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शहरों में रहने की मजबूरी और आवास संकट


डॉ. एस.के. गोपाल

किसी भी शहर की वास्तविक प्रगति ऊँची इमारतों, चौड़ी सड़कों या चमकदार परियोजनाओं से नहीं मापी जाती। उसका सही पैमाना यह होता है कि वहाँ रहने वाला साधारण नागरिक किस तरह का जीवन जी पा रहा है। यदि दस से तीस हजार रुपये प्रतिमाह कमाने वाला व्यक्ति अपने ही शहर में एक छोटा सा घर लेने की कल्पना भी न कर सके तो यह केवल आर्थिक समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक और नीतिगत चिंता का विषय है। आवास किसी भी व्यक्ति के लिए विलास नहीं, बल्कि सम्मानजनक जीवन की पहली शर्त है।

यह स्वीकार करना होगा कि केंद्र सरकार ने “सबको घर” के संकल्प को नीति के केंद्र में रखा है। प्रधानमंत्री आवास योजना ने देश के करोड़ों परिवारों के लिए पक्के मकान का सपना साकार किया है। ग्रामीण क्षेत्रों में इस योजना ने उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की है। झोपड़ियों और कच्चे घरों की जगह पक्की छत मिलना केवल भौतिक बदलाव नहीं, बल्कि आत्मसम्मान और सुरक्षा की अनुभूति है। इस पहल के लिए सरकार की सराहना की जानी चाहिए, क्योंकि आवास को सामाजिक अधिकार के रूप में देखने की यह सोच महत्वपूर्ण है। लेकिन शहरों की स्थिति अपेक्षाकृत अधिक जटिल है।

शहरी भारत में आबादी लगातार बढ़ रही है। रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य की तलाश में गाँवों से शहरों की ओर पलायन थमता नहीं दिखता। ऐसे में शहरों पर आवास का दबाव स्वाभाविक रूप से बढ़ता है। समस्या यह नहीं है कि सरकार की नीयत में कमी है; समस्या यह है कि शहरी आबादी के अनुपात में आवासीय योजनाओं का विस्तार उस गति से नहीं हो पा रहा, जिसकी आवश्यकता है।

लखनऊ जैसे शहरों में निजी क्षेत्र में काम करने वाले बड़ी संख्या में लोग 10 से 30 हजार रुपये मासिक आय वर्ग में आते हैं। यही लोग शहर की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। दुकानों, दफ्तरों, स्कूलों, अस्पतालों, निर्माण स्थलों और सेवा क्षेत्रों को चलाते हैं। लेकिन विडंबना यह है कि यही वर्ग अपने परिवार के लिए स्थायी छत की व्यवस्था नहीं कर पा रहा। इस आय वर्ग का व्यक्ति साल भर में लगभग डेढ़ से तीन लाख रुपये कमाता है। इस सीमित आय में किराया, भोजन, बच्चों की पढ़ाई, स्वास्थ्य और परिवहन जैसे खर्च पूरे करना ही एक चुनौती है। ऐसे में यदि आवास योजनाएँ 40–50 लाख रुपये की कीमतों के इर्द-गिर्द सिमट जाएँ, तो आम आदमी अपने आप ही इस व्यवस्था से बाहर हो जाता है।

सरकारी आवास संस्थाओं- चाहे वह लखनऊ विकास प्राधिकरण हो, आवास विकास परिषद हो या अन्य शहरी निकाय, से यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि वे निजी बिल्डरों से अलग दृष्टिकोण अपनाएँ। निजी बिल्डर व्यवसाय करता है, मुनाफा कमाता है, यह उसकी प्रकृति है। लेकिन सरकारी तंत्र का उद्देश्य लाभ अर्जन नहीं, बल्कि नागरिकों को बुनियादी सुविधा उपलब्ध कराना होना चाहिए। यदि सरकारी संस्थाएँ भी उसी व्यावसायिक सोच से काम करने लगें, तो आम आदमी के लिए विकल्प सीमित होते चले जाते हैं।

यह भी सच है कि प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत शहरी गरीबों के लिए फ्लैट उपलब्ध कराए जा रहे हैं। सब्सिडी और ब्याज सहायता जैसे प्रावधान किए गए हैं। लेकिन व्यवहारिक चुनौती यह है कि इन योजनाओं की संख्या और उपलब्धता शहरों की वास्तविक जरूरतों की तुलना में कम पड़ जाती है। ईडब्ल्यूएस और एलआईजी वर्ग के लिए योजनाएँ अक्सर सीमित होती हैं, या उनकी किश्तें उस आय वर्ग के लिए सहज नहीं होतीं, जिसके लिए वे बनाई गई हैं। यहाँ मूल प्रश्न किश्तों की सामर्थ्य का है। दस से तीस हजार रुपये प्रतिमाह कमाने वाला व्यक्ति यदि 3–4 हजार रुपये की मासिक किश्त 20–25 वर्षों तक दे सकता है, तो वही मॉडल यथार्थवादी कहा जाएगा। यदि किश्तें इससे अधिक होंगी, तो योजना काग़ज़ पर सफल और ज़मीन पर असफल सिद्ध होगी। आवास नीति को इस वास्तविकता के अनुरूप ढालना आवश्यक है।

आज स्थिति यह है कि आम आदमी या तो जीवन भर किराए पर रहने को मजबूर है, या फिर रोज़गार की खातिर अपने गाँव की ज़मीन बेचकर शहर के बाहरी इलाके में चार-पांच सौ वर्ग फीट का एक छोटा सा घर लेने का कठिन निर्णय करता है। यह केवल आवास संकट नहीं, बल्कि ग्रामीण–शहरी असंतुलन को भी बढ़ाता है। गाँव अपनी ज़मीन और युवा आबादी खोते जा रहे हैं, जबकि शहर अस्थायी और असुरक्षित आबादी से भरते जा रहे हैं। इसके उलट, संपन्न वर्ग के लिए आवास कभी संकट नहीं बनता। उसके पास पूँजी है, निवेश के साधन हैं और विकल्प भी। वह शहर में अच्छा मकान भी बना लेता है और शहर के आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में फार्म हाउस भी। यह अंतर धीरे-धीरे सामाजिक असमानता को गहरा करता है।

इस पूरे परिदृश्य में यह कहना अनुचित नहीं होगा कि आवास को निवेश की वस्तु मानने की प्रवृत्ति ने समस्या को और जटिल बना दिया है। घर रहने के लिए होते हैं, केवल निवेश के लिए नहीं। जब आवास नीति निवेशकों को प्राथमिकता देने लगती है, तो रहने वालों की ज़रूरतें पीछे छूट जाती हैं। यहाँ फिर यह दोहराना आवश्यक है कि सरकार का “सबको घर” का संकल्प सराहनीय है। प्रधानमंत्री आवास योजना ने सही दिशा दिखाई है। अब आवश्यकता इस बात की है कि शहरी क्षेत्रों में आबादी के अनुपात में आवासीय योजनाओं का विस्तार किया जाए। छोटे लेकिन गरिमापूर्ण घर, यथार्थवादी कीमतें, लंबी अवधि की सहज किश्तें और ईडब्ल्यूएस व एलआईजी वर्ग के लिए वास्तविक रूप से सुलभ विकल्प, इन्हीं बिंदुओं पर नीति को केंद्रित करना होगा।

सरकारी तंत्र यदि व्यवसाय करने लगे, तो यह सामाजिक संतुलन के लिए उचित नहीं है। सरकारी संस्थाओं को निजी बिल्डरों से प्रतिस्पर्धा करने के बजाय, उन वर्गों के लिए काम करना चाहिए जिनके पास बाज़ार में कोई प्रभावी विकल्प नहीं है। यही उनकी भूमिका और जिम्मेदारी है।
रोटी और कपड़े के बाद यदि मकान भी आम आदमी की पहुँच से बाहर हो जाए, तो यह केवल आवास संकट नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए चेतावनी है। शहरों का भविष्य केवल इमारतों में नहीं, बल्कि उन लोगों में बसता है जो उन्हें रोज़ अपने श्रम से जीवंत रखते हैं। सरकार के सामने यह आत्ममंथन का अवसर है कि विकास का लाभ केवल पूँजी तक सीमित न रहे, बल्कि उस व्यक्ति तक भी पहुँचे, जिसके लिए एक छोटी-सी छत सबसे बड़ा सपना है। यदि आवास नीति इस संवेदनशीलता के साथ आगे बढ़े, तो “सबको घर” का संकल्प केवल नारा नहीं, बल्कि सच्चाई बन सकता है।

(लेखक डॉ. एस.के. गोपाल स्वतंत्र पत्रकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)