Tuesday , September 15 2026

धरती के ऊपर जीवन का अदृश्य सुरक्षा कवच

विश्व ओजोन दिवस (16 सितम्बर) पर विशेष

(डॉ. एस.के. गोपाल)

हम रोज सूरज को देखते हैं। उसकी रोशनी से दिन होता है और उसकी गर्मी से धरती पर जीवन चलता है। लेकिन सूर्य की रोशनी में कुछ ऐसी किरणें भी होती हैं जो जीव-जगत के लिए नुकसानदेह हो सकती हैं। इनसे धरती को बचाने में वायुमंडल में मौजूद ओजोन की महत्वपूर्ण भूमिका है। यह प्रकृति की ऐसी सुरक्षा व्यवस्था है जिसका महत्व दिखाई नहीं देता लेकिन असर हमारे जीवन पर लगातार बना रहता है।

ओजोन एक गैस है। इसका करीब नब्बे प्रतिशत हिस्सा समताप मंडल में पाया जाता है। यह वायुमंडल का वह क्षेत्र है जो धरती से ऊपर फैला हुआ है। ओजोन सूर्य से आने वाली हानिकारक पराबैंगनी किरणों को सोखने में मदद करती है। खासकर पराबैंगनी-बी किरणों से बचाव में इसकी बड़ी भूमिका है। इन किरणों की अधिक मात्रा त्वचा और आंखों को नुकसान पहुंचा सकती है। लंबे समय तक अधिक संपर्क त्वचा के कैंसर और मोतियाबिंद का खतरा बढ़ा सकता है। इसका असर खेती और जल में रहने वाले जीवों पर भी पड़ सकता है।

यह समझना जरूरी है कि ओजोन परत कोई ठोस चादर नहीं है जो पूरी धरती को ढककर रखती हो। यह वायुमंडल का ऐसा क्षेत्र है जहां ओजोन की मात्रा अपेक्षाकृत अधिक होती है। ओजोन बनती और टूटती रहती है। सामान्य स्थिति में यह संतुलन बना रहता है। समस्या तब पैदा हुई जब मनुष्य ने कुछ ऐसे रसायनों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल शुरू किया जो इस संतुलन को बिगाड़ सकते थे। सीएफसी और हैलोन ऐसे रसायनों के प्रमुख उदाहरण हैं। ये रसायन वातावरण में लंबे समय तक बने रहकर धीरे-धीरे ऊपरी वायुमंडल तक पहुंच सकते हैं। वहां सूर्य की ऊर्जा इनके अणुओं को तोड़ती है। इससे क्लोरीन और ब्रोमीन जैसे तत्व मुक्त होते हैं। ये तत्व रासायनिक प्रतिक्रियाओं के जरिए ओजोन के अणुओं को तोड़ते हैं और स्वयं फिर से सक्रिय हो सकते हैं। इस कारण थोड़ी मात्रा में मौजूद ये पदार्थ भी लंबे समय तक ओजोन को नुकसान पहुंचा सकते हैं। समस्या की गंभीरता तब सामने आई जब वैज्ञानिकों ने देखा कि कुछ क्षेत्रों में ओजोन की मात्रा तेजी से कम हो रही है। आम भाषा में इसे ‘ओजोन छिद्र’ कहा गया। इसका अर्थ आसमान में किसी वास्तविक छेद से नहीं है। यह ऐसे क्षेत्र को कहा जाता है जहां ओजोन की मात्रा बहुत कम हो जाती है। इस खोज ने दुनिया को चेताया कि मनुष्य की गतिविधियों का असर धरती से बहुत ऊपर तक पहुंच सकता है।

इस चुनौती के सामने दुनिया के देशों ने मिलकर कदम उठाए जिसका उद्देश्य ओजोन परत को नुकसान पहुंचाने वाले रसायनों के उत्पादन और इस्तेमाल को नियंत्रित करना था। इसके बाद अनेक देशों ने अपने नियम बदले, उद्योगों ने सुरक्षित विकल्प अपनाए और नुकसान पहुंचाने वाले पदार्थों का इस्तेमाल लगातार कम किया। यह पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय सहयोग का एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन गया।

इन प्रयासों का परिणाम अब दिखाई दे रहा है। संयुक्त राष्ट्र के वैज्ञानिक आकलन के अनुसार प्रतिबंधित ओजोन-क्षयकारी पदार्थों में लगभग 99 प्रतिशत की कमी की जा चुकी है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन के हालिया आकलन के अनुसार ओजोन परत दीर्घकालिक सुधार की दिशा में आगे बढ़ रही है। वर्ष 2025 में ओजोन छिद्र पिछले पांच वर्षों में सबसे छोटा रहा और सामान्य से पहले समाप्त हुआ। हालांकि हर वर्ष की स्थिति अलग हो सकती है और मौसम संबंधी परिस्थितियां भी इसका आकार और अवधि प्रभावित करती हैं।

ओजोन की कहानी हमें एक महत्वपूर्ण सीख देती है। पर्यावरण की समस्या कितनी भी कठिन क्यों न हो, यदि उसके कारणों को वैज्ञानिक ढंग से समझा जाए और देश मिलकर समाधान खोजें तो स्थिति बदली जा सकती है। ओजोन के मामले में दुनिया ने समय रहते खतरे को पहचाना, नियम बनाए और उन्हें लागू किया। आज दिखाई दे रहा सुधार इसी सामूहिक प्रयास का परिणाम है। फिर भी काम पूरा नहीं हुआ है। ओजोन की स्थिति पर लगातार निगरानी जरूरी है। ऐसे रसायनों पर नियंत्रण बनाए रखना होगा, जो ओजोन को नुकसान पहुंचा सकते हैं। नई तकनीक विकसित करते समय भी पर्यावरण की सुरक्षा को ध्यान में रखना होगा। सरकारों, वैज्ञानिक संस्थानों और उद्योगों की इसमें बड़ी जिम्मेदारी है। आम नागरिक भी जागरूक रहकर सहयोग कर सकते हैं। पुराने रसायनों का लापरवाही से निपटान न करना, सुरक्षित विकल्पों को अपनाना और ओजोन की सुरक्षा के बारे में सही जानकारी साझा करना उपयोगी कदम हैं।

16 सितंबर का विश्व ओजोन दिवस हमें इसी जिम्मेदारी की याद दिलाता है। ओजोन परत दिखाई नहीं देती, लेकिन उसका महत्व धरती पर रहने वाले हर व्यक्ति से जुड़ा है। दुनिया ने समय रहते कदम उठाए और उसका परिणाम सामने आया। अब जरूरत इस उपलब्धि को बनाए रखने की है। ओजोन की रक्षा केवल वायुमंडल की एक परत की रक्षा नहीं है। यह धरती पर जीवन को सुरक्षित रखने और आने वाली पीढ़ियों के लिए बेहतर पर्यावरण छोड़ने का संकल्प है।

(लेखक डॉ. एस.के. गोपाल स्वतंत्र पत्रकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं)