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लखनऊ (टेलीस्कोप टुडे डेस्क)। केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा है कि वर्तमान में टाइप 2 डायबिटीज मैलिटस का फैलाव भारत में महामारी का रूप ले रहा है। पहले यह बीमारी संपन्न लोगों और शहरों तक ही सीमित थी, लेकिन अब ग्रामीण इलाकों में इसका फैलना चिंताजनक है। डॉ. जितेंद्र सिहं मेडिसिन के प्रोफेसर और प्रसिद्ध मधुमेह विशेषज्ञ भी हैं।

केंद्रीय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी; प्रधानमंत्री कार्यालय, कार्मिक, लोक शिकायत, पेंशन, अंतरिक्ष और परमाणु ऊर्जा राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिहं ने आज वाराणसी जिले के ग्राम पुराना रामनगर में ग्रामीण मधुमेह रोकथाम और नियंत्रण अभियान का शुभारंभ करने के बाद सभा को संबोधित करते हुए यह बात कही। यह कार्यक्रम भारत (आरएसएसडीआई)- उत्तर प्रदेश चैप्टर के अंतर्गत रिसर्च सोसाइटी फॉर स्टडी ऑफ डायबिटीज के तत्वावधान में एक गांव गोद लेने के संबंध में आयोजित किया गया, ताकि उस ग्राम में मधुमेह बीमारी पर नियंत्रण लगाया जा सके।

गांवों में तेजी से फैल रहे मधुमेह पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि ग्रामीण इलाकों में इस बीमारी की रोकथाम के लिए बड़े पैमाने पर अभियान चलाया जा रहा है।

उन्होंने कहा, “प्राचीन और पवित्र स्थल वाराणसी से इस अभियान का शुभारंभ करना सर्वाधिक  उपयुक्त है।”

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि अब तक इस बीमारी की पहचान अधिकतर अमीर और संभ्रांत लोगों और शहरों तक ही सीमित थी, जिसका मुख्य कारण उनकी जीवनशैली थी, लेकिन अब ग्रामीण इलाकों में इसका फैलाव चिंताजनक है। ग्रामीण भारत में इस बीमारी को बढ़ने का संभावित कारण फास्ट फूड के प्रति रुझान, कृषि में अधिक अत्याधुनिक उपकरणों का प्रयोग और उसके परिणामस्वरूप शारीरिक गतिविधियों में कमी को पाया गया है।

ग्रामीण भारत में मधुमेह की रोकथाम और प्रबंधन की दिशा में इस पहल के लिए आरएसएसडीआई के प्रयासों की सराहना करते हुए, उन्होंने भारत मधुमेह भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद-(आईसीएमआर-इंडियाब अध्ययन का हवाला देते हुए इसके प्रयासों की सराहना की, इस अध्ययन में बताया गया है कि उत्तर प्रदेश की 18 प्रतिशत आबादी प्री-डायबिटीज चरण में है।

डॉ. सिंह ने कहा, “इतनी बड़ी जनसंख्या मधुमेह बीमारी की कगार पर है, इसे तभी रोका जा सकता है जब हम बड़े शहरों के आसपास के गांवों में मधुमेह की रोकथाम के लिए काम करना शुरू करें। इस पहल के लिए वाराणसी के रामनगर गांव को चुनने का विचार काफी उचित है।”

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि 2019 में बाराबंकी के चार गांवों को गोद लेकर आरएसएसडीआई यूपी चैप्टर द्वारा किए गए प्रयासों की भी सराहना की। उन्होंने कहा कि इससे लोगों का जीवन बेहतर हुआ है और मधुमेह को नियंत्रित करने में मदद मिली है।

उन्होंने कहा, “यह हमें मधुमेह नियंत्रित करने की दिशा में और अधिक गहन तरीके से प्रयास जारी रखने के लिए प्रोत्साहित करता है।”

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि पिछले दो दशकों में भारत में टाइप 2 डायबिटीज मैलिटस में वृद्धि देखी गई है, जिसका फैलाव अब देश भर में हो गया है। उन्होंने कहा कि टाइप 2 मधुमेह दो दशक पहले तक अधिकतर दक्षिण भारत में ही फैला था, अब यह उत्तर भारत में भी समान रूप से व्याप्त है और साथ ही, महानगरों, शहरों और शहरी क्षेत्रों से ग्रामीण इलाकों में भी फैल चुका है।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद के दिशानिर्देशों के अनुरूप पिछले तीन दशकों में देश में मधुमेह पीड़ितों की संख्या में 150 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई है।

आज शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में मधुमेह 25-34 वर्ष के आयुवर्ग में तेजी से फैल रहा है और मुख्य चिंता कम उम्र में टाइप 2 मधुमेह का निदान करने की है।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि केंद्र सरकार इस चुनौती से निपटने के लिए विभिन्न स्तरों पर काम कर रही है, उदाहरण के लिए, राष्ट्रीय स्तर पर निशुल्क रक्त शर्करा परीक्षण अभियान, सामान्य स्वास्थ्य बीमा पॉलिसी, आयुष्मान भारत, वेलनेस क्लीनिक, सभी जिला सरकारी अस्पतालों में किडनी डायलिसिस सुविधा, योग को बढ़ावा दिया जा रहा है। उन्होंने कहा कि लेकिन इन प्रयासों के साथ-साथ गैर-सरकारी एजेंसियों और समाज को भी इसकी रोकथाम करनी होगी और इस बीमारी के प्रति जागरूकता का प्रसार करना होगा।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि टाइप 2 मधुमेह के प्रबंधन में जीवनशैली प्रबंधन की भूमिका महत्वपूर्ण है और रोग के इष्टतम प्रबंधन के लिए ग्लाइसेमिया पर आहार और शारीरिक गतिविधि के प्रभाव को समझना आवश्यक है।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारतीय फेनोटाइप पश्चिमी लोगों से अलग है और आनुवंशिक रूप से भी इनमें भिन्नता है। परिणामस्वरूप, टाइप 2 डायबिटीज मैलिटस और अन्य संबंधित विकारों की बढ़त पश्चिमी जनसंख्या से अलग है।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने अनुसंधान साक्ष्यों का हवाला देते हुए कहा कि  अब यह बिना किसी संदेह के साबित हो गया है कि कई पीढ़ियों से यूरोपीय देशों में रहने वाले भारतीय मूल के प्रवासियों में अभी भी टाइप 2 मधुमेह मेलिटस विकसित होने की अधिक संभावना है, भले ही वे अब भारत में नहीं रह रहे हों, लेकिन जिस पर्यावरण और परिस्थिति में वे रह रहे हैं वह भिन्न है।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि भारतीयों में प्रचलित कुछ महत्वपूर्ण जोखिम कारकों का जिक्र करते हुए कहा कि हमारा मोटापा प्रोफ़ाइल भी दूसरों से अलग है। उदाहरण के लिए भारत में मोटापे की व्यापकता पुरुषों और महिलाओं दोनों में अधिक और लगभग बराबर है, जबकि पश्चिमी आबादी में व्यक्ति में स्पष्ट रूप से मोटापा दिखाई देता है, लेकिन उसका कारण सामान्य आंत में वसा का होना है।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि मुझे यह जानकर प्रसन्नता हो रही है कि “विश्व स्तर पर हमारे समय की जानलेवा नंबर एक बीमारी” के निदान और उपचार में नई प्रगति हो रही है।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने बताया कि भविष्य में भारत दुनिया में मधुमेह अनुसंधान का नेतृत्व करने के लिए पूरी तरह सक्षम है।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि भारत में विभिन्न चरणों में बीमारियों की विभिन्न लक्षणों वाले रोगियों का एक विशाल समूह है और साथ ही हमारे शोधकर्ताओं की क्षमता और कौशल में कोई कमी नहीं है। इसलिए जितना संभव हो, उतना अधिक भारतीय डेटा तैयार करने का यह सही समय है, क्योंकि लक्ष्य भारतीय रोगियों के लिए भारतीय उपचार व्यवस्था, भारतीय समस्याओं के लिए भारतीय समाधान विकसित करना होना चाहिए।

स्वदेशी चिकित्सा अनुसंधान के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के समर्थन का जिक्र करते हुए  डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि प्री-कोविड काल के दौरान साक्ष्यों के साथ यह साबित हो चुका था कि मधुमेह-मैलिटस जैसे गैर-संचारी रोगों के उपचार की खुराक प्राकृतिक चिकित्सा में उपलब्ध है, कुछ योग आसन और जीवनशैली में परिवर्तन के अभ्यास से इंसुलिन या मधुमेह की दवाओं को कम किया जा सकता है।

उन्होंने बताया कि नया भारत चिकित्सा विज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों को एकीकृत करके एलोपैथी से आगे बढ़कर आयुष और योग जैसे विकल्पों के समन्वय से स्वास्थ्य सेवा में आत्मनिर्भर बन जाएगा।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि पारंपरिक मोटा अनाज मधुमेह, मोटापा और कई अन्य विकारों में लाभदायक है। उन्होंने कहा कि मोटा आवश्यक विटामिन, खनिज, प्रोटीन और फाइबर से भरपूर है।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा योग को विश्व स्तर पर लोकप्रिय बनाने के बाद अब मोटे अनाज को भी विश्वस्तर पर उपयोगी सिद्ध करने और लोगों को इस बारे में जागरूक करने का समय आ गया है। उन्होंने बताया कि 12 मोटे अनाज के ज्ञात प्रकारों में से 10 भारत में उगाए जाते हैं, जो कार्बोहाइड्रेट के साथ पचने में सहज होते हैं, और इसलिए कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स रक्त शर्करा के लिए लाभदायक होते हैं।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने बताया कि मधुमेह की रोकथाम न केवल स्वास्थ्य देखभाल के प्रति हमारा कर्तव्य है बल्कि राष्ट्र निर्माण के प्रति भी हमारा दायित्व है, क्योंकि भारत ऐसा देश है जहां 70 प्रतिशत जनसंख्या 40 वर्ष से कम उम्र की है और आज के युवा विकसित भारत @2047 के प्रमुख नागरिक बनने जा रहे हैं।

“हमारी बहुसंख्यक जनसंख्या अब भी गांवों में रहती है, इनमें अधिकांश किसान और कृषक समुदाय शामिल हैं। हम टाइप 2 मधुमेह और अन्य संबंधित विकारों के परिणामस्वरूप इन से  होने वाली अक्षमताओं और जटिलताओं में ऊर्जा बर्बाद नहीं कर सकते।”

स्वास्थ्य सेवा को दी गई उच्च प्राथमिकता के लिए प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की सराहना करते हुए डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की व्यक्तिगत रुचि और हस्तक्षेप के कारण दो वर्षों के भीतर भारत ने न केवल छोटे देशों की तुलना में कोविड महामारी को सफलतापूर्वक प्रबंधित किया, बल्कि डीएनए वैक्सीन उपलब्ध भी उपलब्ध कराई और देशों को भी कोविड रोधी वैक्सीन देकर उनकी मदद की।

उन्होंने कहा कि अमृत काल के अगले 25 वर्षों का रोडमैप सर्वोत्तम स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली की दिशा में भारत दुनिया के अग्रणी देश के रूप में उभरने का साक्ष्य बनेगा।

इस अवसर पर डॉ. जितेंद्र सिंह ने पदमश्री प्रोफेसर कमलाकर त्रिपाठी और पुराना रामनगर के ग्राम प्रधान श्री रितेश पाल को सम्मानित किया।