बचपन में इया (दादी) और अम्मा से कई बार सुनी ‘चिड़िया और दाल’ की लोककथा आज के समय में एक नया अर्थ देती है। तब यह केवल मनोरंजन लगती थी, लेकिन आज इसमें हमारी व्यवस्था के लिए भी एक बड़ा संदेश दिखाई देता है।
एक चिड़िया को चने का दाना मिला। चक्की में दलवाने पर दाल का एक दाना लकड़ी के खूंटे में फँस गया। चिड़िया बढ़ई के पास गई और खूंटा चीरकर दाल निकालने को कहा, लेकिन उसकी सुनवाई नहीं हुई। वह राजा के पास पहुँची और बोली, “राजा-राजा, बढ़ई को डाँटो, वह खूंटा नहीं चीरता।” राजा ने भी उसकी बात नहीं सुनी। तब चिड़िया साँप के पास गई और बोली, “साँप-साँप, राजा को डसो।” साँप ने मना कर दिया। फिर वह लाठी, आग, पानी और हाथी के पास गई, लेकिन किसी ने उसकी मदद नहीं की।
आखिर चिड़िया चींटी के पास पहुँची और बोली, “चींटी-चींटी, हाथी के कान में घुसकर उसे काटो, ताकि वह पानी पिए; पानी आग बुझाए, आग लाठी जलाए, लाठी साँप मारे, साँप राजा को डसे, राजा बढ़ई को डाँटे और बढ़ई खूंटा चीरे।” चींटी आगे बढ़ी तो पूरी कड़ी सक्रिय हो गई। हाथी पानी पीने, पानी आग बुझाने, आग लाठी जलाने, लाठी साँप को मारने और साँप राजा को डसने दौड़ा। राजा ने बढ़ई को आदेश दिया और खूंटा चीरते ही चिड़िया की दाल निकल आई।
आज आम आदमी की छोटी सी समस्या भी थाने, तहसील, जिला, मंडल और प्रदेश तक पहुँच जाती है। शिकायत दर्ज होती है, रिपोर्ट लगती है और आईजीआरएस पर निस्तारण भी हो जाता है, लेकिन निस्तारण और समाधान में अंतर है। जरूरी है कि अनुश्रवण से यह सुनिश्चित हो कि शिकायतकर्ता को वास्तविक राहत मिली या नहीं।
कहानी की चींटी सबसे छोटी थी, लेकिन उसी ने पूरी व्यवस्था को सक्रिय कर दिया। आज प्रशासन को भी ऐसी ही एक चींटी चाहिए, जो शिकायत को आगे बढ़ाने के बजाय समाधान तक पहुँचाए और कागजी निस्तारण के बजाय वास्तविक परिणाम सुनिश्चित करे।

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