपत्ति के एक मामले में पूर्व एआरटीओ के आवास पर छापेमारी के दौरान भारी मात्रा में नकदी, सोना, चांदी और अनेक चल-अचल संपत्तियों का सामने आना भी सुर्खियों में रहा। ये घटनाएं केवल भ्रष्टाचार की नहीं अपितु समाज में चरित्र और नैतिकता के गिरते स्तर की ओर संकेत करती हैं। इसी संदर्भ में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने टिप्पणी की कि यदि भगवान राम के मंदिर में चढ़ाए गए दान की चोरी से भी लोगों को शर्म नहीं आती तो यह ईमानदारी के स्तर में आई गंभीर गिरावट का संकेत है। न्यायालय ने कहा कि भारत में भ्रष्टाचार सामान्य बात बन गया है और लोग उसे तभी गलत मानते हैं जब कोई पकड़ा जाता है।
किसी भी राष्ट्र का वास्तविक उत्थान उसकी आर्थिक प्रगति से नहीं, उसके नागरिकों के चरित्र से होता है। सड़कें, पुल, इमारतें और उद्योग विकास के प्रतीक हो सकते हैं, किन्तु किसी देश की सबसे बड़ी पूंजी उसके लोगों की ईमानदारी, विश्वसनीयता और नैतिक आचरण होती है। जब चरित्र कमजोर पड़ने लगता है तो सबसे पहले समाज का विश्वास टूटता है। विश्वास टूटने के बाद संस्थाएं भी धीरे-धीरे अपना प्रभाव खोने लगती हैं।
भ्रष्टाचार का सबसे खतरनाक रूप करोड़ों रुपये के घोटाले नहीं हैं। उससे भी अधिक घातक वह मानसिकता है जो छोटी-छोटी बेईमानियों को सामान्य मान लेती है। नियमों को अपने लाभ के लिए तोड़ना, अनुचित सिफारिश को अधिकार समझना, बिना अधिकार सुविधा प्राप्त करना, कर चोरी को चतुराई कहना, गलत प्रमाणपत्र बनवाना या सार्वजनिक संपत्ति को अपनी निजी वस्तु की तरह उपयोग करना आदि, ये सब उसी सोच के छोटे-छोटे रूप हैं। जब समाज इन व्यवहारों पर मौन हो जाता है, तब बड़े अपराधों के लिए भी जमीन तैयार होने लगती है।
समस्या यह नहीं कि कुछ लोग भ्रष्ट हैं। समस्या यह है कि भ्रष्टाचार के प्रति सामाजिक असहिष्णुता लगातार कम होती जा रही है। आज अनेक लोग गलत काम को गलत इसलिए नहीं मानते कि वह अनैतिक है। वे उसे तब तक स्वीकार्य मानते हैं जब तक उसका खुलासा नहीं होता। अपराध से अधिक चिंता पकड़े जाने की होती है। यही सोच चरित्रहीनता की सबसे बड़ी पहचान है।
वर्षों पहले पचासी पैसा ढूंढ़ो आंदोलन के संयोजक देवी प्रसाद गुप्ता ने सरकारी मशीनरी के चारित्रिक पतन पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा था कि नीचे गिरने की भी कोई सीमा होनी चाहिए। यह केवल एक टिप्पणी नहीं अपितु भविष्य के लिए एक चेतावनी थी। समय बीतने के साथ यह चेतावनी और अधिक प्रासंगिक होती चली गई। दुर्भाग्य यह है कि जिस चिंता को कभी सरकारी व्यवस्था तक सीमित माना जाता था वह आज सामाजिक जीवन के अनेक क्षेत्रों में दिखाई देने लगी है। यह केवल शासन का संकट नहीं, समाज के चरित्र का संकट है।
सबसे अधिक पीड़ा तब होती है जब श्रद्धा, सेवा और लोककल्याण से जुड़े क्षेत्रों में भी अनियमितताओं की खबरें सामने आती हैं। मंदिरों के दान, शिक्षा, स्वास्थ्य या जनकल्याण की योजनाओं में भ्रष्टाचार केवल आर्थिक नुकसान नहीं पहुँचाता, वह लोगों के विश्वास को भी तोड़ देता है। विश्वास की क्षति की भरपाई किसी धनराशि से नहीं की जा सकती। जिस समाज में विश्वास कमजोर पड़ जाए, वहाँ विकास की गति भी अंततः प्रभावित होती है।
हमारे समाज में नियमों का पालन भी अक्सर नैतिक जिम्मेदारी से नहीं, दंड के भय से होता है। अधिकांश लोग दोपहिया वाहन चलाते समय हेलमेट अपनी सुरक्षा के लिए नहीं, चालान से बचने के लिए पहनते हैं। सीट बेल्ट भी सुरक्षा की आदत कम और जुर्माने से बचने का साधन अधिक बन गई है। जैसे ही जांच चौकी पार होती है, कई लोग हेलमेट उतार देते हैं या सीट बेल्ट खोल देते हैं। यह प्रवृत्ति बताती है कि हमारे आचरण का आधार आत्मानुशासन नहीं, बाहरी दबाव बनता जा रहा है। जब व्यक्ति सही काम इसलिए करे कि वह सही है, तभी चरित्र का निर्माण होता है। यदि सही आचरण केवल दंड के भय पर टिका हो, तो अवसर मिलते ही उसका स्थान गलत आचरण ले लेता है।
यह मान लेना भी भूल होगी कि भ्रष्टाचार केवल नेताओं, अधिकारियों या कर्मचारियों की समस्या है। समाज का प्रत्येक व्यक्ति अपने आचरण से व्यवस्था को प्रभावित करता है। यदि नागरिक स्वयं नियमों का पालन न करें, सुविधा के लिए सिद्धांतों से समझौता करें और छोटे लाभ के लिए ईमानदारी छोड़ दें, तो किसी भी व्यवस्था से पूर्ण पारदर्शिता की अपेक्षा करना कठिन हो जाता है। समाज का चरित्र ऊपर से नहीं बनता। वह परिवार, विद्यालय और व्यक्ति के दैनिक व्यवहार से निर्मित होता है।
भारतीय संस्कृति ने सत्य, शुचिता और कर्तव्य को जीवन का सर्वोच्च मूल्य माना है। हमारे महापुरुषों ने धन से अधिक महत्व चरित्र को दिया। यही कारण था कि विश्वास सामाजिक संबंधों की सबसे बड़ी पूंजी माना जाता था। आज विज्ञान, तकनीक और अर्थव्यवस्था में उल्लेखनीय प्रगति हुई है किन्तु यदि नैतिक विकास साथ नहीं चलेगा तो यह प्रगति अधूरी रहेगी। आर्थिक समृद्धि तभी स्थायी बन सकती है जब उसके साथ नैतिक समृद्धि भी जुड़ी हो।
भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई केवल कठोर दंड से नहीं जीती जा सकती। कानून आवश्यक है परंतु कानून भय उत्पन्न कर सकता है, चरित्र नहीं। चरित्र का निर्माण परिवार के संस्कार, विद्यालय की शिक्षा, सामाजिक वातावरण और व्यक्तिगत आत्मानुशासन से होता है। यदि ईमानदारी केवल दंड के भय से होगी तो अवसर मिलते ही उसका स्थान बेईमानी ले लेगी। यदि ईमानदारी जीवन का स्वाभाविक मूल्य बन जाएगी तो किसी निगरानी या दंड की आवश्यकता बहुत कम रह जाएगी।
आज आवश्यकता है कि हम स्वयं से प्रश्न करें कि क्या हम अपने दैनिक जीवन में वही आचरण करते हैं जिसकी अपेक्षा दूसरों से करते हैं। परिवर्तन की शुरुआत सदैव व्यक्ति से होती है। परिवार से होती है। समाज और राष्ट्र उसी का विस्तार हैं। यदि प्रत्येक नागरिक अपने व्यवहार में सत्यनिष्ठा, पारदर्शिता और उत्तरदायित्व को स्थान दे, तो भ्रष्टाचार के विरुद्ध सबसे बड़ी लड़ाई बिना किसी बड़े अभियान के भी जीती जा सकती है।
चरित्रहीनता की सामाजिक कीमत बहुत बड़ी होती है। यह केवल धन की हानि नहीं करती। यह विश्वास को तोड़ती है, संस्थाओं को कमजोर करती है, नैतिक मूल्यों को क्षीण करती है और राष्ट्र की प्रगति को बाधित करती है। इसलिए समय की सबसे बड़ी आवश्यकता केवल भ्रष्टाचार विरोधी कानूनों की नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण के राष्ट्रीय अभियान की है। जिस दिन समाज गलत काम को इसलिए अस्वीकार करेगा कि वह गलत है, न कि केवल इसलिए कि उसके पकड़े जाने का भय है, उसी दिन सच्चे अर्थों में नैतिक पुनर्जागरण का आरंभ होगा। वही भारत को अधिक ईमानदार, अधिक विश्वसनीय और अधिक सशक्त राष्ट्र बनाने की दिशा में निर्णायक कदम होगा।

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