डॉ. एस.के. गोपाल
समाज में कुछ प्रश्न ऐसे होते हैं जो सीधे हमारे भीतर झाँकने को मजबूर करते हैं। ये प्रश्न किसी एक व्यक्ति, वर्ग या लिंग से अधिक हमारी सामूहिक सोच, संस्कार और दिशा से जुड़े होते हैं। जब यह पूछा जाता है कि यदि आप अपनी बहिन-बेटियों की बहुत इज्जत करते हैं और आपकी सोच भी गंदी नहीं है, तो क्या वे आपके सामने निर्वस्त्र घूम सकती हैं? तो यह प्रश्न शरीर से अधिक मर्यादा का है। लगभग हर व्यक्ति इसका उत्तर ‘नहीं’ ही देगा। इसका कारण स्पष्ट है, क्योंकि सम्मान केवल मन की भावना नहीं होता, बल्कि सामाजिक सीमाओं, व्यवहार और मर्यादा से जुड़ा हुआ मूल्य होता है।
प्रकृति ने नारी को जीवनदायिनी बनाया है। नारी का शरीर केवल आकर्षण या प्रदर्शन की वस्तु नहीं बल्कि सृजन, पोषण और संवेदना का आधार है। स्तन मातृत्व के प्रतीक हैं। संतान के पालन पोषण का माध्यम। भारतीय संस्कृति में नारी देह को उपभोग की वस्तु नहीं अपितु शक्ति, करुणा और सृजन का स्वरूप माना गया है। यहाँ शील और लज्जा को कमजोरी नहीं बल्कि गरिमायुक्त आभूषण समझा गया। किंतु आधुनिक समय, विशेषकर सोशल मीडिया के दौर में, इस दृष्टि में एक बड़ा परिवर्तन दिखाई देता है जिस पर गंभीरता से विचार करना आवश्यक है।
पिछले कुछ वर्षों में सोशल मीडिया ने अभिव्यक्ति के अनेक अवसर दिए हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि इस माध्यम ने बहुत सी प्रतिभाओं को पहचान दिलाई है। नृत्य, संगीत, अभिनय, शिक्षा, सामाजिक सरोकार और उद्यमिता जैसे क्षेत्रों में कई महिलाएँ आगे आई हैं। लेकिन इसी के साथ एक ऐसी प्रवृत्ति भी तेज़ी से बढ़ी है जिसमें नारी शरीर को फॉलोवर्स, लाइक और व्यूज़ बढ़ाने का माध्यम बना दिया गया है। यहाँ प्रश्न नारी की स्वतंत्रता का नहीं अपितु स्वतंत्रता की दिशा और उद्देश्य का है। क्या स्वतंत्रता का अर्थ केवल इतना है कि शरीर को सार्वजनिक प्रदर्शन की वस्तु बना दिया जाए या स्वतंत्रता का अर्थ यह है कि नारी अपनी प्रतिभा, विवेक और आत्मसम्मान के साथ समाज में आगे बढ़े?
बहुधा यह तर्क दिया जाता है कि इसमें कुछ भी गलत नहीं है और जो इसे गलत मानते हैं उनकी सोच ही गंदी है। यह तर्क अधूरा और सतही है। यदि ऐसा होता तो सार्वजनिक और निजी जीवन के बीच कोई अंतर ही न रह जाता। समाज हमेशा से कुछ मर्यादाएँ तय करता आया है ताकि व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक संतुलन दोनों बने रहें। जो व्यवहार निजी जीवन में स्वीकार्य हो सकता है वही सार्वजनिक जीवन में उचित हो यह आवश्यक नहीं। इसी अंतर को न समझ पाने के कारण आज कई तरह के भ्रम पैदा हो रहे हैं।
इस संदर्भ में जब हम अन्य देशों की ओर देखते हैं तो एक तुलनात्मक दृष्टि मिलती है। उदाहरण के लिए इज़रायल में महिलाएँ पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर देश की सुरक्षा में भाग लेती हैं। वहाँ नारी की पहचान उसके साहस, अनुशासन और राष्ट्र के प्रति योगदान से बनती है। वहीं हमारे समाज में एक वर्ग ऐसा भी है जहाँ सोशल मीडिया पर अश्लील या अर्धनग्न प्रदर्शन को ही सफलता का पैमाना बना लिया गया है। यह कहना गलत होगा कि भारत की अधिकांश महिलाएँ ऐसा कर रही हैं, लेकिन यह भी सच है कि ऐसी सामग्री को सामान्य और आकर्षक बनाकर प्रस्तुत किया जा रहा है, जो चिंता का विषय है।
इस प्रवृत्ति को और बल मिलता है परिवार और समाज के रवैये से। पहले माता-पिता बच्चों को संयम, मर्यादा और नैतिकता की शिक्षा देने का प्रयास करते थे। आज कुछ मामलों में वही माता-पिता या पति इस तरह की गतिविधियों पर खुश दिखाई देते हैं क्योंकि इससे तात्कालिक प्रसिद्धि और धन मिल रहा है। यह स्थिति हमें सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हर वह रास्ता सही हो जाता है जो जल्दी पैसा और लोकप्रियता दे दे? क्या समाज का मूल्यांकन केवल व्यूज़ और सब्सक्राइबर्स की संख्या से होना चाहिए?
यहाँ दर्शक की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। सोशल मीडिया पर लाइक करना, शेयर करना और वाहवाही करना केवल मनोरंजन नहीं अपितु एक तरह की स्वीकृति और प्रोत्साहन भी है। जब हम ऐसे कंटेंट को लोकप्रिय बनाते हैं तो हम अनजाने में ही उस प्रवृत्ति को आगे बढ़ाते हैं। बाद में यही प्रवृत्ति बच्चों और किशोरों के लिए आदर्श बन जाती है। फिर हम शिकायत करते हैं कि नई पीढ़ी संस्कारहीन हो रही है जबकि उसके बीज समाज ने स्वयं बोए होते हैं।
यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि सार्वजनिक जीवन में अश्लीलता का विरोध नारी का विरोध नहीं है। यह विरोध उशकी गरिमा और सामाजिक मर्यादा के पक्ष में है। नृत्य अभिनय या कला का प्रदर्शन तब तक सम्मानजनक है जब तक उसमें प्रतिभा और भाव प्रमुख हों न कि शरीर का प्रदर्शन। भारत की परंपरा में ऐसी असंख्य महिला कलाकार रही हैं जिन्होंने शालीनता और गरिमा के साथ अपनी कला को ऊँचाइयों तक पहुँचाया है। उन्होंने यह सिद्ध किया कि टैलेंट दिखाने के लिए निजी अंगों का प्रदर्शन आवश्यक नहीं।
इस पूरे विमर्श का उद्देश्य नारी की स्वतंत्रता को सीमित करना नहीं अपितु उसे सही दिशा देना है। स्वतंत्रता और जिम्मेदारी साथ-साथ चलती हैं। अभिव्यक्ति की आज़ादी का अर्थ यह नहीं कि सामाजिक मर्यादाओं को पूरी तरह नकार दिया जाए। यदि हम चाहते हैं कि हमारी बहिन-बेटियाँ सुरक्षित, सम्मानित और सशक्त हों तो हमें उन्हें यह भी सिखाना होगा कि आत्मसम्मान केवल बाहरी प्रशंसा से नहीं बल्कि आत्मबोध और चरित्र से आता है।
समाज की जिम्मेदारी केवल महिलाओं पर नैतिकता थोपने की नहीं बल्कि पुरुषों की सोच और व्यवहार को भी सुधारने की है। दोहरे मापदंड सबसे अधिक नुकसान पहुँचाते हैं। यदि एक ओर हम महिलाओं से मर्यादा की अपेक्षा करते हैं और दूसरी ओर अश्लीलता को बढ़ावा देने वाले कंटेंट का आनंद लेते हैं, तो यह पाखंड है। सामाजिक सुधार का रास्ता आत्ममंथन से होकर जाता है।
आवश्यकता इस बात की है कि हम सामाजिक नियमों और सांस्कृतिक मूल्यों को पिछड़ापन न समझें। बच्चों को नैतिक शिक्षा देना केवल स्कूल की जिम्मेदारी नहीं, परिवार और समाज की सामूहिक जिम्मेदारी भी है। वीडियो बनाइए, अपनी कला दिखाइए, अपनी पहचान बनाइए लेकिन ऐसे रूप में कि जिसे पूरा परिवार साथ बैठकर देख सके। समाज को ऐसे आदर्श चाहिए जो प्रेरणा दें न कि केवल उत्तेजना।
संस्कृति किसी एक व्यक्ति या वर्ग की धरोहर नहीं होती। यह पीढ़ियों की साझा पूँजी होती है। यदि हम इसे बचाना चाहते हैं तो हमें अभिव्यक्ति और मर्यादा के बीच संतुलन बनाना होगा। तभी हम एक ऐसा समाज बना पाएँगे जहाँ नारी स्वतंत्र भी हो, सुरक्षित भी हो और सम्मानित भी और जहाँ प्रतिभा की पहचान शरीर से नहीं, कर्म और चरित्र से हो।
Telescope Today | टेलीस्कोप टुडे Latest News & Information Portal