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कचरे में छिपी ऊर्जा को निखारेगा RGIPT, हाइड्रोजन से मीथेन तक होगा उत्पादन

  • तीन-स्तरीय विकेंद्रीकृत मॉडल से गांवों और शहरी बस्तियों में होगा कचरे का निस्तारण, अप्रैल 2027 में पायलट परियोजना शुरू करने की तैयारी

लखनऊ (शम्भू शरण वर्मा / टेलीस्कोप टुडे)। कचरा अब शहरों के लिए मुसीबत नहीं, बल्कि ऊर्जा और कमाई का नया जरिया बनेगा। जायस अमेठी में स्थित राजीव गांधी पेट्रोलियम प्रौद्योगिकी संस्थान (आरजीआईपीटी) कचरे से हाइड्रोजन, बायोगैस और मीथेन बनाने की अत्याधुनिक तकनीक विकसित कर रहा है। संस्थान का लक्ष्य गांवों और शहरी बस्तियों में छोटे विकेंद्रीकृत संयंत्र स्थापित कर कचरे का स्थानीय स्तर पर निस्तारण करना है। अप्रैल 2027 में इस तकनीक का पायलट प्रोजेक्ट शुरू करने की तैयारी है। सफल होने पर कचरे से ऊर्जा और रोजगार, दोनों के नए रास्ते खुलेंगे।

राजीव गांधी पेट्रोलियम प्रौद्योगिकी संस्थान के निदेशक प्रो. हरीश हिरानी ने बताया कि शहरीकरण के साथ कचरा प्रबंधन और प्रदूषण की समस्या लगातार गंभीर होती जा रही है। शहरों के बीच आ चुके पुराने कचरा निस्तारण केंद्रों के कारण आसपास के क्षेत्रों में प्रदूषण की समस्या बनी हुई है। इस समस्या के स्थायी समाधान के लिए संस्थान विकेंद्रीकृत कचरा प्रबंधन प्रणाली विकसित करने पर शोध कर रहा है। इसके तहत कचरे को दूर स्थित डंपिंग ग्राउंड तक पहुंचाने के बजाय स्थानीय स्तर पर ही उसका वैज्ञानिक तरीके से निस्तारण कर ऊर्जा में बदलने की योजना है।

उन्होंने कहा कि मौजूदा व्यवस्था में कचरे को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने के लिए बड़ी संख्या में वाहनों का इस्तेमाल होता है। इससे डीजल की खपत और प्रदूषण दोनों बढ़ते हैं। यदि हर क्षेत्र की जरूरत के अनुसार विकेंद्रीकृत व्यवस्था विकसित की जाए तो कचरे के परिवहन पर होने वाला खर्च और उससे उत्पन्न प्रदूषण कम किया जा सकता है।

प्रो. हिरानी ने बताया कि घरेलू कचरे का लगभग 70 से 80 प्रतिशत हिस्सा जैविक होता है। इससे मीथेन और अन्य उपयोगी गैसें तैयार की जा सकती हैं, जिनका इस्तेमाल एलपीजी के विकल्प के रूप में किया जा सकता है। हालांकि, देश में गोबर गैस और बायोगैस की पुरानी तकनीकें पहले से मौजूद हैं, लेकिन उनकी कुछ सीमाएं हैं। संस्थान इन कमियों को दूर करते हुए अधिक प्रभावी और आधुनिक तकनीक विकसित करने में जुटा है।

उन्होंने बताया कि संस्थान में तीन चरणों वाली एकीकृत तकनीक पर शोध किया जा रहा है। इसमें पहले हाइड्रोजन, फिर बायोगैस और उसके बाद मीथेन के उत्पादन की प्रक्रिया विकसित की जा रही है। इसके साथ ही मीथेन उत्पादन के बाद दोबारा हाइड्रोजन प्राप्त करने की संभावनाओं पर भी काम हो रहा है। इन सभी प्रक्रियाओं को एकीकृत कर ऐसा मॉडल तैयार करने का प्रयास है, जिससे कचरे का अधिकतम उपयोग किया जा सके और ऊर्जा उत्पादन को आर्थिक रूप से भी व्यवहार्य बनाया जा सके।

तीन-चार गांवों को जोड़कर तैयार होगा मॉडल

निदेशक ने कहा कि इस तकनीक को बड़े और महंगे संयंत्रों तक सीमित रखने के बजाय छोटे मॉड्यूलर संयंत्रों के रूप में विकसित करने की योजना है। तीन-चार गांवों को मिलाकर एक विकेंद्रीकृत कचरा प्रबंधन केंद्र स्थापित किया जा सकता है। इसी तरह शहरी क्षेत्रों में भी दो से तीन हजार की आबादी वाले समूहों के लिए स्थानीय स्तर पर संयंत्र लगाए जा सकते हैं। इससे कचरे का निस्तारण उसी क्षेत्र में होगा और उससे पैदा होने वाली ऊर्जा का उपयोग भी स्थानीय जरूरतों के लिए किया जा सकेगा।

उन्होंने बताया कि संस्थान की योजना अप्रैल 2027 में इस तकनीक का पायलट प्रोजेक्ट शुरू करने की है। इसके लिए मुख्यमंत्री को आमंत्रित करने का भी प्रयास किया जाएगा, ताकि परियोजना का प्रदर्शन कर इसके विस्तार की संभावनाओं पर चर्चा की जा सके। सफल होने पर इस मॉडल को प्रदेश के गांवों और शहरी क्षेत्रों में लागू करने की दिशा में कदम बढ़ाए जाएंगे।

सीएसआर फंड से लग सकेंगे संयंत्र

प्रो. हिरानी ने कहा कि इस योजना को लागू करने के लिए सरकार पर पूरी तरह निर्भर रहने की जरूरत नहीं होगी। कई कंपनियों के पास कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (सीएसआर) के तहत धन उपलब्ध होता है। इस राशि का इस्तेमाल गांवों और शहरी बस्तियों में छोटे कचरा प्रबंधन संयंत्र स्थापित करने के लिए किया जा सकता है। इससे स्थानीय स्तर पर स्वच्छता, पर्यावरण संरक्षण और ऊर्जा उत्पादन को एक साथ बढ़ावा मिलेगा।

उन्होंने कहा कि इस पूरी पहल का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य कचरे को आर्थिक रूप से उपयोगी संसाधन में बदलना है। अभी नगर निकायों को कचरा उठाने, उसके परिवहन और डंपिंग के लिए जमीन उपलब्ध कराने पर खर्च करना पड़ता है। संस्थान ऐसी तकनीक विकसित करना चाहता है, जिससे भविष्य में कचरा निस्तारण की लागत कम होने के साथ उससे आय अर्जित करने की संभावनाएं भी पैदा हों।

प्रो. हिरानी के अनुसार कागज, भोजन के अवशेष और अन्य जैविक कचरे में ऊर्जा की पर्याप्त क्षमता होती है। जरूरत इस बात की है कि उसमें मौजूद ऊर्जा का वैज्ञानिक और प्रभावी तरीके से उपयोग किया जाए। यदि कचरे से उपयोगी ईंधन और गैसों का उत्पादन आर्थिक रूप से लाभकारी साबित होता है तो इस क्षेत्र में नए स्टार्टअप और उद्यमों के लिए भी बड़े अवसर पैदा होंगे।

उन्होंने कहा कि संस्थान अभी शोध और तकनीकी परीक्षण के चरण में है। तीनों प्रक्रियाओं को एकीकृत करने, लागत कम करने और संयंत्र को व्यावसायिक रूप से उपयोगी बनाने पर काम किया जा रहा है। लक्ष्य है कि छोटे, किफायती और मॉड्यूलर संयंत्रों के माध्यम से गांवों और शहरों की कचरा समस्या का स्थानीय स्तर पर समाधान निकाला जा सके।