Friday , September 25 2026

सरकारी आवास योजना में आम आदमी कहां है?

(डॉ. एस.के. गोपाल)

तृतीय श्रेणी का एक सरकारी कर्मचारी या निजी क्षेत्र में दस से बीस हजार रुपये महीने की नौकरी करने वाला युवक यदि लखनऊ में अपना घर बनाना चाहे तो वह कहां जाए? उसकी पूरी नौकरी की बचत भी क्या उसे तीस लाख रुपये का भूखंड खरीदने और फिर उस पर मकान बनाने की स्थिति में पहुंचा सकती है? अगर जवाब नहीं है तो फिर सवाल केवल किसी एक आवासीय योजना की कीमत का नहीं, अपितु पूरी सरकारी आवास नीति की प्राथमिकता का है। जब आम आदमी की पहुंच से घर बाहर हो जाए तो सरकारी आवास योजना आखिर किसके लिए है?

मुख्यमंत्री शहरी विस्तारीकरण/नई शहरी प्रोत्साहन योजना के अंतर्गत लखनऊ में नैमिष नगर और वरुण विहार जैसी बड़ी आवासीय योजनाएं विकसित की जा रही हैं। नैमिष नगर सीतापुर रोड पर तीन हजार छह सौ इक्यासी एकड़ से अधिक क्षेत्र में प्रस्तावित है, जबकि वरुण विहार आगरा एक्सप्रेसवे के पास करीब छह हजार पांच सौ अस्सी एकड़ क्षेत्र में विकसित की जा रही है। योजनाओं का आकार बड़ा है, लेकिन असली कसौटी यह है कि इनमें निम्न और मध्यम आय वर्ग के परिवार के लिए कितनी जगह और कितनी राहत है।

नैमिष नगर में करीब तीस लाख रुपये का छोटा भूखंड भी सीमित आय वाले परिवार के लिए बड़ी चुनौती है। उसके बाद मकान निर्माण का खर्च अलग। तृतीय श्रेणी के सरकारी कर्मचारी के लिए भी इतनी बड़ी राशि जुटाना आसान नहीं और दस से पंद्रह हजार रुपये कमाने वाले निजी कर्मचारी के लिए तो यह लगभग असंभव जैसी स्थिति है। ऐसे परिवार के सामने सवाल है कि वह घर बनाए या जीवन की दूसरी आवश्यकताएं पूरी करे?

सरकार का काम केवल जमीन अधिग्रहित करके उसे विकसित करना और फिर महंगी दर पर बेच देना नहीं होना चाहिए। आवास बाजार की वस्तु भर नहीं, बुनियादी जरूरत है। सरकारी आवास नीति की सार्थकता तभी है जब वह बाजार की कीमत और आम नागरिक की क्रय क्षमता के बीच की दूरी कम करे। विडंबना यह है कि योजनाएं अक्सर एयर कंडीशन कार्यालयों में बैठकर तैयार होती हैं। नक्शे पर सड़क, पार्क और प्लॉट साफ दिखाई देते हैं, लेकिन वह परिवार दिखाई नहीं देता जो दस-पंद्रह हजार रुपये की आय में राशन, बच्चों की फीस, बिजली, इलाज और आने-जाने का खर्च संभालता है। नीति बनाने वालों को कभी ऐसे परिवार के साथ बैठकर उसका मासिक बजट भी देखना चाहिए। तभी पता चलेगा कि कागज पर उचित लगने वाली कीमत वास्तविक जीवन में कितनी भारी है।

सवाल केवल कीमत का नहीं, घर के आकार का भी है। प्रधानमंत्री आवास योजना-शहरी में ईडब्ल्यूएस परिवारों के लिए छोटे आकार के आवास का प्रावधान है। आश्रित माता-पिता को भी लाभार्थी परिवार की परिभाषा में शामिल किया गया है। लेकिन भारतीय समाज की वास्तविकता यह है कि पति-पत्नी, बच्चे और वृद्ध माता-पिता आज भी एक साथ रहते हैं। तीन-चार सौ वर्गफुट का आवास सिर पर छत तो देता है, लेकिन ऐसे संयुक्त परिवार के लिए पर्याप्त निजी और साझा स्थान देना कठिन है।

इसलिए निम्न-मध्यम और मध्यम आय वर्ग के लिए सात सौ पचास से आठ सौ वर्गफुट का भूखंड अधिक व्यावहारिक विकल्प हो सकता है। ऐसे भूखंड पर परिवार अपनी आर्थिक क्षमता के अनुसार एक या दो मंजिल का मकान बना सकता है। माता-पिता, बच्चों और दंपती के लिए अलग स्थान, बैठक, रसोई और थोड़ी खुली जगह की गुंजाइश रहती है। आवास नीति में परिवार की वास्तविक जरूरत को भी उतना ही महत्व मिलना चाहिए जितना जमीन और निर्माण की लागत को।

सरकारी योजनाओं की सफलता केवल इस बात से नहीं तय होनी चाहिए कि कितने प्लॉट या कितने मकान बनाए गए। असली प्रश्न यह है कि कितने परिवार उन्हें खरीद सकते हैं और उनमें सम्मानपूर्वक रह सकते हैं। यदि दस से पंद्रह हजार रुपये कमाने वाला कमाऊ सदस्य सरकारी योजना में भी घर नहीं खरीद सकता तो नीति की प्राथमिकताओं पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

नैमिष नगर और वरुण विहार जैसी विशाल योजनाओं में इसका समाधान संभव है। ईडब्ल्यूएस और निम्न-मध्यम आय वर्ग के लिए पर्याप्त संख्या में किफायती भूखंड और फ्लैट हों। छोटे भूखंडों की अलग श्रेणी हो। लंबी अवधि की आसान किस्तें हों। जहां आवश्यक हो, सरकार भूमि लागत में राहत दे। और आवास का आकार परिवार की जरूरत के अनुरूप रखा जाए।

लखनऊ विकास प्राधिकरण के पास अलग-अलग आय वर्गों के लिए आवास विकसित करने का पुराना अनुभव है। इसलिए नई योजनाओं में किफायती आवास को औपचारिक खानापूर्ति न बनाकर वास्तविक प्राथमिकता देना जरूरी है। यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि निम्न और मध्यम आय वर्ग के लिए कितने भूखंड और आवास रखे गए हैं और उनकी कीमत उनकी आय के अनुपात में कितनी है।

सरकारी आवास योजना की सफलता जमीन की कीमत से नहीं, उस परिवार की पहुंच से मापी जानी चाहिए जिसके लिए घर जीवन का सबसे बड़ा सपना है। तृतीय श्रेणी का कर्मचारी और दस से पंद्रह हजार रुपये कमाने वाला निजी कर्मचारी भी यदि कह सके कि इस योजना में मेरे परिवार के लिए घर है, तभी ऐसी योजना अपने सामाजिक उद्देश्य को पूरा करती मानी जाएगी।

नैमिष नगर और वरुण विहार लखनऊ के विस्तार की बड़ी परियोजनाएं हैं। इन्हें केवल नई टाउनशिप बनाने की परियोजना न बनाकर आम परिवार के लिए सुलभ और सम्मानजनक आवास उपलब्ध कराने का अवसर बनाया जाना चाहिए। यही शहरी विकास का वास्तविक सामाजिक अर्थ है।

(लेखक डॉ. एस.के. गोपाल स्वतंत्र पत्रकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं)