लखनऊ (टेलीस्कोप टुडे संवाददाता)। हकीम लुकमान के चमत्कारी नुस्खे जानना हो या आयुर्वेदीय रसशास्त्र या फिर यूनानी तिब्ब चिकित्सा के बारे में, रवीन्द्रालय चारबाग में चल रहे लखनऊ पुस्तक मेले में आइये। यहां सिर्फ साहित्य ही नहीं आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे नये विषयों सहित अनेक प्राचीन और अनछुए विषयों पर किताबें मिल जाएंगी। पुस्तक मेले के तीसरे दिन रविवार होने नाते सुबह से रात नौ बजे तक रौनक बनी रही। निःशुल्क प्रवेश वाले मेले में कई परिवार तो यहां पिकनिक जैसे माहौल में दिखे।
मेले में शर्मा बुक प्रयागराज के स्टाल पर हकीम लुकमान के चमत्कारी नुस्खे के साथ ही धन्वंतरि कृत आयुर्वेदिक निधण्टु, वृहद बूटी प्रकाश, भारतीय जड़ी बूटियां और चिकित्सा सागर जैसी बहुत सी किताबें पाठकों को आकर्षित कर रही हैं। दिव्यांश पब्लिकेशन के स्टाल पर साहित्य अकादमी युवा पुरस्कार पाने वाली नीलोत्पल मृणाल की विश्वगुरु, दिव्य प्रकाश दुबे की पेंशन मत ले यार और दोस्तोयेवस्की का मनीष कुमार द्वारा किया हिन्दी अनुवाद व्हाइट नाइट्स एकदम नयी किताबें हैं और पसंद की जा रही हैं। यूं तो मेले में हर किताब पर कम से कम 10 प्रतिशत है, पर यहां सभी किताबों पर सीधे 20 प्रतिशत छूट है।
रंगों में जी उठा वंदे मातरम्, सजीं रंगोली
वंदे मातरम् गीत के डेढ़ सौ वर्षों पर युवा चित्रकारों अश्वनी कुमार प्रजापति, गौरांग अग्रवाल, सिद्धार्थ देव, कपिल शर्मा, शिवा वर्मा, विश्वास मिश्रा, श्रेया गोस्वामी, संध्या विश्वकर्मा, नेहा तथा वर्षा शर्मा ने मुख्य रूप से पीले, केसरिया और भूरे रंग का उपयोग करते हुए 15 फीट लम्बे कैनवस पर भूपेन्द्र अस्थाना के संयोजन में अपनी भावनाएं उकेरने के संग रंग भरने का काम किया।

नवअंशिका फाउंडेशन की ओर से महिला माह पर मेला परिसर में रंगोली प्रतियोगिता हुई। रंगोली प्रतियोगिता में विजयलक्ष्मी गुप्ता, स्मिता पांडेय, दीपश्री शुक्ला आदि ने रंगों और अन्य सामग्री के साथ किताबों से भी आकर्षक रंगोली बनायी। साहित्यिक मंच पर सुबह मंजुश्री संस्था की संगोष्ठी में मूल रचना से रूपांतरण में स्वतंत्रता विषय पर दयानंद पांडेय, शैलेश श्रीवास्तव, विवेक शुक्ला, डा.अमिता और संगम बहुगुणा इत्यादि ने विचार रखे।
इसी क्रम में ज्योति किरन रतन के संयोजन में अवधी व्यंजन पर चली परिचर्चा में अवधी पुरोधा डा. रामबहादुर मिसिर ने हाल ही में लखनऊ को यूनेस्को द्वारा स्वाद का शहर घोषित करने का जिक्र करते हुए अवध के पारम्परिक व्यंजनों के बारे में बताया।
प्रेम एक नदी से कथासंग्रह का विमोचन
संजय कुमार मालवीय के कहानी-संग्रह प्रेम एक नदी से का विमोचन रचनाकार डा. सुधाकर अदीब की अध्यक्षता में मुख्य अतिथि वरिष्ठ साहित्य मनीषी प्रमोदकान्त मिश्र ने किया। श्री मिश्र ने कहा कि संग्रह की कहानियां मानवीय भावनाओं और यथार्थपरक परिस्थितियों को सहज शब्दों में व्यक्त करती हैं।

सुधाकर अदीब ने कहाकि डा. संजय अपनी स्मृतियों के बीहड़ से कहानियों का ताना-बाना बुनते हैं। प्रेम उनके कथा लेखन का केन्द्रीय विषय है। संग्रह में शीर्षक कथा सहित प्रायश्चित, गिरगिट, पतरकी भाई और बरगद की छांह जैसी एक दर्जन कहानियां हैं। रश्मि प्रकाशन द्वारा प्रकाशित पुस्तक की कहानियों पर लेखिका डा.अमिता दुबे और पद्मकान्त शर्मा प्रभात ने भी पर लेखक संजय कुमार मालवीय के साथ विचार व्यक्त किये।
पूर्व मुख्य सचिव और दिवंगत साहित्यकार डा. शम्भुनाथ पर डा. अमिता दुबे की लिखी 63वीं पुस्तक भाव सुमन की सुगंध का भाव भरा विमोचन भी आज विशिष्ट रहा। आयोजन में लेखिका और डीएन लाल, सुधाकर अदीब, अलका प्रमोद, डा.कैलाशदेवी सिंह, चंद्रानाथ, मनोरमा लाल, हरिमोहन बाजपेयी माधव, नवीन शुक्ल व आलोक दुबे ने प्रतिभाग किया। स्वर्णरश्मि की आत्म प्रेम के प्रेरित करती 28 कविताओं की पुस्तक सूफी इश्क पर भी चर्चा की गयी।
शाम को युवा रचनाकार मंच के 46वें युवा रचनाकार दिवस पर सुल्तानपुर के युवा रचनाकार आदर्श पाण्डेय सम्मानित हुए। डा.रश्मि शील की अध्यक्षता में आयोजित समारोह में डा. मृदुल शर्मा, श्रीकृष्ण द्विवेदी द्विजेश, अवधेश गुप्त नमन, तारावती विद्या, सुषमा श्रीवास्तव, रितुराज पाण्डेय, इं. सुनील कुमार ने रचना पाठ किया।
‘दोस्त हैं जो हमारे रिश्ते को हर तरह से निबाह लेते हैं…’
साहित्यकार संसद और नमन प्रकाशन के तत्वावधान में ग़ज़लों की एक शाम पुस्तक मेले के नाम रही। अतिथियों का स्वागत व सम्मान मनोज सिंह चन्देल, आवारा नवीन, मुनेन्द्र शुक्ल, सुदीप उप्रेती और प्रतिष्ठा शुक्ला ने किया। आरम्भ जयपुर के अनिल अनवर की वाणी वन्दना से हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे शायर रामप्रकाश बेखुद ने ग़ज़ल में कहा- गुलामों को कहां नींद आएगी शाहों के महलों में, अगर सो भी गये तो रात भर बिस्तर उछालेगा।

मुख्य अतिथि कृपाशंकर ‘विश्वास’ का शेर था- रब ने बख़्शी हैं चिरागों की सिफर, वर्ना गैरों के लिये खुद को जलाता कौन है। डॉ.फिदा हुसैन ने अपनी ग़ज़ल ‘एक सच बोल कर फिदा तूने, ज़िन्दगी दाँव पर लगा दी है पढ़कर धाक जमायी। गोरखपुर के सरवत जमाल ने पढ़ा- जो मेरे हाथ में माचिस की तीलियां होती, फिर अपने शहर में क्या इतनी झाड़ियां होती। गजलकार ज्योति शेखर ने कहा – दोस्त हैं जो हमारे रिश्ते को हर तरह से निबाह लेते हैं, हमसे कोई खता जो हो जाए, अपने सर पे गुनाह लेते हैं।
रचना मिश्रा की ग़ज़ल का शेर “दूर अपने आप से कितना हुआ है आदमी, ख़्वाहिशों की भीड़ में खोया हुआ है आदमी…” था। प्रतिभा श्रीवास्तव ने “मेरे हक में भी दुआ यार करा दे कोई, तोड़ के पिंजरा मुझे आजाद करा दे कोई…” को खूब दाद मिली। वकार बाराबंकवी ने तरन्नुम में सुनाया- तू कब्ज़ा चाहता है आस्मां पर! तेरे हिस्से में बस दो गज जमी है। हर्षित मिश्र ने पढ़ा- कहाँ पे चाय, कहाँ जाम, जानता हूँ मियाँ, नया नहीं हूँ हर इक काम जानता हूँ मियाँ। अरविन्द झा की गजल का शेर था- फिदा जिस तिल पे दिल मेरा हुआ है, नहीं तिल वो जुआं चिपका हुआ है। संयोजक नवीन शुक्ल ने सुनाया- तुम सियासी हो तुम्हें होगी जरूरत इसकी, मुझसे ये हिन्दू मुसलमान नहीं होने का।
16 मार्च के कार्यक्रम
- पूर्वाह्न 11:00 बजे काव्या सतत् साहित्य यात्रा – काव्यगोष्ठी
- अपराह्न 12:30 बजे शारदेय प्रकाशन की ओर से संगोष्ठी
- अपराह्न 2:00 बजे पुस्तक विमोचन- डा.अमरेश मोहन
- शाम 5: 00 बजे अवधी व्यंजन उत्सव
- शाम 5:30 बजे सम्मान समारोह- सुंदर साहित्य
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