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प्रो. सुखवीर सिंघल ने कला के लिए किसी भी प्रकार का नहीं किया समझौता

लखनऊ (टेलीस्कोप टुडे संवाददाता)। वॉश कला में भारतीय चित्रकला को प्रतिष्ठा दिलाने वाले स्वर्गीय प्रो. सुखवीर सिंघल की 19वीं पुण्यतिथि कैसरबाग स्थित कला संग्रहालय में श्रद्धापूर्वक मनाई गई। जहाँ कला जगत की प्रतिष्ठित हस्तियों, विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं ने उनकी कलायात्रा और योगदान को स्मरण करते हुए भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित की। संग्रहालय में संरक्षित लगभग सौ वर्ष पुरानी कलाधरोहर आज भी भारतीय संस्कृति, अध्यात्म और सौंदर्यबोध को उसी गहराई और गरिमा से व्यक्त करती है, जैसी सिंघलजी की कला की पहचान रही है।

इस अवसर पर उनके जीवन, दर्शन और कलाकृतियों पर आधारित लघु फिल्म ‘The Dusk of Romance’ का प्रदर्शन किया गया, जिसे उपस्थित जनों ने अत्यंत भावुक होकर देखा। फिल्म के बाद उनकी चयनित कलाकृतियों का अवलोकन कराया गया। जिसमें उनकी प्रसिद्ध वॉश पेंटिंग्स के साथ-साथ रेशमी चित्र, लैकसिट पेंटिंग्स, जलरंग, लकड़ी, कपड़ा, चमड़ा और मूर्तिशिल्प जैसे विविध माध्यमों में किए गए उनके प्रयोग भी शामिल रहे। जो उनके बहुआयामी व्यक्तित्व और कलात्मक जिज्ञासा का प्रमाण हैं। 

कार्यक्रम में वरिष्ठ कलाकार जय कृष्ण अग्रवाल, राज्य ललित कला अकादमी के अध्यक्ष डॉ. सुनील विश्वकर्मा, इतिहासकार डॉ. रवि भट्ट, कला दीर्घा के संपादक डॉ. अवधेश मिश्रा, क्यूरेटर, कलाकार व समीक्षक भूपेंद्र अस्थाना सहित अनेक कला विद्वानों की उपस्थिति रही।

इस अवसर पर वरिष्ठ कलाकार जय कृष्ण अग्रवाल ने प्रो. सुखवीर सिंघल के साथ के स्मृतियों को याद करते हुए कहा कि उन्होंने कला के लिए किसी भी प्रकार का कभी समझौता नहीं किया। उनके साथ काम करने का आनंद अलग ही रहा है, वे बहुत डिसिप्लिन वाले व्यक्ति थे। वे प्रयोगवादी कलाकार थे। ओपेक का प्रयोग करते थे जो अमूमन वाश में लोग नहीं करते हैं। उनके कद के हिसाब से उनके ऊपर काम नहीं किया गया, यह दुर्भाग्यपूर्ण है।

अवधेश मिश्रा ने कहा कि वे कला ऋषि थे, उनका कद बहुत ऊंचा था और आज भी है। लखनऊ कला की बात हो तो वाश की बात और उसमें सुखवीर सिंघल की बात न हो यह हो ही नहीं सकता। उनके चित्र अद्भुत है उनका प्रयोग बेहद सुंदर है और चित्रों में मानव आकृतियां के भाव अद्भुत भावपूर्ण है। आसानी से उन चित्रों के मुखाकृति के भाव आसानी से समझ सकते हैं। उनके चित्र स्वयं बोलते हैं। उन्होंने धार्मिक प्रसंगों, गांधी दर्शन को भी चित्रित किया है। उन्होंने अपने अनुभव को चित्रों के साथ लेखन कार्य भी किया। आज उनको याद करना मेरे लिए सौभाग्य है। 

भूपेंद्र कुमार अस्थाना ने कहा कि मनुष्य होना भाग्य है और कलाकार होना सौभाग्य है। ऐसे ही सौभाग्यशाली चित्रकार थे सिंघल जी। प्रो. सुखवीर सिंघल भारतीय चित्रकला पद्धति को जीवित रखने और समृद्ध बनाने वाले कलाकार थे। उन्होंने अपने जीवन काल में वाश शैली को बहुत महत्व दिया है। सैकड़ों की संख्या में वाश पेंटिंग बनाई है। इसके अलावा जल रंग में दृश्य चित्रण भी किया है जो कि बहुत ही सुंदर हैं और आज भी रंग ताज़े लगते हैं। उनके ब्रश स्ट्रोक जबरदस्त है। रंगो का मिश्रण भी अकल्पनीय है। उनके वाश पेंटिंग में एक, दो, तीन फिगर नहीं बल्कि ढेर सारे मानव आकृतियों को देखा जा सकता है। 

इस अवसर पर राजेंद्र मिश्रा, साहब बक्स, सुनील कुशवाहा, धीरज यादव, डॉ. स्तुति सिंहल, रत्नप्रिया, प्रियम चंद्रा सहित कई लोग उपस्थित रहे।

14 जुलाई 1914 को मुज़फ्फरनगर में जन्मे प्रो. सिंघल बचपन से ही कला के प्रति गहरा अनुराग रखते थे और एक सच्चे देशभक्त के रूप में असहयोग आंदोलन में सक्रिय रहे। बाद में लखनऊ आकर उन्होंने Government School of Art and Crafts, Lucknow से कला शिक्षा प्राप्त की और फिर 1938 में प्रयागराज में ‘कला भारती’ संस्थान की स्थापना की, जहाँ शास्त्रीय संगीत, नृत्य और दृश्य कला का अध्ययन समान गरिमा के साथ करवाया जाता था। उनके संस्थान में अनेक प्रतिष्ठित विद्यार्थी जुड़े, जिनमें इंदिरा गांधी और विश्वनाथ प्रताप सिंह भी शामिल रहे। अवनिंद्रनाथ टैगोर और ए.के. हालदर के मार्गदर्शन में उन्होंने भारतीय रस सिद्धांत पर आधारित वॉश पेंटिंग शैली को विकसित किया, जिसने उनके कार्यों को कालजयी पहचान दिलाई। उनकी प्रसिद्ध कृति ‘Thou Art Dust, to Dust Returnest’ को ब्रिटेन के सम्राट जॉर्ज पंचम द्वारा रॉयल कलेक्शन में शामिल किया गया और 1942 में उन्होंने इंदिरा गांधी का विवाह निमंत्रण-पत्र डिज़ाइन किया, जिसे अंतरराष्ट्रीय प्रशंसा मिली।

 

उन्होंने ‘Evolution of Art and Artist’ नामक तीन-खंडीय ग्रंथ पर 12 वर्षों तक शोध किया, जिसका प्रथम खंड 2025 में लोकार्पित हुआ और शेष दो खंड शीघ्र प्रकाशित होने वाले हैं। उनकी पुस्तक ‘भारतीय चित्रकला पद्धति’ भारतीय कला दर्शन का महत्वपूर्ण दस्तावेज मानी जाती है। कला के अतिरिक्त वे शास्त्रीय संगीत, योग, प्राकृतिक चिकित्सा और अध्यात्म के गहन अध्येता थे। 29 नवंबर 2006 को उनके निधन के बाद भी उनकी कला और विचारधारा की यह परंपरा निरंतर जीवित है। उनके सम्मान में 2022 में लखनऊ नगर निगम ने कैसरबाग स्थित सड़क को ‘प्रो. सुखवीर सिंघल मार्ग’ नाम दिया। आज भी उनकी कला नई पीढ़ियों को न केवल प्रेरणा देती है, बल्कि भारतीय कलासंवेदी विरासत का बोध भी कराती है। इस समारोह में राजेंद्र मिश्रा, धीरज यादव, डॉ. स्तुति सिंहल, प्रियम चंद्रा और रत्नप्रिया सहित अनेक कला-प्रेमियों की उपस्थिति रही, जिन्होंने इस दिन को एक स्मरणीय और भावनात्मक क्षण के रूप में अनुभव किया।