डॉ. एस.के. गोपाल
भारत की आत्मा केवल उसकी भौगोलिक सीमाओं में नहीं अपितु उसके सांस्कृतिक और नैतिक मूल्यों में बसती है। राम और कृष्ण की जन्मभूमि उत्तर प्रदेश सदियों से धर्म, मर्यादा और लोककल्याण की धारा को दिशा देता रहा है। यही वह भूमि है जहाँ आदर्शों ने राजनीति को राह दिखाई और समाज ने नेतृत्व से अपेक्षाएँ कीं। ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि जब बिहार जैसे राज्य में पूर्ण शराबबंदी संभव हो सकती है, तो उत्तर प्रदेश में क्यों नहीं?
नशा केवल एक व्यक्तिगत आदत नहीं अपितु सामाजिक विघटन की जड़ है। शराब घरों में प्रवेश करती है तो केवल शरीर को नहीं, परिवार, अर्थव्यवस्था और समाज, तीनों को भीतर से खोखला कर देती है। इसकी सबसे बड़ी कीमत महिलाएँ और बच्चे चुकाते हैं। घरेलू हिंसा, आर्थिक तंगी, बच्चों की शिक्षा में बाधा और स्वास्थ्य संकट, ये सभी शराब से जुड़ी त्रासदियाँ हैं जिनसे गाँव-कस्बों से लेकर महानगरों तक का आम परिवार जूझ रहा है।
यह याद रखना आवश्यक है कि उत्तर प्रदेश की ग्रामीण और शहरी संरचना में शराब ने किस तरह जगह बनाई है। मजदूरी का बड़ा हिस्सा नशे में बह जाता है। कर्ज बढ़ता है, घर बिकते हैं और पीढ़ियाँ अभाव में पलती हैं। जिन हाथों को श्रम और सृजन में लगना चाहिए, वे बोतल के सहारे निष्क्रिय होते चले जाते हैं। यह केवल व्यक्ति की हार नहीं, व्यवस्था की विफलता भी है।
इतिहास गवाह है कि जब भी समाज पर किसी लत ने हावी होकर घरों को उजाड़ा है, राज्य ने हस्तक्षेप किया है। एक समय था जब लॉटरी का प्रचलन तेजी से बढ़ा। परिवार बर्बाद हो रहे थे, मेहनत की कमाई दांव पर लग रही थी। तब इच्छाशक्ति दिखाई गई और लॉटरी पर प्रतिबंध लगा। आज वही प्रश्न शराब को लेकर भी उठता है- क्या इच्छाशक्ति का अभाव है या निर्णय लेने के साहस में कमी?
बिहार ने वर्ष 2016 में पूर्ण शराबबंदी का निर्णय लिया। यह निर्णय आसान नहीं था। प्रशासनिक चुनौतियाँ थीं, राजस्व का सवाल था, विरोध की आशंका थी। फिर भी सरकार ने सामाजिक हित को प्राथमिकता दी। शुरुआती कठिनाइयों के बावजूद महिलाओं के जीवन में आए बदलावों ने यह स्पष्ट किया कि नशामुक्ति केवल कानून नहीं, सामाजिक सुधार का औज़ार है। शराबबंदी के बाद घरेलू हिंसा के मामलों में कमी, बचत में वृद्धि और बच्चों की शिक्षा पर बढ़ता ध्यान, ये बदलाव किसी भी नीति की सफलता के प्रमाण होते हैं। यह दिखाता है कि जब राज्य सामाजिक संरचना को मजबूत करने का निर्णय लेता है तो उसका दूरगामी सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
उत्तर प्रदेश में भी ऐसी ही अपेक्षा की जाती है। यहाँ की जनसंख्या, भूगोल और सामाजिक विविधता को देखते हुए निर्णय और भी साहसिक होगा। उत्तर प्रदेश केवल एक राज्य नहीं, दिशा देने वाला केंद्र है। यहाँ लिया गया निर्णय देशव्यापी विमर्श को प्रभावित करता है। यहाँ नेतृत्व की भूमिका निर्णायक हो जाती है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने शासन में कई कठोर और असहज निर्णय लेकर यह सिद्ध किया है कि राजनीतिक इच्छाशक्ति हो तो बदलाव संभव है। कानून-व्यवस्था, माफिया विरोधी अभियान और अवैध गतिविधियों पर नियंत्रण, इन क्षेत्रों में लिए गए फैसले बताते हैं कि समाजहित में सख्ती से पीछे नहीं हटना उनकी पहचान है। ऐसे में नशामुक्ति की दिशा में निर्णायक पहल करना उनके नेतृत्व के नैतिक विस्तार के रूप में देखा जाएगा। यह निर्णय केवल प्रशासनिक ही नहीं अपितु सामाजिक और ऐतिहासिक भी होगा।
यह तर्क अक्सर दिया जाता है कि शराब से मिलने वाला राजस्व राज्य की अर्थव्यवस्था के लिए आवश्यक है। परंतु यह आधा सच है। नशे से उत्पन्न बीमारियाँ, दुर्घटनाएँ, अपराध और पारिवारिक विघटन, इन सबकी कीमत राज्य को ही चुकानी पड़ती है। प्रश्न यह है कि क्या यह राजस्व वास्तव में लाभ है या भविष्य की कीमत पर वर्तमान की कमाई? जब इस प्रश्न को ईमानदारी से देखा जाता है तो नशामुक्ति आर्थिक बोझ नहीं, दीर्घकालिक निवेश प्रतीत होती है।
नशामुक्ति का अर्थ यह नहीं कि एक दिन में सब कुछ बदल जाए। यह एक प्रक्रिया है जिसमें चरणबद्ध क्रियान्वयन, वैकल्पिक रोजगार, जन-जागरूकता और सशक्त कानून, सबकी भूमिका होती है। शराबबंदी के साथ-साथ नशामुक्ति केंद्रों का विस्तार, परामर्श सेवाएँ और स्वयं सहायता समूहों को प्रोत्साहन आवश्यक है। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि इस लड़ाई में समाज को सरकार के साथ खड़ा होना होगा। पंचायतें, धार्मिक संस्थाएँ, स्वयंसेवी संगठन और शिक्षा संस्थान, सभी को मिलकर नशे के खिलाफ वातावरण बनाना होगा।
राम और कृष्ण की जन्मभूमि का स्मरण केवल प्रतीक नहीं, प्रेरणा है। यह स्मरण हमें याद दिलाता है कि मर्यादा और लोककल्याण के बिना विकास अधूरा है। नशामुक्ति का निर्णय केवल शराब पर प्रतिबंध नहीं अपितु पीढ़ियों को सुरक्षित भविष्य देने का संकल्प होगा। यह निर्णय महिलाओं के सम्मान, बच्चों की शिक्षा और परिवारों की स्थिरता से जुड़ा है। अंततः यह प्रश्न सरकार से नहीं, हम सभी से है- क्या हम नशे से होने वाली तबाही को नियति मानकर स्वीकार कर लेंगे, या उससे मुक्ति का मार्ग चुनेंगे? बिहार ने दिखाया कि यह संभव है। उत्तर प्रदेश यदि आगे बढ़ता है, तो यह केवल एक नीति नहीं, एक राष्ट्रीय संदेश होगा। आज आवश्यकता इच्छाशक्ति की है। उस इच्छाशक्ति की, जो कठिन निर्णयों से नहीं डरती, और सामाजिक हित को राजस्व से ऊपर रखती है।

Telescope Today | टेलीस्कोप टुडे Latest News & Information Portal