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12 सेमी के फाइब्रॉएड ने बढ़ाई मुश्किलें, एडवांस्ड सर्जरी से गर्भाशय सुरक्षित

लखनऊ (टेलीस्कोप टुडे संवाददाता)। रीजेंसी हेल्थ लखनऊ में गायनेकोलॉजी के एक चुनौतीपूर्ण और दुर्लभ मामले में गर्भाशय के अंदर मौजूद 12 × 10 cm आकार के एक बहुत बड़े फाइब्रॉएड (इंट्राकैविटरी सबम्यूकोसल यूटेराइन फाइब्रॉएड) को हिस्टेरोस्कोपी के जरिए सफलतापूर्वक निकाल दिया गया। इसमें गर्भाशय पर कोई चीरा नहीं लगाना पड़ा। फाइब्रॉएड के बहुत बड़े आकार और मरीज के गंभीर लक्षणों को देखते हुए उसे अपने शहर में गर्भाशय निकलवाने यानी हिस्टेरेक्टॉमी की सलाह दी गई थी। लेकिन एडवांस्ड सर्जिकल विशेषज्ञता की मदद से उसका गर्भाशय सुरक्षित बचा लिया गया और गर्भाशय पर कोई चीरा लगाने की जरूरत भी नहीं पड़ी।

महिला को पेट में तेज दर्द, पेशाब रुकने की समस्या, गर्भाशय ग्रीवा (सर्विक्स) के काफी फैल जाने और योनि से लगातार बदबूदार स्राव होने की शिकायत थी।फाइब्रॉएड ने एंडोमेट्रियल कैविटी को लगभग पूरी तरह से घेर लिया था और सर्वाइकल कैनाल को काफी फैला दिया था, जिसके कारण गंभीर लक्षण और जटिलताएं पैदा हो गईं।

यह मामला समय पर डायग्नोसिस, स्त्री रोग संबंधी लक्षणों के प्रति जागरूकता और एडवांस्ड ‘मिनिमली इनवेसिव’  यानी कम चीर-फाड़ वाली सर्जिकल तकनीकों की उपलब्धता को दर्शाता है। सबम्यूकोसल फाइब्रॉइड अपेक्षाकृत छोटे होने पर भी महत्वपूर्ण लक्षण पैदा कर सकते हैं, कभी-कभी इनका आकार मात्र 1 सेंटीमीटर होता है। हालांकि गर्भाशय गुहा के अंदर लगभग 12 सेंटीमीटर के फाइब्रॉइड का होना असामान्य बात है। इस तरह के फाइब्रॉइड को निकालना सर्जरी के लिहाज़ से चुनौतीपूर्ण होता है। खासकर जब मरीज को पेशाब रुकने, गर्भाशय ग्रीवा के फैलने और लंबे समय तक योनि से स्राव होने जैसी समस्याएं भी हों, तो इलाज और ज्यादा जटिल हो जाता है।

सर्जिकल प्रक्रिया के दौरान महिला में एंडोमेट्रियोसिस का स्टेज IV (या ग्रेड 4) भी पाया गया। यह इस बीमारी का एक गंभीर रूप होता है। एंडोमेट्रियोटिक लीजन्स का इलाज लैप्रोस्कोपिक एक्सीजन से किया गया। इस तरह मिनिमली इनवेसिव तकनीकों का इस्तेमाल करके एक ही ऑपरेशन में स्त्री रोग संबंधी दो महत्वपूर्ण बीमारियों का इलाज संभव हो सका।

रीजेंसी हेल्थ लखनऊ की ऑब्सटेट्रिशियन और गायनेकोलॉजिस्ट कंसल्टेंट तथा एडवांस्ड लैप्रोस्कोपिक सर्जन डॉ. शालिनी सिंह ने फाइब्रॉएड और एंडोमेट्रियोसिस की शुरुआती जांच और सही इलाज के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि लक्षणों के पहली बार दिखने पर ही महिलाओं को डॉक्टर से कंसल्ट करना चाहिए न कि डर, शर्म या जानकारी की कमी के कारण इलाज में देरी करनी चाहिए। समय रहते बीमारी का पता चलने से जटिलताओं को रोकने में मदद मिल सकती है, इलाज के तरीके कम जटिल हो सकते हैं, और संभव होने पर प्रजनन अंगों को भी सुरक्षित रखा जा सकता है।