जयंती (21 जुलाई) पर विशेष
(डॉ. एस.के. गोपाल)
फिल्मी गीत समाज में लोक-संस्कृति का जीवंत हिस्सा रहे हैं। हमारी खुशियाँ, बिछोह, प्रेम, मित्रता, उत्सव, भक्ति और जीवन-दर्शन, सब किसी न किसी गीत में अपना प्रतिबिंब पाते हैं। यही कारण है कि हिंदी फिल्म संगीत के महान रचनाकारों की चर्चा केवल सिनेमा तक सीमित नहीं रहती, सांस्कृतिक विमर्श का विषय भी बन जाती है। 21 जुलाई 1930 को जन्मे आनंद बक्शी ऐसे ही गीतकार थे, जिन्होंने शब्दों को जन-जीवन का हिस्सा बना दिया।
रावलपिंडी में जन्मे आनंद बक्शी ने विभाजन की पीड़ा देखी। विस्थापन का अनुभव किया और संघर्षों से भरा जीवन जिया। भारतीय सेना में सेवा देने के बाद उन्होंने फिल्मों में अपनी पहचान बनाने का कठिन मार्ग चुना। अनेक असफलताओं और आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी। अंततः उनकी प्रतिभा को अवसर मिला और फिर उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। यह यात्रा केवल एक सफल गीतकार बनने की कहानी नहीं अपितु यह विश्वास भी जगाती है कि प्रतिभा, धैर्य और निरंतर परिश्रम अंततः अपना स्थान बना ही लेते हैं।
आनंद बक्शी का सबसे बड़ा योगदान यह था कि उन्होंने हिंदी फिल्म गीतों को अभिजात्य साहित्यिक भाषा से निकालकर जनभाषा का स्वाभाविक रूप दिया। उन्होंने यह समझ लिया था कि गीत तभी अमर होगा जब उसे आम आदमी सहजता से गा सके और उसमें अपने जीवन की अनुभूति खोज सके। इसलिए उनके गीतों में कृत्रिम शब्दाडंबर नहीं मिलता। वे कठिन प्रतीकों की जगह सरल शब्दों से गहरे भाव व्यक्त करते हैं। यही कारण है कि मेरे सपनों की रानी, कुछ तो लोग कहेंगे, आदमी मुसाफिर है, ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे और तुझे देखा तो ये जाना सनम जैसे गीत दशकों बाद भी उतने ही आत्मीय लगते हैं।
लोकप्रियता को अक्सर गंभीर साहित्य के विपरीत माना जाता है लेकिन आनंद बक्शी ने इस भ्रम को तोड़ा। उन्होंने सिद्ध किया कि सरल भाषा भी गहन विचारों की वाहक हो सकती है। कुछ तो लोग कहेंगे’ गीत सामाजिक आलोचना से ऊपर उठने का संदेश देता है। आदमी मुसाफिर है गीत जीवन की अनिश्चितता और समय की गति का दार्शनिक बोध कराता है। ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे गीत मित्रता को केवल भावनात्मक नहीं अपितु सामाजिक विश्वास के रूप में स्थापित करता है। यही कारण है कि उनके अनेक गीत आज भी उद्धृत किए जाते हैं और जीवन के विभिन्न अवसरों पर सहज ही लोगों की जुबान पर आ जाते हैं।
उनकी रचनात्मक क्षमता का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी था कि वे समय के साथ स्वयं को बदलते रहे। उन्होंने कई पीढ़ियों के संगीतकारों और फिल्मकारों के साथ काम किया। राजेश खन्ना के रोमांटिक दौर से लेकर शाहरुख खान के उदारीकरण काल तक उनकी लेखनी समान रूप से प्रभावशाली बनी रही। बदलती संगीत-शैली, नई तकनीक और नए श्रोताओं के बीच भी उन्होंने अपनी प्रासंगिकता बनाए रखी। यह किसी भी रचनाकार की सबसे बड़ी सफलता होती है।
आज का समय त्वरित उपभोग और क्षणिक लोकप्रियता का समय है। डिजिटल मंचों पर गीत कुछ दिनों में आते और चले जाते हैं। ऐसे दौर में आनंद बक्शी की रचनाएँ यह बताती हैं कि किसी गीत की वास्तविक शक्ति उसके शब्दों में होती है। संगीत बदल सकता है, प्रस्तुति बदल सकती है लेकिन यदि शब्द जीवन की सच्चाइयों से जुड़े हों तो वे समय की सीमाएँ लांघ जाते हैं। यही कारण है कि नई पीढ़ी भी उनके गीतों को सुनती है और पुराने श्रोता उनमें अपनी स्मृतियों का संसार खोज लेते हैं।
आनंद बक्शी का महत्व केवल इसलिए नहीं है कि उन्होंने हजारों गीत लिखे। उनका महत्व इसलिए भी है कि उन्होंने करोड़ों भारतीयों की भावनाओं को शब्द दिए। उनके गीतों ने प्रेम को अभिव्यक्ति दी, बिछड़ने को संवेदना दी, मित्रता को उत्सव बनाया और जीवन के संघर्षों में आशा का संचार किया। उन्होंने यह भी सिद्ध किया कि लोकप्रिय संस्कृति समाज के सांस्कृतिक इतिहास का महत्वपूर्ण दस्तावेज होती है। किसी समाज की भावनात्मक स्मृति को समझना हो तो उसके गीतों को समझना आवश्यक है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम आनंद बक्शी जैसे रचनाकारों को केवल फिल्मी गीतकार के रूप में न देखें बल्कि उन्हें भारतीय सांस्कृतिक चेतना के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर के रूप में स्वीकार करें। उनके गीतों में लोकभाषा की सहजता, भारतीय जीवन-मूल्यों की गरिमा और मानवीय संवेदनाओं की व्यापकता एक साथ दिखाई देती है। यही गुण उन्हें कालजयी बनाते हैं। जो रचना समय के साथ पुरानी नहीं होती वही वास्तव में कालजयी होती है। आनंद बक्शी ने शब्दों के माध्यम से यही अमरता प्राप्त की। उनकी रचनाएँ आज भी गुनगुनाई जाती हैं, आने वाली पीढ़ियाँ भी उन्हें गुनगुनाती रहेंगी। किसी रचनाकार के लिए इससे बड़ी उपलब्धि और कोई नहीं हो सकती।

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