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शिक्षा के अधिकार को प्रभावी और न्यायसंगत तरीके से लागू करना अत्यंत आवश्यक : डॉ. मेधा विश्राम कुलकर्णी

नई दिल्ली : राज्यसभा में शून्यकाल के दौरान सदस्य डॉ. मेधा विश्राम कुलकर्णी ने शिक्षा के अधिकार के नियमों को प्रभावी और न्यायसंगत तरीके से लागू करने का मामला उठाया। सोमवार को उन्होंने कहा कि बच्चों के नि:शुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा के अधिकार अधिनियम, 2009 को लागू हुए लगभग 17 वर्ष हो चुके हैं, फिर भी देश में निरक्षरता तथा स्कूल से बाहर रहने वाले बच्चों की समस्या पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। आज देश में 6 से 17 वर्ष आयु वर्ग के बच्चों में स्कूल से बाहर रहने का प्रतिशत लगभग 16.8 प्रतिशत है तथा देश में कुल जनसंख्या का लगभग 19 प्रतिशत हिस्सा अभी भी निरक्षर है।उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र में शिक्षा के अधिकार के अंतर्गत कुल 1 लाख 9 हजार सीटें उपलब्ध हैं अर्थात मांग उपलब्ध सीटों से लगभग तिगुनी है, जिसके कारण अनेक गरीब और वंचित बच्चों को शिक्षा के अधिकार से वंचित रहना पड़ता है।इस परिस्थिति को देखते हुए शिक्षा के अधिकार की नीति में कुछ महत्वपूर्ण सुधार करना आवश्यक है।सबसे पहले, कई स्कूलों को अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान का दर्जा प्राप्त होने के कारण एक्ट के प्रावधानों से छूट दी गई है। परिणामस्वरूप इन स्कूलों में शिक्षा के अधिकार के अंतर्गत 25 प्रतिशथ आरक्षित सीटें लागू नहीं होतीं। वास्तव में अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा प्राप्त करते समय कम से कम 50 प्रतिशत छात्रों का अल्पसंख्यक समुदाय से होना अपेक्षित होता है, लेकिन व्यवहार में इन स्कूलों में बड़ी संख्या में बहुसंख्यक समुदाय के छात्र भी पढ़ते हैं। इसके बावजूद भी ये संस्थान अल्पसंख्यक दर्जा बनाए रखते हैं और आरटीई से छूट प्राप्त करते हैं, जो तर्कसंगत नहीं लगता। उन्होंने कहा कि सरकार को इन 25प्रतिशत सीटों की प्रतिपूर्ति समयबद्ध तरीके से करना आवश्यक है।इसके अलावा सरकारी और अनुदानित निजी स्कूलों को सरकार की ओर से पर्याप्त आर्थिक सहायता मिलती है। इन स्कूलों में शिक्षकों का वेतन सरकार देती है तथा अन्य सुविधाओं के लिए भी अनुदान उपलब्ध कराया जाता है। इन स्कूलों में अच्छा बुनियादी ढांचा (इन्फ्रास्ट्रक्चर) और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध होती है, इसलिए यह उचित होगा कि इन स्कूलों में भी शिक्षा के अधिकार के अंतर्गत प्रवेश की व्यवस्था की जाए, ताकि अधिक विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का लाभ मिल सके।साथ ही, कई स्कूलों में सीटें खाली रह जाती हैं, जिससे उपलब्ध संसाधनों का पूर्ण उपयोग नहीं हो पाता आरटीई के माध्यम से इन सीटों को भरा जाए तो इन संसाधनों का बेहतर उपयोग हो सकता है। उन्होंने सरकार से मांग की कि सरकारी, निजी अनुदानित तथा अल्पसंख्यक स्कूलों में भी आरटीई के विद्यार्थियों के लिए प्रवेश का मार्ग खोलने पर विचार किया जाए।आरटीई के अंतर्गत 25 प्रतिशत सीटों के लिए स्कूलों को देय प्रतिपूर्ति सरकार द्वारा समय पर प्रदान की जाए।