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एकात्म मानववाद के प्रणेता- पं. दीनदयाल उपाध्याय

25 सितम्बर पर विशेष

(मृत्युंजय दीक्षित)

महान विचारक पं. दीनदयाल उपाध्याय का जन्म 25 सितम्बर 1916 को उत्तर प्रदेश के मथुरा जनपद के नगला चंद्रभान नामक गाँव में हुआ था। दीन दयाल जी के पिता का नाम पंडित भगवती प्रसाद उपाध्याय था। उपाध्याय परिवार भारतीय संस्कृति और परम्परा में रचा बसा था। परिवारी जन बाल्यावस्था में दीनदयाल जी को दीना कहकर बुलाते थे। बालक दीना की मेधा बचपन से ही प्रबल थीं। यद्यपि दीना की शिक्षा अत्यंत विषम परिस्थितियों में हुई तथापि अप्रतिम मेधा का परिचय देते हुए उन्होंने अपनी हाईस्कूल से लेकर स्नातक तक की सभी परीक्षाएं प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण करीं। बालक दीना छात्र जीवन में ही संघ से जुड़ गया और सामजिक जीवन में पूरे नाम दीन दयाल से पहचाना जाने लगा। दीन दयाल जी छात्रावास में लगने वाली शाखा में वे प्रतिदिन जाते थे और शाखा से प्राप्त संस्कारों से प्रेरित होकर उन्होंने अपना तन, मन और जीवन पूरी तरह से देश के लिए समर्पित कर दिया। दीन दयाल जी को संघ संस्थापक डा. केशवराम बलिराम हेडगेवार तथा  वरिष्ठ प्रचारक भाऊराव देवरस जी का सानिध्य प्राप्त हुआ। उन्होंने अपने जीवन को पूरी रचनात्मक त्वरा और विश्लेषणात्मक गहराई से जिया। उनके पत्रकारिता जीवन के दौरान लिखे शब्द आज भी उपयोगी है। 

दीन दयाल जी एकात्म मानववाद के प्रणेता हैं। उनके द्वारा प्रस्तुत एकात्म मानववाद मूलतः ऋग्वेद के पुरुष सूक्त पर आधारित है जिसमें संपूर्ण समाज की परिकल्पना एक विराट पुरुष के रूप में की गयी है। एकात्म मानववाद आज के युग में भी उतना ही प्रासंगिक है जितना उनके समय में था  एकात्म मानववाद पर उनका कहना था,”हमारे यहां समाज को स्वयंभू माना है”। राज्य एक संस्था के नाते है। राज्य की संस्थाएं भी समय- समय पर पैदा होती हैं।प्रत्येक व्यक्ति इनमें से प्रत्येक संस्था का सदस्य होता है। पंडित जी की तत्व दृष्टि थी कि सम्पूर्ण विश्व के समक्ष उपस्थित मार्ग विभ्रम का उत्तर भारतीय संस्कृति में निहित है। भारतीय संस्कृति समग्रतावादी है। यह सार्वभौमिक भी है। पश्चिम की दुनिया में हजारों वाद हैं। पूरा पश्चिमी जगत विक्षिप्त है। पश्चिम में सुस्पष्ट दर्शन का अभाव है। वही अभाव पश्चिम को भारत की ओर आकर्षित करता है। अमरीका का प्रत्येक व्यक्ति आनंद की प्यास में भारत की ओर टकटकी लगाये हुये है। भारत ने  सम्पूर्ण सृष्टि रचना में एकत्व देखा है। भारतीय संस्कृति इसीलिए सनातन काल से एकात्मवादी है। पण्डितजी के अनुसार सृष्टि के एक- एक कण में  परावलम्बन है। भारत ने इसे ही अद्वैत कहा है। भारत ने सभ्यता के विकास में परस्पर सहकार को ही मूल तत्व माना है। 

भारतीय जनसंघ के शिखर पुरुष के रूप में उन्होंने राजनीति में शुचिता पर विशेष बल दिया। वह स्वयं ही इसका उदाहरण बने। 1962 के लोकसभा चुनाव के पश्चात जौनपुर संसदीय सीट से भारतीय जनसंघ के विजयी प्रत्याशी ब्रह्मजीत सिंह का आकस्मिक निधन हो गया। इस सीट पर उपचुनाव हुआ। उपचुनाव में जनसंघ की ओर से दीनदयाल उपाध्याय और कांग्रेस की ओर से राजवीर सिंह मैदान में उतरे। दोनों दलों के नेता अपनी -अपनी रणनीति बनाई। दीनदयाल जी ने जनसंघ की राजनीतिक तथा आर्थिक नीतियों की श्रेष्ठता तथा कांग्रेस की गलत नीतियों को आधार बनाकर चुनाव में जाने का निश्चय किया।चुनाव जीतने के लिए किसी भी प्रकार के छल कपट का सहारा न लेने का निर्णय लिया। वहां पर चुनावी चर्चा के दौरान लोगों ने कहा कि यह चुनाव क्षेत्र ब्राह्मण  बहुल है अतः यदि दीनदयाल जी को ब्राह्मण प्रत्याशी कहकर उनका प्रचार किया जाए और उनके नाम के आगे पंडित जी लगा दिया जाए  तो चुनाव जीतना आसान हो जाएगा। इस बात पर दीनदयाल जी ने कहा कि इस प्रकार जातीय भावना को भड़का कर चुनाव तो जीता जा सकता है लेकिन ऐसा करने से भारतीय जनसंघ का आदर्श हार जाएगा। उन्होंने कहा कि हमें भारतीय जनसंघ की जीत के लड़ना है न कि पंडित दीनदयाल की जीत के लिये। 

वह सदा ही उच्च नैतिक मापदंडों की राजनीति के पक्षधर थे। राजनीति में उन्हें जाति एवं धर्म के नाम पर  भेदभाव पसंद नहीं था। उनकी इस नीति का परिणाम यह रहा कि लोकसभा उपचुनाव में जौनपुर, अमरोहा एवं फर्रुखाबाद में विपक्ष का संयुक्त उम्मीदवार खड़ा किया गया और डा.लोहिया ने जनसंघ की राष्ट्रवादी नीति की सराहना की। जनसंघ ने लोहिया की फर्रुखाबाद और आचार्य जे बी कृपलानी की अमरोहा से उम्मीदवारी का समर्थन किया। कांग्रेस पार्टी ने उस समय भी छल -कपट का सहारा लिया। दुर्भाग्यवश दीनदयाल जी जौनपुर से हार गए जबकि अमरोहा से आचार्य जे. बी. कृपलानी तथा फर्रुखाबाद से डा. राम मनोहर लोहिया जीत गये।चुनाव परिणाम आने पर दीन दयाल जी ने कहा कि यह सुखद है कि क्योंकि हम अपनी नीतियों से नहीं कांग्रेस के छल कपट से हारे हैं। 

दीनदयाल जी की पहचान एक उत्कृष्ट लेखक की भी है। एकात्म मानववाद, लोकमान्य तिलक की राजनीति, जनसंघ का सिद्धांत और नीति,  राष्ट्र जीवन की समस्याएँ,  राष्ट्रीय अनुभूति, कश्मीर, अखंड भारत, भारतीय राष्ट्र धारा का पुनः प्रवाह, भारतीय संविधान, इनको भी आजादी चाहिए, अमरीकी अनाज, भारतीय अर्थनीति, विकास की एक दिशा, बेकारी समस्या और हल, टैक्स या लूट, विश्वासघात दि ट्रू प्लान्स, डिबुलशन ए ग्रेटकाल आदि उनकी कुछ चर्चित कृतियाँ हैं। उनके लेखन का केवल एक ही लक्ष्य था भारत की विश्व पटल पर लगातार प्रतिष्ठा और विजय। उन्होंने  संघ की अनेक पत्र- पत्रिकाओं का लम्बे समय तक संपादन भी किया। जिसमें लखनऊ से प्रकाशित राष्ट्रधर्म व दिल्ली से प्रकाशित पांचजन्य प्रमुख हैं। वे एक ऐसे महान कर्मयोगी थे कि पत्र को समय पर निकालने के लिये उन्होंने रातभर कम्पोजिंग का कार्य स्वयं किया। पण्डित जी ने मात्र एक ही दिन में सम्राट चन्द्रगुप्त व आद्य शंकराचार्य  जैसे चरित्रों पर पुस्तक लिखकर भारतीय इतिहास के एक सांस्कृतिक निष्ठा वाले राज्य का चित्रण किया। निश्चित रूप से पण्डितजी शब्द और कृति की एकात्मकता के सर्जक थे। पण्डित जी ने राजनैतिक लेखन को भी दीर्घकालिक विषयों से जोड़कर रचना कार्य को सर्वकालिक बनाया। 

दीनदयाल जी की आर्थिक मान्यता थी  कि आर्थिक योजनाओं तथा आर्थिक प्रगति की माप समाज के सबसे निचले स्तर पर विद्यमान व्यक्ति से होनी चाहिए। अन्त्योदय को अंतिम लक्ष्य मानते थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी  के नेतृत्व में चल रही वर्तमान केंद्र सरकार व भाजपा शासित राज्य सरकारें दीनदयाल जी के अन्त्योदय की परिकल्पना को साकार करने का प्रयास कर रही हैं। 80 करोड़ की जनता को निःशुल्क राशन,  उज्वला योजना, आयुष्मान भारत, नल से जल, जन-धन ऐसी ही अन्त्योदय से प्रेरित योजनाएं हैं। दीन दयाल जी स्वदेशी और स्वावलंबन के पक्षधर थे प्रधानमंत्री की  स्टार्टअप इंडिया, विश्वकर्मा योजना जैसी योजनाएं  तथा आत्मनिर्भर भरत व लोकल फॉर वोकल जैसे अभियान दीनदयाल जी के विचारों के अनुरूप हैं। 

दीनयाल जी निष्कपट, चरित्रवान, प्रखर देशभक्त तथा लोकसंग्रही होने के साथ ही सादा जीवन तथा सनातन राष्ट्रधर्मिता से संपन्न थे। विश्व मानवता को भारत की पुण्य धरती के लाखों लाख ऋषियों के ज्ञान का तत्व एकात्म मानव दर्शन के रूप में पहुंचाने वाले पंडित दीनदयाल उपाध्याय शताब्दियों तक भारतीय राजनीति में ध्रुव तारे की तरह प्रकाशवान रहेंगे। 

(लेखक मृत्युंजय दीक्षित स्तम्भकार है और ये उनके निजी विचार हैं)

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