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केंद्रीय बजट से अल्पसंख्यकों सहित कमजोर समुदायों में निराशा : जमात-ए-इस्लामी

नई दिल्ली : जमात-ए-इस्लामी हिंद के अध्यक्ष सैयद सआदतुल्लाह हुसैनी ने लोकसभा में पेश केंद्रीय बजट पर चिंता व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि सरकार ने व्यापक आर्थिक स्थिरता, पूंजीगत व्यय और राजकोषीय अनुशासन पर जोर दिया है, लेकिन बजट रोज़गार पैदा करने, सामाजिक क्षेत्र की ज़रूरतों, बढ़ती असमानता और सार्वजनिक कर्ज़ के बढ़ते बोझ को दूर करने में नाकाम रहा है।जमात अध्यक्ष ने एक बयान में कहा कि जमात-ए-इस्लामी हिंद ने बजट से पहले वित्त मंत्रालय को विस्तार में पॉलिसी सुझाव दिए थे, जिसमें रोजगार-इंटेंसिव ग्रोथ, मांग पक्ष को मज़बूत समर्थन, धन का सही बंटवारा और अल्पसंख्यकों सहित कमज़ोर समुदायों के लिए लक्षित दखल की अपील की गई थी। दुर्भाग्य से बजट अभी भी कैपिटल-इंटेंसिव ग्रोथ को प्राथमिकता दे रहा है, जबकि बेरोज़गारी, आय की असुरक्षा और सामाजिक बहिष्कार को दूर करने के लिए सीमित ठोस कदम उठाए गए हैं।सैयद सआदतुल्लाह हुसैनी ने कहा कि बजट में 12.2 लाख करोड़ रुपये से ज़्यादा का रिकॉर्ड पूंजीगत व्यय दीर्घकालिक इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने में मदद कर सकता है, लेकिन इसका रोज़गार और घरों की आय पर सीमित तत्काल प्रभाव होगा, खासकर अनौपचारिक मज़दूरों, ग्रामीण परिवारों, महिलाओं और युवाओं पर। सोशल सेक्टर पर खर्च कम रहा है, जिसमें केंद्र सरकार का स्वास्थ्य (1.03 लाख करोड़) और शिक्षा (1.39 लाख करोड़) पर खर्च अपनी बताई गई राष्ट्रीय नीति के लक्ष्यों से बहुत कम है।जमात-ए-इस्लामी के अध्यक्ष ने विगत वर्षों में अहम कल्याणकारी योजनाओं में फंड के लगातार कम इस्तेमाल की तरफ भी ध्यान दिलाया, जिसका खुलासा खुद बजट दस्तावेज से हुआ है। उन्होंने कहा कि पीने के पानी, घर और रोज़गार से जुड़े कई बड़ी योजनाओं में वादे के मुताबिक आवंटन और असल खर्च के बीच बड़ा अंतर देखा गया। उन्होंने आगे कहा कि आवश्यक सामजिक व्यय में कटौती या देरी करके हासिल किया गया वित्तीय अनुशासन आखिरकार गरीबों को नुकसान पहुंचाता है और मानव-विकास को कमज़ोर करता है।अल्पसंख्यक कल्याण पर सैयद सआदतुल्लाह हुसैनी ने कहा कि हालांकि, अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय के लिए आवंटन 2026-27 में बढ़ाकर लगभग 3,400 करोड़ रुपये कर दिया गया है, लेकिन अल्पसंख्यक समुदायों को जिन मुश्किलों का सामना करना पड़ता है, उसे देखते हुए यह रकम बहुत कम है। यह चिंता की बात है कि हाल के वर्षों में प्रशासनिक देरी और मंज़ूरी न मिलने के कारण अल्पसंख्यक कल्याण फंड, खासकर स्कॉलरशिप योजनाओं का बहुत कम इस्तेमाल हुआ है। समय पर लागू करने की गारंटी दिए बिना आवंटन की घोषणा करने से सिर्फ कागज़ी वादे होते हैं, असली सशक्तिकरण नहीं।