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शादीशुदा पुरुष भी रह सकता है लिव-इन में, बालिग महिला की मर्जी सर्वोपरि: इलाहाबाद हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

Prayagraj : लिव-इन रिलेशनशिप की कानूनी वैधता को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण और नजीर बनने वाला फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई विवाहित पुरुष किसी बालिग महिला के साथ उसकी सहमति से लिव-इन रिलेशनशिप में रहता है, तो इसे कानून की नजर में अपराध नहीं माना जाएगा। कोर्ट ने साफ कहा कि दो बालिग व्यक्तियों को अपनी मर्जी से साथ रहने का अधिकार है और पुलिस इस मामले में दंडात्मक कार्रवाई नहीं कर सकती।शाहजहांपुर का मामला: अपहरण के आरोप में फंसा था प्रेमीयह पूरा विवाद शाहजहांपुर जिले के जैतीपुर थाने से शुरू हुआ था। याचिकाकर्ता नेत्रपाल के खिलाफ अनामिका नामक महिला की मां कांति ने 8 जनवरी 2026 को पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी। मां का आरोप था कि नेत्रपाल उनकी बेटी को बहला-फुसलाकर भगा ले गया है। इस शिकायत के आधार पर पुलिस ने नेत्रपाल के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 87 (अपहरण) के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया था। गिरफ्तारी से बचने और अपनी सुरक्षा के लिए इस जोड़े ने हाई कोर्ट की शरण ली थी।हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी: गिरफ्तारी पर लगाई रोक, सुरक्षा के निर्देशमामले की सुनवाई के दौरान इलाहाबाद हाई कोर्ट ने पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाए। अदालत ने पाया कि अनामिका बालिग है और उसने अपनी मर्जी से नेत्रपाल के साथ रहने का फैसला किया है। कोर्ट ने न केवल नेत्रपाल के खिलाफ दर्ज एफआईआर और किसी भी संभावित गिरफ्तारी पर रोक लगा दी, बल्कि शाहजहांपुर पुलिस को यह निर्देश भी दिया कि इस जोड़े को पर्याप्त सुरक्षा मुहैया कराई जाए ताकि उन्हें कोई परेशान न कर सके।क्या शादीशुदा शख्स के लिए यह ‘अपराध’ है? कोर्ट ने किया साफअक्सर समाज और कानून के बीच यह बहस रहती है कि क्या एक शादीशुदा व्यक्ति दूसरी महिला के साथ रह सकता है? हाई कोर्ट ने इस पर कानून की स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि अगर महिला बालिग है और अपनी मर्जी से साथ रह रही है, तो इसे ‘अपराध’ की श्रेणी में नहीं रखा जाएगा। हालांकि, यह उनके वैवाहिक जीवन के आधार पर सिविल कानूनों (तलाक या भरण-पोषण) को प्रभावित कर सकता है, लेकिन पुलिस इसमें अपराधी मानकर मुकदमा नहीं चला सकती। इस फैसले ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता और बालिगों की पसंद के अधिकार को एक बार फिर मजबूती दी है।