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आधुनिक विज्ञान के साथ शास्त्रीय होम्योपैथी के संबंध पर विशेषज्ञों ने की चर्चा

लखनऊ (शम्भू शरण वर्मा/टेलीस्कोप टुडे)। डॉक्टर्स एसोसिएशन ऑफ क्लासिकल होम्योपैथी (DACH) ने जीनोम के सहयोग से रविवार को शास्त्रीय होम्योपैथी पर एकदिवसीय ज्ञानवर्धक सत्र आयोजित किया। कार्यक्रम का उद्घाटन मुख्य अतिथि डॉ. किरण दास (सीएमएस, लखनऊ मंडल) ने किया।

सत्र में होम्योपैथी चिकित्सकों, विद्यार्थियों और विषय में रुचि रखने वाले प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। इस दौरान शास्त्रीय होम्योपैथी के सिद्धांतों और वर्तमान संदर्भ में इसकी प्रासंगिकता पर चर्चा हुई। दो प्रमुख विषयों ‘ट्यूबरकुलिनम एवं ट्यूबरकुलर डायथेसिस’ तथा ‘होम्योपैथी के पीछे का विज्ञान : एपिजेनेटिक्स’ पर विशेषज्ञों ने प्रस्तुतियां दीं।

वक्ता डॉ. नितिन के. मौर्य और डॉ. स्वतंत्र पी. गंगवार ने होम्योपैथिक दर्शन, दीर्घकालिक रोगों के पैटर्न तथा होम्योपैथी और एपिजेनेटिक्स के बीच संभावित संबंधों पर विचार साझा किए। उन्होंने विद्यार्थियों को विषय के नवीन शोध से अपडेट रहने और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ अध्ययन करने पर जोर दिया।

बदलती जीवनशैली से बढ़ रहीं स्वास्थ्य चुनौतियां, समग्र दृष्टिकोण जरूरी : डॉ. किरण दास

मुख्य अतिथि डॉ. किरण दास (सीएमएस, लखनऊ मंडल) ने शास्त्रीय होम्योपैथी के सिद्धांतों, आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के साथ उसके संबंध और बदलती जीवनशैली से जुड़ी स्वास्थ्य चुनौतियों पर विचार रखे।

डॉ. किरण दास ने कहा कि शास्त्रीय होम्योपैथी की नींव करीब 250 वर्ष पहले डॉ. सैमुअल हैनीमैन ने रखी थी। उस समय चिकित्सा विज्ञान और वैज्ञानिक उपकरण आज की तुलना में काफी सीमित थे। इसलिए उस दौर में दिए गए सिद्धांतों और उनकी भाषा को वर्तमान वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य में समझने के लिए आधुनिक शोध और तकनीक से उनका अध्ययन आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि आज जेनेटिक्स, माइक्रोस्कोपी, आधुनिक चिकित्सा उपकरण और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी तकनीकों के माध्यम से मानव शरीर और रोगों को समझने की क्षमता काफी बढ़ी है। आधुनिक शोध के संदर्भ में पुराने चिकित्सा सिद्धांतों का अध्ययन करने से कई अवधारणाओं को नए दृष्टिकोण से समझने का अवसर मिलता है।

डॉ. दास ने कहा कि मानव स्वास्थ्य पर केवल आनुवंशिक कारकों का ही प्रभाव नहीं पड़ता, बल्कि व्यक्ति जिस वातावरण और जीवनशैली में रहता है, उसका भी असर होता है। बदलती जीवनशैली के कारण कई प्रकार के लाइफस्टाइल डिसऑर्डर सामने आ रहे हैं। ऐसे में मरीज को केवल बीमारी के स्तर पर नहीं, बल्कि उसके संपूर्ण स्वास्थ्य, जीवनशैली और व्यक्तिगत परिस्थितियों के संदर्भ में देखने की जरूरत है।

उन्होंने महिला स्वास्थ्य और प्रजनन संबंधी चुनौतियों का उल्लेख करते हुए कहा कि आधुनिक जीवनशैली में आए बदलावों के बीच महिलाओं के स्वास्थ्य को व्यापक दृष्टिकोण से समझना जरूरी है। उन्होंने दावा किया कि कुछ मामलों में शास्त्रीय होम्योपैथी को सहायक उपचार के रूप में अपनाने से लाभ मिल सकता है और कुछ दंपतियों को प्रजनन संबंधी समस्याओं में उपचार से राहत मिली है।

आधुनिक शोध से अपडेट रहें होम्योपैथी के विद्यार्थी, इससे बढ़ेगा आत्मविश्वास : डॉ. स्वतंत्र पी. गंगवार

डॉ. स्वतंत्र पी. गंगवार ने कहा कि समाज में अक्सर होम्योपैथी को लेकर कई तरह की भ्रांतियां देखने को मिलती हैं। ऐसे में विद्यार्थियों के लिए जरूरी है कि वे अपने विषय के नवीनतम शोध और वैज्ञानिक पहलुओं से लगातार अपडेट रहें। उन्होंने कहा कि होम्योपैथी को लेकर एक धारणा बनी हुई है कि यह केवल त्वचा रोगों या छोटी-मोटी स्वास्थ्य समस्याओं के उपचार तक सीमित है। इसके विपरीत, होम्योपैथी के क्षेत्र में गंभीर और जटिल मामलों को लेकर भी अध्ययन और अनुभव उपलब्ध हैं। विद्यार्थियों को ऐसे मामलों तथा नवीन शोध के बारे में जानकारी दी जानी चाहिए, ताकि वे अपने विषय को अधिक वैज्ञानिक और आत्मविश्वासपूर्ण दृष्टिकोण से समझ सकें।

डॉ. गंगवार ने कहा कि किसी भी बीमारी के उपचार की अपनी सीमाएं होती हैं। हर रोग और हर मरीज की स्थिति के आधार पर यह देखना जरूरी है कि बीमारी उपचार योग्य है, नियंत्रण के स्तर पर है या केवल लक्षणों में राहत संभव है। इसलिए चिकित्सा पद्धति की क्षमताओं और सीमाओं को समझना भी उतना ही आवश्यक है। उन्होंने कहा कि यदि विद्यार्थी लगातार अध्ययन करें, नवीन शोध से खुद को अपडेट रखें और अपने विषय की वैज्ञानिक अवधारणाओं को गहराई से समझें, तो वे होम्योपैथी के प्रति समाज में बनी गलत धारणाओं का तथ्यात्मक ढंग से जवाब दे सकेंगे।

होम्योपैथी के मूल सिद्धांतों के अनुरूप चिकित्सा अभ्यास जरूरी : डॉ. नितिन मौर्या

डॉ. नितिन के. मौर्या ने कहा कि होम्योपैथी के मूल सिद्धांतों और वैज्ञानिक पद्धति के अनुरूप चिकित्सा अभ्यास करने वाले चिकित्सकों की संख्या अभी सीमित है। इसका असर इस चिकित्सा पद्धति की विश्वसनीयता और उसकी सही पहचान पर भी पड़ता है। जरूरत है कि चिकित्सक निर्धारित सिद्धांतों का पालन करते हुए ईमानदारी और समर्पण के साथ मरीजों का उपचार करें। उन्होंने कहा कि होम्योपैथी को केवल जुकाम, बुखार या त्वचा संबंधी समस्याओं तक सीमित समझना उचित नहीं है। इसके माध्यम से विभिन्न प्रकार के रोगों के उपचार को लेकर चिकित्सकों के अनुभव और अध्ययन उपलब्ध हैं। हालांकि हर बीमारी की अपनी सीमाएं होती हैं और मरीज की स्थिति के अनुसार उपचार की संभावनाओं का आकलन किया जाना चाहिए।

डॉ. मौर्या ने कहा कि आज बड़ी संख्या में बच्चे एलर्जी जैसी समस्याओं से प्रभावित हो रहे हैं। ऐसे मामलों में मरीजों को लंबे समय तक केवल दवाओं पर निर्भर रखने के बजाय बीमारी के कारणों और मरीज की समग्र स्थिति को समझना जरूरी है। उन्होंने कहा कि उचित पद्धति और सिद्धांतों के अनुसार किया गया होम्योपैथिक उपचार मरीजों को राहत देने में सहायक हो सकता है।

उन्होंने विद्यार्थियों का उत्साह बढ़ाते हुए कहा कि होम्योपैथी का अध्ययन करने वाले छात्रों को अपने विषय को लेकर हीन भावना रखने की जरूरत नहीं है। उन्हें पूरी मेहनत, लगन और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ अध्ययन करना चाहिए। उन्होंने कहा कि विद्यार्थियों को यह समझना होगा कि वे जिस क्षेत्र में आए हैं, उसमें बेहतर कार्य करके अपनी अलग पहचान बना सकते हैं और समाज को इसका लाभ दे सकते हैं। डॉ. मौर्या ने कहा कि विद्यार्थियों में आत्मसम्मान और आत्मविश्वास बढ़ाना भी ऐसे आयोजनों का महत्वपूर्ण उद्देश्य है। यदि छात्र अपने विषय का गहन अध्ययन कर सही सिद्धांतों के साथ चिकित्सा अभ्यास करें, तो वे होम्योपैथी को बेहतर तरीके से समाज तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

कार्यक्रम में विभिन्न संस्थानों से आए चिकित्सकों और विद्यार्थियों ने वक्ताओं से संवाद किया और विषय से जुड़े सवाल पूछे। आयोजकों ने कहा कि ऐसे अकादमिक सत्रों के माध्यम से शास्त्रीय होम्योपैथी के अध्ययन, शोध और ज्ञान-साझाकरण को बढ़ावा देने का प्रयास किया जा रहा है।