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भारतीय शिक्षा दिवस : शिक्षा में भारतीयता की चेतना से विकसित भारत की दिशा तक

(डॉ. अतुल कोठारी)

किसी भी राष्ट्र का भविष्य उसकी शिक्षा व्यवस्था से निर्धारित होता है। यदि शिक्षा अपनी संस्कृति, इतिहास, जीवन-मूल्यों और राष्ट्रीय दृष्टि से जुड़ी हो तो वह केवल कुशल मानव संसाधन नहीं, बल्कि चरित्रवान, उत्तरदायी और राष्ट्रनिष्ठ नागरिकों का निर्माण करती है। भारत में ऐसी ही शिक्षा व्यवस्था के निर्माण का एक महत्वपूर्ण अध्याय 02 जुलाई 2004 को प्रारंभ हुआ, जब दिल्ली में ‘शिक्षा बचाओ आंदोलन’ का शुभारंभ हुआ। इसी ऐतिहासिक दिन को आज ‘भारतीय शिक्षा दिवस’ के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया है।

उस समय एनसीईआरटी की कक्षा 6 से 12 तक की इतिहास एवं समाज विज्ञान की पाठ्यपुस्तकों में भारत के इतिहास, संस्कृति, महापुरुषों और देवी-देवताओं के संबंध में अनेक तथ्यहीन एवं आपत्तिजनक सामग्री सम्मिलित की गई थी। विद्यालयी शिक्षा के पाठ्यक्रम में व्याप्त इन विकृतियों के विरुद्ध देशभर के राष्ट्रनिष्ठ शिक्षाविदों ने यह संकल्प लिया कि “देश को बचाना है तो शिक्षा को बचाना होगा।” इसके बाद राष्ट्रव्यापी जनजागरण, धरना-प्रदर्शन, न्यायालयों में कानूनी संघर्ष और व्यापक बौद्धिक विमर्श प्रारंभ हुआ। इस संघर्ष के परिणामस्वरूप शिक्षा बचाओ आंदोलन को उल्लेखनीय सफलता मिली तथा विभिन्न न्यायालयों में कुल 12 महत्वपूर्ण निर्णय आंदोलन के पक्ष में आए। सरकार को भी अपने अनेक निर्णयों में संशोधन करना पड़ा।

इस पूरे संघर्ष ने यह स्पष्ट कर दिया कि केवल पाठ्यपुस्तकों की त्रुटियों को सुधारना पर्याप्त नहीं है। आवश्यकता ऐसी शिक्षा व्यवस्था की है, जो भारतीय जीवन-दृष्टि, भारतीय ज्ञान परंपरा और भारतीय जीवन-मूल्यों पर आधारित हो। इसी सकारात्मक, वैकल्पिक और सृजनात्मक उद्देश्य से वर्ष 2007 में शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास की स्थापना हुई।

स्थापना के साथ ही न्यास ने शिक्षा के प्रत्येक क्षेत्र में भारतीय दृष्टि को स्थापित करने का कार्य प्रारंभ किया। चरित्र निर्माण एवं व्यक्तित्व के समग्र विकास, पंचकोश आधारित शिक्षा, पर्यावरण शिक्षा, वैदिक गणित, मातृभाषा आधारित शिक्षा, भारतीय ज्ञान परंपरा, शिक्षा में स्वायत्तता तथा शोध जैसे अनेक विषयों पर देशव्यापी कार्य प्रारंभ हुआ। आज विद्यालयी शिक्षा, शिक्षक शिक्षा, तकनीकी शिक्षा, प्रबंधन शिक्षा, शोध तथा उच्च शिक्षा सहित लगभग प्रत्येक क्षेत्र में न्यास भारतीयता आधारित शिक्षा के लिए निरंतर सक्रिय है।

पिछले दो दशकों में न्यास के प्रयासों से अनेक महत्वपूर्ण परिवर्तन देखने को मिले हैं। शैक्षिक पाठ्यक्रमों की विसंगतियों के विरुद्ध न्यायालयों के निर्णयों ने शिक्षा सुधार को नई दिशा दी। मध्यप्रदेश एवं छत्तीसगढ़ में पृथक राज्य पाठ्यपुस्तक मंडलों का गठन हुआ तथा झारखंड ने एनसीईआरटी की विवादित पाठ्यचर्या-2005 को लागू नहीं किया। पंचकोश आधारित शिक्षा के प्रयोगों ने अनेक विद्यालयों में आश्चर्यजनक परिणाम दिए, जिनमें आत्मानुशासन इतना विकसित हुआ कि कुछ स्थानों पर बिना पर्यवेक्षक के परीक्षाएँ सफलतापूर्वक आयोजित होने लगीं।

न्यास ने केवल पाठ्यक्रम सुधार तक स्वयं को सीमित नहीं रखा, बल्कि समाज जीवन में भी सकारात्मक परिवर्तन का अभियान चलाया। सैकड़ों शैक्षणिक संस्थानों में एकल-उपयोग प्लास्टिक का प्रयोग बंद हुआ, कार्यक्रमों में पुष्पगुच्छ और पुष्पमालाओं के स्थान पर भारतीय विकल्प अपनाए गए तथा जल संरक्षण जैसे छोटे-छोटे व्यवहारिक प्रयोगों ने शिक्षा को जीवन से जोड़ने का कार्य किया।

भारतीय भाषाओं के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय उपलब्धियाँ प्राप्त हुईं। हरियाणा सहित अनेक राज्यों में न्यायालयों में भारतीय भाषाओं के प्रयोग को बढ़ावा मिला तथा उच्चतम न्यायालय ने भी विभिन्न भारतीय भाषाओं में निर्णय उपलब्ध कराने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल की। मातृभाषा आधारित शिक्षा के लिए देशव्यापी वातावरण निर्मित हुआ और राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में इसे विशेष महत्व मिला।

शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के प्रयासों से 22 दिसंबर को राष्ट्रीय गणित दिवस तथा 21 फरवरी को अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस देशभर के शैक्षणिक संस्थानों में व्यापक जनभागीदारी के साथ मनाए जाने लगे। वैदिक गणित के क्षेत्र में अनेक विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों ने पाठ्यक्रम प्रारंभ किए तथा कई राज्य सरकारों ने इसे अपने पाठ्यक्रमों में सम्मिलित करने की दिशा में पहल की। विश्वविद्यालयों के दीक्षांत समारोहों में भारतीय वेशभूषा एवं भारतीय परंपराओं का पुनर्प्रतिष्ठान भी इसी बदलते शैक्षिक वातावरण का प्रमाण है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के निर्माण के समय भी न्यास ने भारतीयता आधारित शिक्षा के अनेक महत्वपूर्ण सुझाव सरकार के समक्ष प्रस्तुत किए, जिनमें से कई सुझाव नीति का हिस्सा बने। वर्तमान में भी न्यास राष्ट्रीय शिक्षा नीति के प्रभावी क्रियान्वयन हेतु देशभर में शिक्षक प्रशिक्षण, पाठ्यक्रम निर्माण, शोध, संवाद एवं जनजागरण के माध्यम से सतत कार्य कर रहा है।

पिछले तीन वर्षों से न्यास “भारत को भारत कहें” अभियान का संचालन भी कर रहा है। इस अभियान के समर्थन में देश के दो दर्जन से अधिक विश्वविद्यालयों एवं उच्च शिक्षण संस्थानों ने औपचारिक प्रस्ताव पारित किए हैं। साथ ही भारतीय ज्ञान परंपरा, भारतीय दर्शन एवं भारत-केंद्रित शिक्षा को विद्यालयी और उच्च शिक्षा में उचित स्थान दिलाने के लिए भी व्यापक कार्य किया जा रहा है।

इसी क्रम में शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास ने “विकसित भारत हेतु शिक्षा अभियान” प्रारंभ किया है। न्यास का स्पष्ट मत है कि यदि 2047 तक भारत को वास्तव में विकसित राष्ट्र बनाना है तो विकास का भारतीय प्रतिमान अपनाना होगा, जिसमें आर्थिक समृद्धि के साथ नैतिकता, सांस्कृतिक चेतना, आध्यात्मिक संतुलन, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक उत्तरदायित्व भी समान रूप से सम्मिलित हों। ऐसा विकसित भारत केवल उसी शिक्षा व्यवस्था से निर्मित होगा जो भारतीयता पर आधारित हो।

आज, जब हम 02 जुलाई को भारतीय शिक्षा दिवस के रूप में मना रहे हैं, तब यह केवल एक संगठन की स्थापना या एक आंदोलन की स्मृति का अवसर नहीं है। यह उस विचार का उत्सव है जिसने शिक्षा को भारत की आत्मा से जोड़ने का संकल्प लिया था। दो दशक पूर्व जो बीज ‘शिक्षा बचाओ आंदोलन’ के रूप में बोया गया था, वह आज भारतीय शिक्षा के क्षेत्र में एक विशाल वटवृक्ष बनकर सकारात्मक परिवर्तन का आधार बन चुका है।

आइए, इस भारतीय शिक्षा दिवस पर हम सभी यह संकल्प लें कि भारत-केंद्रित, मूल्यपरक, समग्र और राष्ट्रनिर्माणकारी शिक्षा व्यवस्था के निर्माण में अपनी सक्रिय भूमिका निभाएँ। यही विकसित भारत का आधार है और यही भारत को पुनः विश्व के ज्ञान-नेतृत्व की ओर ले जाने का सबसे सशक्त माध्यम भी है।

(लेखक डॉ. अतुल कोठारी शिक्षा संस्‍कृति उत्‍थान न्‍यास, नई दिल्‍ली के राष्‍ट्रीय सचिव हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)