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तिरंगे को स्वर देने वाले श्यामलाल गुप्त पार्षद

पुण्यतिथि (10 अगस्त) पर स्मरण

(डॉ. एस.के. गोपाल)

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास केवल राजनीतिक संघर्ष का इतिहास नहीं है। यह उन कवियों, लेखकों और जनसेवियों की कहानी भी है जिन्होंने अपनी लेखनी से देशवासियों में राष्ट्रीय चेतना जगाई। श्यामलाल गुप्त पार्षद इसी परंपरा के महत्वपूर्ण नाम हैं। उनका नाम आते ही विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झंडा ऊँचा रहे हमारा की पंक्तियां स्मृति में उतर आती हैं। यह गीत भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में राष्ट्रीय भावना का सशक्त स्वर बनी। पार्षद जी की पहचान केवल इस अमर गीत के रचयिता के रूप में नहीं है। वे स्वतंत्रता सेनानी, कवि, शिक्षक और पत्रकार भी थे।

श्यामलाल गुप्त पार्षद का जन्म 16 सितंबर 1893 को कानपुर जनपद के नरवल में हुआ था। उनके पिता विश्वेश्वर प्रसाद गुप्त थे। प्रारंभिक जीवन साधारण परिस्थितियों में बीता। अध्ययन के प्रति उनकी रुचि आरंभ से थी। किशोरावस्था में ही उन्होंने कविता लिखना शुरू कर दिया था। हिंदी साहित्य का उन्होंने गंभीर अध्ययन किया। आगे चलकर अध्यापन से जुड़े। शिक्षा के क्षेत्र में रहते हुए भी उनका मन राष्ट्रीय गतिविधियों की ओर बढ़ता गया। साहित्य उनके लिए केवल व्यक्तिगत अभिरुचि नहीं रहा। वह सामाजिक चेतना और राष्ट्रीय भावना की अभिव्यक्ति का माध्यम बन गया।

स्वतंत्रता आंदोलन में श्यामलाल गुप्त की सक्रिय भागीदारी रही। वे असहयोग आंदोलन से जुड़े। नमक सत्याग्रह और भारत छोड़ो आंदोलन में भी उनकी सक्रियता का उल्लेख मिलता है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान उन्हें जेल यात्राएँ करनी पड़ीं। फतेहपुर उनके सार्वजनिक जीवन का प्रमुख कार्यक्षेत्र बना। वर्ष 1920 में वे फतेहपुर जिला कांग्रेस के अध्यक्ष बने। संगठन के साथ उनका जुड़ाव केवल औपचारिक नहीं था। वे जनसंपर्क और जनजागरण के कार्य में सक्रिय रहे। उनके जीवन में राष्ट्रसेवा विचार से आगे बढ़कर कर्म का रूप ले चुकी थी। पार्षद जी का साहित्य इसी राष्ट्रीय चेतना से जुड़ा था। उनकी भाषा सरल और गेय थी। उनकी रचनाओं में देशप्रेम, त्याग और जागरण का स्वर मिलता है। वे कविता को जनमानस तक पहुँचाने में विश्वास रखते थे। पत्रकारिता से भी उनका संबंध रहा। उन्होंने सचिव नामक मासिक पत्र का संपादन और प्रकाशन किया। इससे उनके व्यक्तित्व का एक और पक्ष सामने आता है। वे साहित्य को समाज से जोड़ने वाले रचनाकार थे। उनकी कविता और पत्रकारिता दोनों में राष्ट्रीय उद्देश्य स्पष्ट दिखाई देता है।

पार्षद जी के जीवन का सबसे प्रसिद्ध अध्याय झंडा गीत की रचना से जुड़ा है। कानपुर के प्रसिद्ध पत्रकार और स्वतंत्रता सेनानी गणेश शंकर विद्यार्थी से उनके निकट संबंध थे। विद्यार्थी जी ने उनसे राष्ट्रीय ध्वज के लिए एक गीत लिखने का आग्रह किया। इसी क्रम में श्यामलाल गुप्त ने विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झंडा ऊँचा रहे हमारा की रचना की। गीत में तिरंगे को राष्ट्रीय सम्मान और स्वतंत्रता की आकांक्षा के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया। इसकी सरल भाषा और ओजपूर्ण लय ने इसे जन जन तक पहुँचाया। स्वतंत्रता आंदोलन की सभाओं में यह गीत सामूहिक स्वर में गाया जाने लगा।

13 अप्रैल 1924 को कानपुर के फूलबाग में आयोजित एक कार्यक्रम में इस गीत का सार्वजनिक गायन हुआ। कार्यक्रम जलियांवाला बाग हत्याकांड की बरसी से संबंधित था। हजारों लोगों ने गीत को सामूहिक रूप से गाया। इसके बाद यह गीत स्वतंत्रता आंदोलन के विभिन्न अवसरों पर गूंजता रहा। वर्ष 1938 में हरिपुरा कांग्रेस अधिवेशन में नेताजी सुभाषचंद्र बोस की उपस्थिति में भी इस गीत का सामूहिक गायन हुआ। इन अवसरों ने गीत को राष्ट्रीय आंदोलन की व्यापक पहचान दी। गीत की शक्ति उसकी सरलता में थी। इसे याद करना आसान था और सामूहिक स्वर में गाना भी सहज था।

श्यामलाल गुप्त पार्षद के व्यक्तित्व में कवि और कर्मठ स्वतंत्रता सेनानी का सुंदर मेल दिखाई देता है। वे केवल कविता लिखकर अपने दायित्व से मुक्त नहीं हुए। उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भागीदारी की। जेल गए। संगठन का काम किया। पत्रकारिता के माध्यम से विचारों को समाज तक पहुँचाया। उनके जीवन में सादगी, अनुशासन और राष्ट्रनिष्ठा प्रमुख दिखाई देती है। पार्षद उनके नाम का प्रसिद्ध उपनाम था। पार्षद जी की सबसे बड़ी साहित्यिक उपलब्धि यह थी कि उन्होंने राष्ट्रीय भावना को जनभाषा और जनलय से जोड़ा। उस समय स्वतंत्रता आंदोलन को ऐसे गीतों की आवश्यकता थी जिन्हें सामान्य लोग सहजता से अपना सकें। विजयी विश्व तिरंगा प्यारा ने यह भूमिका निभाई। गीत में किसी कठिन विचार की जटिल व्याख्या नहीं है। कुछ सरल पंक्तियाँ हैं। उनमें देश के प्रति गर्व है। ध्वज के प्रति सम्मान है। स्वतंत्रता के लिए संकल्प है। यही सहजता गीत की स्थायी शक्ति बनी। आज भी राष्ट्रीय पर्वों और अनेक सार्वजनिक अवसरों पर इसकी पंक्तियाँ सुनाई देती हैं।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद श्यामलाल गुप्त पार्षद को उनके योगदान के लिए सम्मान मिला। भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया। 10 अगस्त 1977 को उनका निधन हुआ। उनके निधन के साथ एक युग का एक महत्वपूर्ण स्वर मौन हुआ। उनकी रचना जीवित रही। तिरंगे के साथ उनका गीत भी पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ता रहा। यह किसी रचनाकार के लिए बड़ी उपलब्धि है कि उसकी कविता अपने समय की सीमा पार कर जाए और आने वाली पीढ़ियों की सामूहिक स्मृति का हिस्सा बन जाए। तिरंगा हम भारतवासियों की स्वतंत्रता, एकता और राष्ट्रीय स्वाभिमान का प्रतीक है। पार्षद जी का गीत इन भावों को शब्द देता है। जब तिरंगा आकाश में लहराता है और हजारों कंठों से स्वर उठता है, विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झंडा ऊँचा रहे हमारा, तब उसमें श्यामलाल गुप्त पार्षद की राष्ट्रचेतना आज भी जीवित दिखाई देती है।

(लेखक डॉ. एस.के. गोपाल क्रान्ति साहित्य के अध्येता और स्वतंत्र पत्रकार हैं)