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पिता के किरदारों की वो 5 कहानियां, जो दिल को छू जाती हैं

मुंबई (टेलीस्कोप टुडे संवाददाता)। पिता और बच्चे का रिश्ता कभी भी पूरी तरह आसान नहीं होता। इसमें प्यार, उम्मीदें, मतभेद, त्याग और कई ऐसी बातें शामिल होती हैं, जो अक्सर कही नहीं जा पातीं। पिता हमेशा अपनी भावनाएँ खुलकर जाहिर नहीं करते, लेकिन उनकी मौजूदगी बच्चों की जिंदगी के कई अहम् पलों को आकार देती है।

समय के साथ हिंदी और गुजराती सिनेमा ने पिता और बच्चों के रिश्ते के कई अलग-अलग पहलुओं को पर्दे पर दिखाया है। कहीं पिता अपने बच्चे को छोड़ नहीं पाता, तो कहीं वह चुपचाप त्याग करता है। कहीं पीढ़ियों के बीच मतभेद दिखाई देते हैं, तो कहीं एक-दूसरे को नए तरीके से समझने की कहानी सामने आती है। ऐसी ही ५ फिल्में हैं, जो पिता और बच्चे के इस गहरे रिश्ते को दिखाती हैं और शायद आपको अपने पिता को थोड़ा अलग नजरिए से देखने का मौका भी देंगी।

जिंदगी वन्स मोर (2026)- शेमारूमी

अक्सर हमें लगता है कि हम अपने पिता को सबसे अच्छी तरह जानते हैं, लेकिन जिंदगी कभी-कभी उनका ऐसा पहलू सामने ला देती है, जिसके बारे में हमें पहले कुछ पता ही नहीं होता। ‘जिंदगी वन्स मोर’ इसी भावनात्मक सोच पर आधारित है। फिल्म एक पिता और बेटे के रिश्ते की कहानी है और दिखाती है कि जब बेटा अपने पिता को सिर्फ पिता की भूमिका से अलग एक इंसान के रूप में समझना शुरू करता है, तो क्या होता है।

धर्मा प्रोडक्शंस की गुजराती सिनेमा में पहली फिल्म ‘जिंदगी वन्स मोर’ का निर्देशन जयमिन ने किया है। सिद्धार्थ रांदेरिया ने पिता का किरदार निभाया है। उनके अभिनय में अपनापन, सहजता और हल्का हास्य देखने को मिलता है, जिससे उनका किरदार सिर्फ एक पिता नहीं, बल्कि अपनी सोच, पसंद और जिंदगी वाला एक इंसान नजर आता है।

फिल्म सिर्फ पिता और बेटे के साथ समय बिताने की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस सफर को दिखाती है जिसमें एक बेटा समझता है कि उसके पिता की जिंदगी में उसकी सोच से कहीं ज्यादा कहानी छिपी हुई है।

अब शेमारूमी पर आने वाली यह फिल्म याद दिलाती है कि कई बार माता-पिता के करीब जाने की शुरुआत उन्हें सिर्फ माता-पिता के रूप में नहीं, बल्कि एक इंसान के रूप में जानने से होती है।

पीकू (2015)- सोनी लिव

कुछ पिता सलाह देते हैं और फिर आते हैं भास्कोर बनर्जी। अमिताभ बच्चन द्वारा निभाया गया यह किरदार अपनी बात पर अड़ा रहने वाला, अलग तरह का, जरूरत से ज्यादा दखल देने वाला और लगातार अपनी बेटी से कुछ न कुछ कहने वाला है। इसके बावजूद उसे पसंद किए बिना रहना मुश्किल है।

अमिताभ बच्चन की खासियत उनका अभिनय, हाव-भाव और संवाद बोलने का अंदाज है, जो उनके कई परेशान करने वाले पलों को भी मजेदार बना देता है। वहीं दीपिका पादुकोण ने पीकू के किरदार में नाराजगी और अपनापन दोनों को बहुत अच्छे तरीके से दिखाया है।

पिता और बेटी की लगातार होने वाली नोकझोंक के बावजूद उनके रिश्ते में प्यार साफ दिखाई देता है। यही इस फिल्म को खास बनाता है। फिल्म दिखाती है कि करीबी रिश्तों में नाराजगी और प्यार एक ही समय पर मौजूद हो सकते हैं।

102 नॉट आउट (2018)- प्राइम वीडियो

अमिताभ बच्चन और ऋषि कपूर को एक साथ पर्दे पर देखना ही ‘102 नॉट आउट’ को दोबारा देखने की एक वजह है। लेकिन, फिल्म की खास बात उनके किरदारों का रिश्ता और उनकी उम्र को लेकर किया गया बदलाव है।

अमिताभ बच्चन ने 102 साल के ऐसे पिता का किरदार निभाया है, जो जिंदगी को पूरे उत्साह के साथ जीना चाहता है। वहीं, ऋषि कपूर ने उनके 75 साल के बेटे का किरदार निभाया है, जो अपनी रोजमर्रा की जिंदगी और आदतों में पूरी तरह बंध चुका है।

दोनों कलाकारों का अलग-अलग अंदाज फिल्म को मजेदार बनाता है। ऋषि कपूर की प्रतिक्रियाएँ भी उतनी ही मनोरंजक हैं, जितनी अमिताभ बच्चन की हरकतें।

फिल्म में पिता और बेटे के रिश्ते को बिल्कुल अलग तरीके से दिखाया गया है। यहाँ पिता अपने बड़े हो चुके बेटे को जिंदगी को खुलकर जीना सिखाता है।

अंग्रेजी मीडियम (2020)- जियो हॉटस्टार

कुछ अभिनय ऐसे होते हैं, जिन्हें अपनी भावनाएँ दिखाने के लिए ज्यादा शब्दों की जरूरत नहीं पड़ती। इरफान खान का ‘अंग्रेजी मीडियम’ में निभाया गया चंपक बंसल का किरदार ऐसा ही है।

एक पिता के रूप में चंपक अपनी बेटी के विदेश जाकर पढ़ाई करने के सपने को पूरा करने की कोशिश करता है। इरफान ने इस किरदार में हास्य, परेशानी, चिंता और बेटी के लिए गहरे प्यार को बहुत सहज तरीके से दिखाया है।

उनकी आँखों के हाव-भाव, रुककर बोलना और छोटी-छोटी प्रतिक्रियाएं कई बार बिना कुछ कहे ही बहुत कुछ बता देती हैं। राधिका मदान के साथ उनके दृश्यों में पिता-बेटी का रिश्ता काफी स्वाभाविक लगता है।

इरफान की खासियत यही थी कि वह एक आम पिता के किरदार को भी अपने सहज अभिनय से यादगार बना देते थे।

उड़ान (2010)- जियो हॉटस्टार

अगर बाकी फिल्मों में पिता का रिश्ता प्यार या त्याग के आसपास दिखाई देता है, तो ‘उड़ान’ में पिता और बेटे का रिश्ता ज्यादा कठिन रूप में सामने आता है। रोनित रॉय ने भैरव सिंह का किरदार निभाया है। वह सख्त और भावनाएँ कम दिखाने वाला पिता है, जो अपने बेटे के भविष्य को लेकर अपनी सोच को सही मानता है। उनका अभिनय इस किरदार को प्रभावशाली बनाता है, लेकिन उसे आसानी से पसंद किए जाने वाला किरदार नहीं बनाता।

वहीं, रजत बरमेचा ने रोहन का किरदार निभाया है, जो लिखना चाहता है, लेकिन अपने पिता की उम्मीदों के दबाव में फंसा हुआ है। दोनों किरदारों के बीच का तनाव फिल्म की भावनात्मक ताकत है। ‘उड़ान’ पिता और बेटे के रिश्ते को किसी आदर्श रूप में पेश नहीं करती, बल्कि यह सवाल सामने रखती है कि जब माता-पिता के लिए प्यार का मतलब कुछ और हो और बच्चे के लिए आजादी का मतलब कुछ और, तो उस रिश्ते पर क्या असर पड़ता है।