लोकतंत्र की बुनियाद को खतरा : पूर्व PM देवेगौड़ा ने सोनिया गांधी को लिखी चिट्ठी, विपक्ष के अराजक आचरण पर जताई गहरी चिंता

New Delhi : संसद में लगातार हो रहे हंगामे और विपक्षी दलों के व्यवहार को लेकर देश के पूर्व प्रधानमंत्री और वरिष्ठ राज्यसभा सदस्य एचडी देवेगौड़ा ने मोर्चा खोल दिया है। देवेगौड़ा ने कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी को एक पत्र लिखकर अपनी गहरी पीड़ा व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि संसद के भीतर और परिसर में जिस प्रकार का ‘अराजक’ माहौल बनाया जा रहा है, वह न केवल संसदीय परंपराओं को तार-तार कर रहा है, बल्कि इससे लोकतंत्र की बुनियाद को भी गंभीर नुकसान पहुँच सकता है।‘यह शायद मेरा अंतिम सत्र हो’: भावुक हुए देवेगौड़ाअपने 65 वर्षों के लंबे राजनीतिक जीवन का हवाला देते हुए देवेगौड़ा ने लिखा कि उन्होंने अपने करियर का लगभग 90 प्रतिशत समय विपक्ष की बेंचों पर बिताया है। उन्होंने सोनिया गांधी को संबोधित करते हुए कहा, “यह संभवतः मेरे जीवन का अंतिम संसदीय सत्र हो सकता है, इसलिए मैं संसद की गरिमा की बहाली के लिए अपनी बात रखना आवश्यक समझता हूँ।” उन्होंने याद दिलाया कि सोनिया गांधी ने खुद भी विपक्ष में रहते हुए गरिमा और परिपक्वता के साथ अपनी भूमिका निभाई है, लेकिन वर्तमान स्थिति चिंताजनक है।‘सीढ़ियों पर चाय-पकौड़े और धरना… यह अभूतपूर्व है’देवेगौड़ा ने पत्र में विपक्ष के मौजूदा आचरण पर कड़े सवाल उठाए हैं। उन्होंने लिखा कि संसद परिसर में धरना देना और रास्ता अवरुद्ध करना जैसी घटनाएं पहले कभी नहीं देखी गईं। उन्होंने कटाक्ष करते हुए कहा कि उनके समय में विपक्ष ने कभी संसद के प्रवेश द्वारों को ब्लॉक नहीं किया और न ही संसद की सीढ़ियों पर बैठकर चाय, बिस्कुट और पकौड़े मंगाकर ‘पिकनिक’ जैसा माहौल बनाया। उन्होंने नारेबाजी, पोस्टर प्रदर्शन और व्यक्तिगत टिप्पणियों को लोकतांत्रिक संस्थाओं के लिए घातक बताया।सोनिया गांधी से हस्तक्षेप की अपीलपूर्व प्रधानमंत्री ने सोनिया गांधी से आग्रह किया कि वे विपक्ष की सबसे वरिष्ठ नेता होने के नाते अपने दल और अन्य विपक्षी दलों को समझाने का प्रयास करें। देवेगौड़ा के अनुसार, “विपक्ष की भूमिका निश्चित रूप से सरकार की कमियों को उजागर करने की है, लेकिन इसके लिए एक स्थापित और समय-परीक्षित संसदीय तरीका होता है।” उन्होंने नेहरू, पटेल और आंबेडकर जैसे संस्थापकों की शिक्षाओं का जिक्र करते हुए कहा कि नियमों से बाहर जाकर सफलता हासिल करने की सोच लोकतंत्र को अस्थिर कर सकती है।‘वेल’ में कभी प्रवेश नहीं किया, बड़े नेताओं ने सिखाए थे ये संस्कारदेवेगौड़ा ने अपने पत्र में एक महत्वपूर्ण बात साझा की कि चाहे कितनी भी उकसाने वाली परिस्थितियां रही हों, उन्होंने अपने पूरे जीवन में कभी विरोध प्रदर्शन के लिए विधानसभा या संसद के ‘वेल’ (सदन के बीच का स्थान) में प्रवेश नहीं किया। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र के वरिष्ठ नेताओं ने उन्हें यही राजनीतिक संस्कार सिखाए थे, जिनका आज अभाव दिख रहा है। उन्होंने विश्वास जताया कि विपक्ष अपना विरोध दर्ज कराए, लेकिन 75 वर्षों में निर्मित संस्थाओं को कमजोर न करे।