ईरान और इजराइल-अमेरिका के बीच चल रहे युद्ध का सिलसिला तीसरे हफ्ते में प्रवेश कर चुका है। 28 फरवरी को शुरू हुए संघर्ष के बीच ईरान में फंसे लगभग 70 भारतीय नागरिकों का पहला जत्था देश वापस लौटा। लौटते ही छात्रों ने युद्ध के दौरान अपने अनुभव और भय को साझा किया। कई छात्रों के लिए यह घर वापसी उन डरावने दिनों का अंत थी, जिन्हें उन्होंने बमबारी और धमाकों के बीच बिताया।22 वर्षीय नैना तोइबा ने राहत की सांस लेते हुए कहा, “मैं पहुंच गई हूं और अल्हम्दुलिल्लाह! मैं सुरक्षित हूं।” रविवार सुबह इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के टर्मिनल 3 पर बैगेज हॉल में पहुंचने के कुछ ही पलों बाद उन्होंने अपने भाई को यह बात फोन पर बताई।इनमें ज्यादातर छात्र जम्मू-कश्मीर के रहने वाले थे। ईरान से निकलने के लिए उन्होंने सड़क और हवाई मार्ग से लगभग चार दिन का सफर तय किया। बस से ईरान-आर्मेनिया सीमा पार की, फिर एंट्री के बाद येरेवन से दुबई के लिए उड़ान भरी और फिर दिल्ली की कनेक्टिंग फ्लाइट पकड़ी। युद्ध के कारण ईरानी हवाई क्षेत्र अभी भी बंद है।उर्मिया यूनिवर्सिटी ऑफ मेडिकल साइंसेज की एमबीबीएस छात्रा और अनंतनाग की निवासी नैना तोइबा ने बताया कि वह एक अपार्टमेंट में रह रही थीं, जब महज 200 मीटर दूर एक बम धमाका हुआ। इमारत के शीशे टूट गए और वह तुरंत अपने दोस्त के अपार्टमेंट में चली गईं। इंटरनेट और टीवी न होने के कारण बाहर की स्थिति का पता नहीं चल पा रहा था। उन्होंने किताबों और पढ़ाई को अपना सहारा बनाया।जैसे-जैसे हालात बिगड़ते गए, छात्रों ने अनाज और रोजमर्रा की जरूरी चीजें जमा कीं। नैना ने कहा कि हर सुबह वह यही सोचकर उठती थीं कि शायद यह उनका आखिरी दिन हो। “हमें सच में तब जाकर यकीन हुआ कि हम सुरक्षित अपने घर पहुंच पाएंगे, जब हमने आर्मेनिया की जमीनी सीमा पार कर ली।”
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