लखनऊ (शम्भू शरण वर्मा/टेलीस्कोप टुडे)। खाड़ी देशों में जारी युद्ध का असर अब आम लोगों की रसोई तक पहुंचने लगा है। रसोई गैस की किल्लत के चलते कई स्वास्थ्य संस्थानों, मेस और अन्नपूर्णा भोजनालयों की व्यवस्था प्रभावित हुई है, जिससे तीमारदारों और गरीबों को भोजन के लिए कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।
वहीं लक्ष्मण नगरी के जानकीपुरम क्षेत्र में स्थित सीता रसोई में यह संकट गरीबों की थाली तक नहीं पहुंचने दिया गया है। यहां आज भी मात्र 35 रुपये में दाल, रोटी, सब्जी और चावल सहित भरपेट भोजन उपलब्ध कराया जा रहा है।
लकड़ी के चूल्हे पर बन रहा भोजन
रसोई गैस की कमी का असर सीता रसोई पर भी पड़ा, लेकिन प्रबंधन ने वैकल्पिक व्यवस्था कर भोजन की सेवा जारी रखी।

संस्था के प्रबंधक गजेन्द्र सिंह ने बताया कि गैस सिलेंडरों की आपूर्ति मांग के अनुसार नहीं हो पा रही है। ऐसे में पिछले कई दिनों से गैस के साथ-साथ लकड़ी के चूल्हे पर भी भोजन तैयार किया जा रहा है। लकड़ी महंगी होने से खर्च जरूर बढ़ा है, लेकिन इसका असर गरीबों की थाली पर नहीं पड़ने दिया गया है। लोगों को पहले की तरह ही 35 रुपये में भरपेट भोजन कराया जा रहा है।
25 वर्षों से जारी है सेवा
सेक्टर-‘एफ’ जानकीपुरम स्थित श्री लक्ष्मण गौशाला परिसर में संचालित सीता रसोई में पिछले करीब 25 वर्षों से गरीब मजदूरों और जरूरतमंदों को सस्ता व भरपेट भोजन कराया जा रहा है। सुरभि शोध संस्थान द्वारा संचालित श्री अन्नपूर्णा सेवा समिति के माध्यम से बिना किसी सरकारी सहयोग के यह व्यवस्था संचालित की जा रही है। यहां मात्र 35 रुपये में दाल, रोटी, सब्जी और चावल के साथ अचार, सलाद और मिठाई भी मिलती है। गर्मी के मौसम में मट्ठा भी दिया जाता है। विशेष बात यह है कि यहां बिना लहसुन-प्याज का शुद्ध सात्विक भोजन तैयार किया जाता है।

प्रतिदिन करीब 300 लोग करते हैं भोजन
सीता रसोई के पास नगर निगम का रैन बसेरा स्थित है और कुछ दूरी पर इंजीनियरिंग कॉलेज चौराहे पर लेबर अड्डा भी है। यहां राजधानी के दूर-दराज इलाकों के साथ ही सीतापुर और आसपास के जिलों से मजदूर काम की तलाश में आते हैं। ऐसे में दोनों शिफ्टों में करीब 300 लोग प्रतिदिन यहां भोजन करते हैं। रसोई इंचार्ज योगेंद्र चौधरी ने बताया कि भोजन की व्यवस्था रेस्टोरेंट की तरह की गई है, जहां मेज-कुर्सी पर बैठाकर कर्मचारियों द्वारा भोजन परोसा जाता है।

घर जैसा स्वाद, मजदूरों की पहली पसंद
पिछले कई वर्षों से यहां भोजन कर रहे मजदूर राम भरोसे बताते हैं कि घर में कभी-कभी रोटी जल जाती है, लेकिन यहां हमेशा अच्छा और ताजा भोजन मिलता है। मजदूर अच्छे लाल, लखन और रामऔतार सहित कई रिक्शा चालक भी कहते हैं कि यहां भोजन करने पर ऐसा लगता है जैसे घर पर बैठकर खाना खा रहे हों।

25 वर्षों में सिर्फ 25 रुपये बढ़ा दाम
संस्था के उपप्रबंधक अजय सिंह ने बताया कि वर्ष 2001 में इस रसोई की शुरुआत मात्र पांच रुपये प्रति थाली से हुई थी। करीब 25 वर्षों में थाली की कीमत में केवल 25 रुपये की वृद्धि हुई है। उन्होंने कहा कि सरकार से किसी प्रकार की आर्थिक सहायता नहीं मिलती, फिर भी संस्था बिना किसी सब्सिडी के गरीबों को सस्ता और भरपेट भोजन उपलब्ध करा रही है। प्रबंधक गजेन्द्र सिंह का कहना है कि यदि सरकार से सहयोग मिले तो राजधानी के अन्य क्षेत्रों में भी इस तरह की व्यवस्था शुरू की जा सकती है।
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