डॉ. एस.के. गोपाल
किसी भी लोकतांत्रिक समाज की वास्तविक पहचान ऊँची-ऊँची विकास योजनाओं से नहीं अपितु इस बात से होती है कि वह अपने सबसे अनुभवी नागरिकों, वरिष्ठों और महिलाओं के साथ कैसा व्यवहार करता है। जब आधुनिक ट्रेनों, प्रीमियम सुविधाओं और राजस्व वृद्धि के दावों के बीच बुज़ुर्गों की बुनियादी सहूलियतें समाप्त कर दी जाएँ तो यह प्रगति नहीं, नीति की संवेदनहीनता कही जाएगी। भारतीय रेलवे में वरिष्ठ नागरिकों को दी जाने वाली किराया छूट का प्रश्न आज इसी कसौटी पर खड़ा है।
कोविड-19 महामारी से पहले भारतीय रेलवे 60 वर्ष या उससे अधिक आयु के पुरुष यात्रियों को 40 प्रतिशत तथा 58 वर्ष या उससे अधिक आयु की महिलाओं को 50 प्रतिशत तक किराया छूट देता था। यह कोई असाधारण रियायत नहीं थी अपितु दशकों से चली आ रही एक सामाजिक-कल्याणकारी व्यवस्था थी। मेल, एक्सप्रेस और राजधानी जैसी प्रमुख ट्रेनों में लागू यह सुविधा उन करोड़ों बुज़ुर्गों के लिए राहत का साधन थी जिनकी आय सीमित होती है और जो इलाज, पारिवारिक ज़रूरतों, तीर्थयात्रा या सामाजिक दायित्वों के लिए रेल यात्रा पर निर्भर रहते हैं। वर्ष 2021 में महामारी के दौरान यह सुविधा बंद कर दी गई। उस समय परिस्थितियाँ असाधारण थीं और इसे अस्थायी निर्णय मानकर वरिष्ठ नागरिकों व महिलाओं ने स्वीकार भी किया। लेकिन आज सवाल यह है कि महामारी समाप्त हुए कई वर्ष बीत चुके हैं, रेलवे की आय फिर से बढ़ रही है, ट्रेनें पूरी क्षमता से चल रही हैं और टिकट के दाम भी बढ़ चुके हैं, तो फिर यह रियायत अब तक बहाल क्यों नहीं की गई?
यह पूछना स्वाभाविक है कि क्या संकट का बोझ सबसे पहले और सबसे लंबे समय तक बुज़ुर्गों और महिलाओं को ही उठाना चाहिए? जिस वर्ग की आय सबसे कम, स्वास्थ्य पर खर्च सबसे अधिक और सामाजिक निर्भरता सबसे ज़्यादा होती है, उसी से सुविधाएँ छीन लेना क्या न्यायसंगत है? यह मुद्दा केवल वरिष्ठ नागरिकों का नहीं अपितु महिलाओं और बुज़ुर्गों के संयुक्त अधिकारों का भी है। 58 वर्ष की उम्र पार कर चुकी महिलाएँ आज भी परिवार की धुरी बनी रहती हैं। कभी बच्चों के पास जाने के लिए, कभी इलाज के लिए, कभी सामाजिक दायित्व निभाने के लिए। किराया छूट उनके लिए केवल आर्थिक राहत नहीं अपितु आत्मनिर्भरता और सम्मान का प्रश्न है। बढ़े हुए किराए ने उन्हें या तो यात्रा टालने पर मजबूर किया है या दूसरों पर निर्भर बना दिया है, जो महिला सशक्तिकरण के दावों के विपरीत है।
पिछले वर्ष रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने राज्यसभा में कहा था कि रेलवे की स्थायी समिति ने वरिष्ठ नागरिकों को पुनः किराया छूट देने की सिफारिश की है और इस पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है। लेकिन सवाल यह है कि क्या करोड़ों बुज़ुर्गों और महिलाओं के अधिकार केवल ”विचाराधीन” ही रहेंगे? क्या संवेदनशील फैसलों को भी वर्षों की प्रतीक्षा करनी होगी? स्थायी समिति की सिफारिश कोई औपचारिक टिप्पणी नहीं होती। यह संसद की एक जिम्मेदार संस्था की राय होती है जो ज़मीनी हकीकत और सामाजिक ज़रूरतों को देखकर दी जाती है। यदि यही सिफारिश किसी कॉरपोरेट राहत या प्रीमियम परियोजना से जुड़ी होती तो क्या निर्णय लेने में इतना विलंब होता? यह प्रश्न सरकार की प्राथमिकताओं पर सीधा प्रश्नचिह्न लगाता है।
यह भी तथ्य है कि रेलवे ने हाल के वर्षों में किराए, आरक्षण शुल्क और अन्य मदों में यात्रियों पर अतिरिक्त बोझ डाला है। ऐसे में वरिष्ठ नागरिकों से यह कहना कि “रियायत संभव नहीं”, न केवल असंवेदनशील है, बल्कि नीति की असमानता को भी उजागर करता है।
यहीं यह उल्लेख महत्वपूर्ण है कि बुज़ुर्गों के प्रति संवेदनशीलता केवल माँग या दबाव का विषय नहीं अपितु राजनीतिक इच्छाशक्ति का परिणाम भी हो सकती है। इसका उदाहरण उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में देखने को मिला। लखनऊ के सांसद और वर्तमान रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने वरिष्ठ नागरिकों के लिए विशेष पार्क, सैर-पथ और शांत वातावरण विकसित करने की पहल की। बुज़ुर्गों की बौद्धिक सक्रियता के लिए पुस्तकालय जैसी व्यवस्थाएँ भी सामने आईं। यह उदाहरण बताता है कि जब सरकार बुज़ुर्गों को बोझ नहीं, समाज की धरोहर मानती है, तो नीतियाँ काग़ज़ों से निकलकर ज़मीन पर दिखाई देती हैं।
इसी पृष्ठभूमि में यह सवाल और अधिक तीखा हो जाता है कि जब बुज़ुर्गों के लिए पार्क और पुस्तकालय बनाए जा सकते हैं, तो उनकी सबसे बुनियादी आवश्यकता- सुलभ और किफायती रेल यात्रा को बहाल करने में इतनी हिचक क्यों?
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, रेलवे स्लीपर और थर्ड एसी श्रेणी में यह छूट पहले की तरह लागू करने पर विचार कर सकता है जबकि प्रीमियम ट्रेनों में सीमित रियायत दी जा सकती है। यह व्यावहारिक संतुलन हो सकता है लेकिन देरी का कोई औचित्य नहीं है। करोड़ों बुज़ुर्गों और महिलाओं की सुविधा प्रीमियम सेवाओं से कम महत्वपूर्ण नहीं हो सकती।
वरिष्ठ नागरिक संगठनों और महिला अधिकार समूहों का यह कहना बिल्कुल उचित है कि यह रियायत कोई मुफ्तखोरी नहीं, बल्कि सामाजिक उत्तरदायित्व है। जीवन भर कर देने वाला नागरिक, रेलवे का नियमित यात्री रहा बुज़ुर्ग जब अपने जीवन के उत्तरार्ध में थोड़ी राहत चाहता है, तो उसे उपकार नहीं, अधिकार के रूप में देखा जाना चाहिए।
भारतीय रेलवे केवल एक व्यावसायिक संस्था नहीं अपितु देश की जीवनरेखा है। उसका चरित्र जन सेवा से जुड़ा रहा है। यदि रेलवे केवल लाभ हानि के तराज़ू पर ही फैसले लेने लगे, तो वह अपनी सामाजिक आत्मा खो देगा। अब प्रश्न किसी समिति या प्रस्ताव का नहीं है। प्रश्न यह है कि क्या सरकार अपने बुज़ुर्गों और महिलाओं को नीति में स्थान देती है या केवल भाषणों में याद करती है। वरिष्ठ नागरिकों की रेल किराया छूट को बहाल करना कोई उपकार नहीं होगा। यह उस नैतिक दायित्व की पूर्ति होगी, जिसकी अपेक्षा एक सभ्य समाज अपने शासन से करता है।

Telescope Today | टेलीस्कोप टुडे Latest News & Information Portal