लखनऊ (टेलीस्कोप टुडे संवाददाता)। भारत में तेज़ जीवनशैली, अस्वास्थ्यकर खान-पान और बैठकर काम करने की आदतों के कारण पाचन संबंधी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। पाचन संबंधी समस्याओं की बढ़ती व्यापकता के बावजूद, कोलोरेक्टल कैंसर जैसे गंभीर गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल रोगों के बारे में जागरूकता अभी भी कम है।
यह समझने के लिए कि लोग पाचन संबंधी लक्षणों को कैसे समझते हैं और कब चिकित्सा सहायता लेते हैं, मर्क स्पेशालिटीज प्रा. लि. के सहायता से लाइफस्टाइल एवं डाइजेस्टिव हेल्थ अवेयरनेस सर्वे के माध्यम से एक राष्ट्रीय स्तर का परसेप्शन ऑडिट समर्थित किया। इस सर्वेक्षण में यह आकलन किया गया कि लोग अनियमित मल त्याग, एसिडिटी और मल में खून जैसे लक्षणों पर कैसी प्रतिक्रिया देते हैं, साथ ही जागरूकता की कमी और व्यवहारिक पैटर्न की पहचान की गई, जो समय पर चिकित्सा परामर्श और निदान में देरी का कारण बन सकते हैं।

इन निष्कर्षों को शुक्रवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस में डॉ. अभिषेक पाठक (सीनियर कंसल्टेंट – मेडिकल ऑन्कोलॉजी, अपोलो मेडिक्स हॉस्पिटल, लखनऊ), डॉ. अभिषेक कुमार सिंह (डायरेक्टर – मेडिकल ऑन्कोलॉजी, मेदांता हॉस्पिटल, लखनऊ) और डॉ. सौरभ मिश्रा (डायरेक्टर – सिनर्जी कैंसर इंस्टीट्यूट एंड सुपरस्पेशलिटी हॉस्पिटल, लखनऊ/गोरखपुर) ने साझा किया। सभी विशेषज्ञों ने पाचन स्वास्थ्य के लक्षणों के लिए अधिक जागरूकता और समय पर चिकित्सा परामर्श की आवश्यकता पर जोर दिया।
उन्होंने कहा, कोलोरेक्टल कैंसर भारत में एक बढ़ती स्वास्थ्य चिंता के रूप में उभर रहा है, जिसका कारण अस्वास्थ्यकर खान-पान, मोटापा और आंत स्वास्थ्य के प्रति कम जागरूकता है। हालांकि शुरुआती अवस्था में इसका पता लगने पर यह काफी हद तक रोके जाने योग्य और उपचार योग्य है, लेकिन देर से स्क्रीनिंग और लक्षणों के प्रति कम जागरूकता के कारण कई मामलों का निदान देरसे होता है। इस पृष्ठभूमि में, राष्ट्रीय सर्वेक्षण ने पाचन स्वास्थ्य जागरूकता और जीवनशैली से जुड़े चिंताजनक रुझानों को उजागर किया।
इस राष्ट्रीय सर्वेक्षण में 25 से 65 वर्ष आयु वर्ग के 10,198 लोगों की प्रतिक्रियाएं शामिल की गईं, जो 14 प्रमुख भारतीय शहरों—कोलकाता, अहमदाबाद, बैंगलोर, कालीकट, चंडीगढ़, चेन्नई, दिल्ली, हैदराबाद, इंदौर, जयपुर, कोच्चि, लखनऊ, मुंबई और पुणे—से ली गईं। निष्कर्षों में पाचन स्वास्थ्य व्यवहार और जागरूकता में कई चिंताजनक पैटर्न सामने आए। 80% से अधिक लोग एसिडिटी, अपच या कब्ज जैसी समस्याओं के लिए डॉक्टर से सलाह लेने के बजाय स्वयं-उपचार करते हैं। 65% से अधिक लोगों ने अनियमित मल त्याग का अनुभव होने की बात कही।
50% से अधिक लोग सप्ताह में कम से कम तीन बार बाहर का या पैकेज्ड भोजन करते हैं, जबकि 28.1% लगभग रोज़ बाहर खाना खाते हैं। केवल 45.2% लोग नियमित व्यायाम करते हैं, जबकि 54.8% लोग सप्ताह में तीन बार भी व्यायाम नहीं करते। 39.9% लोगों ने तंबाकू सेवन की बात स्वीकार की, जो गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल रोगों का एक ज्ञात जोखिम कारक है। 40% युवा उत्तरदाताओं ने लक्षणों को नजरअंदाज किया और पाचन संबंधी समस्याओं के बावजूद डॉक्टर से सलाह नहीं ली, यह मानते हुए कि यह जीवनशैली के कारण है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि 80% से अधिक लोग यह नहीं जानते कि मल में खून कोलोरेक्टल कैंसर का प्रारंभिक चेतावनी संकेत हो सकता है।
जैसे-जैसे लखनऊ में यह अभियान आगे बढ़ा, शहर-विशिष्ट सर्वेक्षण के निष्कर्षों ने पाचन स्वास्थ्य और कोलोरेक्टल कैंसर के प्रति चिंताजनक रूप से कम जागरूकता को उजागर किया।
लखनऊ के लिए शहर-विशिष्ट विश्लेषण में 557 प्रतिभागी शामिल थे। जिनमें 258 पुरुष और 299 महिलाएं थीं, और आयु समूह 25–35 (141), 36–45 (227), 46–55 (141), और 55 वर्ष से अधिक (48) थे। निष्कर्षों से पता चला कि 82% से अधिक लोग मल में खून कोकोलोरेक्टल कैंसर का चेतावनी संकेत नहीं मानते, जो कम जागरूकता को दर्शाता है। चिकित्सा सहायता लेने में देरी भी चिंताजनक है, जहां 85.6% लोग मल त्याग की आदतों में बदलाव होने पर (कब्ज या दस्त) ओवर-द-काउंटर दवाओं या जीवनशैली में बदलाव का विकल्प चुनते हैं, जबकि केवल 14.4% डॉक्टर से परामर्श लेते हैं। शहर में पाचन संबंधी लक्षण व्यापक रूप से देखेगए, जहां61.2% लोगों ने अनियमित मल त्याग का अनुभव किया और 81% से अधिक ने कभी-कभी अधूरे मल त्याग का अनुभव होने की बात कही, जिसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है।

डॉ. अभिषेक पाठक ने कहा, “कोलोरेक्टल कैंसर कोलन या रेक्टममें विकसित होता है और अक्सर छोटे वृद्धि (पॉलीप्स) के रूप मेंशुरू होता है, जो बिना उपचार के धीरे-धीरे कैंसर में बदल सकता है। जोखिम कारकों में कम फाइबर वाला आहार, मोटापा, निष्क्रिय जीवनशैली, तंबाकू सेवन और उम्र शामिल हैं। लगातार मल त्याग में बदलाव, मल में खून, पेट में असहजता, थकान या बिना कारण वजन कम होना जैसे लक्षणों को नजरअंदाज न करें। कोलोरेक्टल कैंसर का प्रारंभिक अवस्था में कोलोनोस्कोपी जैसी जांचों से पता लगाकर प्रभावी उपचार संभव है।”

डॉ. अभिषेक कुमार सिंह ने कहा, “लखनऊ के सर्वेक्षण के निष्कर्ष स्वयं-उपचार और कोलोरेक्टल कैंसर के प्रति कम जागरूकता को लेकर गंभीर चिंता दर्शाते हैं। अधिकांश लोग चिकित्सा सलाह लेने के बजाय घरेलू उपायों या ओवर-द-काउंटर दवाओं पर निर्भर रहते हैं, जिससे मूल बीमारी छिप जाती है और निदान में देरी होती है। इससे भी अधिक चिंताजनक यह है कि कई लोग मल में खून को कोलोरेक्टल कैंसर का प्रमुख चेतावनी संकेत नहीं मानते, जिसके कारण बीमारी का पता उन्नत अवस्था में चलता है। अनियमित मल त्याग जैसी समस्याओं को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए, क्योंकि समय पर जांच और चिकित्सा परामर्श से शुरुआती अवस्था में पहचान, बेहतर जीवित रहने की संभावना और बेहतर परिणाम सुनिश्चित किए जा सकते हैं।”

डॉ. सौरभ मिश्रा ने कहा कि जीवनशैली की आदतें कोलोरेक्टल कैंसर के बढ़ते मामलों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। प्रोसेस्ड या बाहर के भोजन का अधिक सेवन, शारीरिक गतिविधि की कमी, तंबाकू का उपयोग और मोटापा जोखिम को बढ़ा सकते हैं। फाइबर युक्त आहार अपनाना, नियमित व्यायाम करना, तंबाकू से बचना और नियमित जांच कराना कोलोरेक्टल कैंसर के जोखिम को कम करने और समग्र पाचन स्वास्थ्य में सुधार करने में मदद कर सकता है।
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