मुंबई (टेलीस्कोप टुडे संवाददाता)। सोनी सब का हस्तिनापुर के वीर उन रिश्तों, मूल्यों और सीखों को प्रदर्शित हुए, पांडवों और कौरवों के अनकहे बचपन को जीवंत कर रहा है, जो उनके भविष्य को आकार देते हैं। युवा राजकुमारों का मार्गदर्शन करने वाले प्रमुख व्यक्तित्वों में से एक हैं द्रोणाचार्य, जिन्हें जितेन लालवानी निभा रहे हैं। उनका अनुशासन, ज्ञान और मार्गदर्शन अगली पीढ़ी के योद्धाओं को तैयार करने में निर्णायक भूमिका निभाता है।
इस बातचीत में जितेन लालवानी ने द्रोणाचार्य की भूमिका में कदम रखने, इस महान गुरु को चित्रित करने के अपने दृष्टिकोण, युवा कलाकारों के साथ काम करने, द्रोणाचार्य को कालातीत बनाने वाले मूल्यों और हस्तिनापुर के वीर में उनकी यात्रा से दर्शकों को मिलने वाले संदेशों पर चर्चा की।
1. जब आपको द्रोणाचार्य का किरदार ऑफर किया गया, तो आपका पहला विचार क्या था?
मेरा पहला विचार यह था कि यह सिर्फ कोई साधारण किरदार नहीं, बल्कि एक बड़ी ज़िम्मेदारी है। द्रोणाचार्य एक प्रतिष्ठित व्यक्तित्व हैं, जिनके बारे में पीढ़ियाँ पढ़ती और सुनती आई हैं। एक अभिनेता के रूप में मुझे यह भूमिका मिलने पर गर्व हुआ, लेकिन साथ ही मुझे पता था कि दर्शकों के मन में पहले से ही उनकी एक मजबूत छवि है। मेरा उद्देश्य उन्हें ईमानदारी, गरिमा, गंभीरता और भावनात्मक गहराई के साथ प्रस्तुत करना रहा है, उनके सार के प्रति सच्चे रहते हुए और अपनी व्याख्या भी जोड़ते हुए।
2. चूँकि, यह शो पांडवों और कौरवों के बचपन को प्रदर्शित करता है, इसलिए दर्शकों को द्रोणाचार्य का कौन-सा नया रूप देखने को मिल रहा है?
अधिकांश रूपांतरणों ने द्रोणाचार्य को महाभारत युद्ध या उनके जीवन के बाद के चरणों में पेश किया है। हस्तिनापुर के वीर में दर्शक उन्हें एक गुरु के रूप में देख रहे हैं, जो युवा मन को आकार दे रहे हैं। वे उनकी धैर्यता, करुणा, शिक्षक के रूप में संघर्ष और बच्चों को मार्गदर्शन देने की ज़िम्मेदारी देख रहे हैं, जो एक दिन इतिहास बनाएँगे। मुझे लगता है कि इससे द्रोणाचार्य और अधिक मानवीय और संबंधित लगते हैं।
3. पौराणिक कथाओं के सबसे महान गुरुओं में से एक का किरदार निभाते हुए, क्या इस भूमिका ने आपको वास्तविक जीवन में मार्गदर्शन के महत्व पर विचार करने पर मजबूर किया?
हर सफल व्यक्ति के पीछे कोई होता है जो उस पर विश्वास करता है, उसे मार्गदर्शन देता है और बेहतर बनने के लिए प्रेरित करता है। अपने अभिनय सफर में मुझे शानदार निर्देशकों और वरिष्ठ कलाकारों जैसे सुधीर पांडे जी और सूरज थापर से सीखने का सौभाग्य मिला। मुझे दो अवसरों पर महान दिलीप कुमार साहब से जुड़ी प्रस्तुतियों में काम करने का दुर्लभ अवसर भी मिला। सबसे खास यह रहा कि मुझे लगभग एक साल तक उनके घर जाने, उनसे बातचीत करने, उनके विचार सुनने और अभिनय की बारीकियों को सीधे उस महान कलाकार से समझने का मौका मिला। वे अनुभव मेरे करियर में अमूल्य सबक बन गए, जो हमेशा मेरे साथ रहे हैं। द्रोणाचार्य का किरदार निभाते हुए मुझे यह याद आया कि एक सच्चा गुरु केवल कोई कौशल नहीं सिखाता, बल्कि व्यक्ति के चरित्र, मूल्यों और आत्मविश्वास को आकार देता है। यह ऐसी बात है, जिस पर मैं गहराई से विश्वास करता हूँ।
4. द्रोणाचार्य अपने हर विद्यार्थी के साथ एक अलग और खास रिश्ता साझा करते हैं। आपने युवा कलाकारों के साथ उन रिश्तों को बनाने का तरीका कैसे अपनाया?
हमारे पास बच्चों का एक शानदार समूह है। वे बेहद प्रतिभाशाली, अच्छे संस्कार वाले और सीखने के लिए उत्सुक हैं। जब हमने साथ काम करना शुरू किया, तो अपने आप ही अपनापन, भरोसा और आपसी सम्मान विकसित हो गया। मुझे लगता है कि यह स्क्रीन पर बहुत खूबसूरती से दिखाई दिया। इसने गुरु-शिष्य के रिश्तों को सिर्फ अभिनय नहीं बल्कि सच्चा और ईमानदार बना दिया।
5. ऑफ-स्क्रीन क्या आप खुद को बच्चों के कलाकारों को उसी तरह मार्गदर्शन या मेंटर करते हुए पाते हैं, जैसे द्रोणाचार्य ऑन-स्क्रीन करते हैं?
जब भी वे सलाह माँगते हैं, मैं हमेशा मदद करने के लिए तैयार रहता हूँ। मुझे अपने वर्षों का अनुभव उनके साथ साझा करने में बहुत आनंद आता है। कभी यह अभिनय से जुड़ा होता है और कभी धैर्य, अनुशासन या ज़मीन से जुड़े रहने की बात होती है। चूँकि, उन्हें बातें करना बहुत पसंद है, मैं उन्हें कहता हूँ “यदि तुम चाहते हो कि दुनिया में लोग तुम्हारी बातें करें, तो सेट पर आकर किसी और की बातें मत करो।“ हम सब मिलकर बहुत मज़े करते हैं। आज के बच्चे बेहद प्रतिभाशाली हैं और बहुत जल्दी सीखते हैं, इसलिए यह हमेशा दो-तरफ़ा आदान-प्रदान होता है। मैं भी इन छोटे चैंपियंस से उतना ही सीख रहा हूँ जितना वे मुझसे सीख रहे हैं।
6. कई लोग द्रोणाचार्य को एक सख्त गुरु के रूप में जानते हैं। क्या हस्तिनापुर के वीर उनकी शख्सियत का कोई अलग पहलू सामने लाता है?
हाँ, बिल्कुल। अनुशासन द्रोणाचार्य की शख्सियत का अहम् हिस्सा है, लेकिन करुणा के बिना अनुशासन का कोई बड़ा अर्थ नहीं रह जाता। हस्तिनापुर के वीर में द्रोणाचार्य की बुद्धिमत्ता, संवेदनशीलता और हर विद्यार्थी के अलग व्यक्तित्व और परिस्थितियों के बावजूद उन्हें बराबरी से देखने की भावनात्मक ज़िम्मेदारी को प्रदर्शित किया गया है। दर्शक एक ऐसे द्रोणाचार्य को देखेंगे, जो सख्त हैं, लेकिन देखभाल करने वाले भी, अधिकारपूर्ण हैं, लेकिन अपने हर विद्यार्थी की तरक्की में गहराई से जुड़े हुए हैं।
7. द्रोणाचार्य का मानना था कि अनुशासन ही उत्कृष्टता का आधार है। क्या आप भी अपनी ज़िंदगी में इसी सोच को अपनाते हैं?
हाँ, बिल्कुल। इस इंडस्ट्री में लगभग तीन दशक बिताने के बाद मैंने समझा है कि प्रतिभा दरवाज़े खोल सकती है, लेकिन अनुशासन ही उन दरवाज़ों को खुला रखता है। समय पर पहुँचना, अपने सीन की तैयारी करना, टीम का सम्मान करना और लगातार खुद पर काम करना, ये आदतें क्षणिक सफलता से कहीं ज़्यादा मायने रखती हैं। अनुशासन ही सबसे बड़ा कारण रहा है, जिसकी वजह से मैं अपने करियर को इतने लंबे समय तक बनाए रख पाया हूँ।
8. आपके हिसाब से माता-पिता और बच्चे द्रोणाचार्य की यात्रा से हस्तिनापुर के वीर में कौन-कौन से सबक ले सकते हैं?
सबसे बड़ा संदेश यही है कि मूल्यों की नींव बचपन में ही बनती है। हस्तिनापुर के वीर हमें यह याद दिलाता है कि माता-पिता और शिक्षक मिलकर सिर्फ सक्षम व्यक्तियों को नहीं, बल्कि अच्छे इंसानों को गढ़ने में अहम् भूमिका निभाते हैं। यह शो बताता है कि ज्ञान हमेशा विनम्रता, सम्मान, धैर्य और ईमानदारी के साथ जुड़ा होना चाहिए। ये शाश्वत मूल्य आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं, जितने हज़ारों साल पहले थे।
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