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स्ट्रोक बन रहा है ‘साइलेंट किलर’, जागरूकता ही सबसे बड़ा बचाव

लखनऊ (टेलीस्कोप टुडे संवाददाता)। रीजेंसी हॉस्पिटल भारत में स्ट्रोक के तेजी से बढ़ते मामलों के मद्देनजर जनता के बीच जागरूकता बढ़ाने का काम कर रहा है। हॉस्पिटल स्ट्रोक के लक्षणों की जल्दी पहचान और समय पर इलाज़ पर जोर दे रहा है। आंकड़ों के अनुसार, भारत में हर 20 सेकेंड में एक स्ट्रोक होता है। हर साल 18 लाख नए स्ट्रोक के मामले देखने को मिलते हैं। इन भयावह आंकड़ों के बावजूद स्ट्रोक की रोकथाम और शुरुआती लक्षणों के बारे में जागरूकता तथा त्वरित इलाज़ की व्यवस्था बहुत कम है। जागरूकता की कमी से स्ट्रोक से विकलांगता या जान भी चली जाती है। अगर जानकारी का अभाव न हो तो इन त्रासदियों को समय रहते रोका जा सकता है। 

स्ट्रोक तब होता है जब मस्तिष्क में खून की सप्लाई रुक जाती है या बहुत कम हो जाती है। इससे मस्तिष्क की कोशिकाओं को ऑक्सीजन नहीं मिल पाती है और कोशिकाएं क्षतिग्रस्त हो जाती हैं या मर जाती हैं। यह रुकावट बोलने, चलने-फिरने, याददाश्त और तालमेल जैसे ज़रूरी कामों पर असर डाल सकती है।

स्ट्रोक मुख्य रूप से तीन तरह के होते हैं। इस्केमिक स्ट्रोक मस्तिष्क को खून पहुंचाने वाली धमनियों में रुकावट या क्लॉट के कारण होता है। हेमरेजिक स्ट्रोक कमजोर खून की नस फटने से होता है, जिससे मस्तिष्क के अंदर ब्लीडिंग होने लगती है। तीसरा ट्रांजिएंट इस्केमिक अटैक होता है। इसे अक्सर मिनी-स्ट्रोक कहा जाता है। इसमें कुछ समय के लिए रुकावट होती है। कभी कभी इससे मस्तिष्क में स्थायी नुकसान नही होता है, लेकिन यह भविष्य में होने वाले बड़े स्ट्रोक के लिए एक गंभीर चेतावनी का संकेत होता है।

स्ट्रोक के बारे में जागरूकता और जल्दी प्रतिक्रिया की आवश्यकता के बारे में टिप्पणी करते हुए रीजेंसी हॉस्पिटल लखनऊ के न्यूरोलॉजी कंसल्टेंट डॉ. सुमित वर्मा ने कहा, “स्ट्रोक सबसे ज़्यादा टाइम-क्रिटिकल मेडिकल इमरजेंसी में से एक है। इस इमरजेंसी में हर मिनट मायने रखता है। मरीज़ को जितनी जल्दी इलाज मिलेगा, उसके बचने और बिना किसी लंबे समय की विकलांगता के ठीक होने की संभावना उतनी ही ज्यादा होगी। दुर्भाग्य से बहुत से लोग या तो लक्षणों को पहचान नहीं पाते या उन्हें हल्के में लेते हैं। इस वजह से वे हॉस्पिटल पहुंचने में देरी कर देते है। रीजेंसी हॉस्पिटल लखनऊ में हम न केवल एडवांस्ड और समय पर न्यूरोलॉजिकल केयर देने के लिए समर्पित हैं, बल्कि समाज को शिक्षित करने के लिए भी प्रयासरत हैं ताकि ज़्यादा से ज़्यादा जानें बचाई जा सकें।”

उन्होंने बताया कि स्ट्रोक के शुरुआती लक्षण अक्सर अचानक दिखते हैं और इन्हें कभी भी नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए। स्ट्रोक होने पर लोगों को अचानक कमज़ोरी या सुन्नपन महसूस हो सकता है। यह लक्षण खासकर शरीर के एक तरफ ज्यादा होता है जिससे चेहरा, हाथ या पैर प्रभावित हो सकते हैं। बोलने में लड़खड़ाहट या समझने में मुश्किल हो सकती है, और कई मरीज़ों को भ्रम या ठीक से जवाब न दे पाने की दिक्कत होती है।

कुछ लोगों को चलने में परेशानी हो सकती है, चक्कर आ सकते हैं, या संतुलन और तालमेल बिगड़ सकता है। बिना किसी ज्ञात कारण के तेज़ सिरदर्द भी हेमरेजिक स्ट्रोक का संकेत हो सकता है। एक या दोनों आँखों में देखने में कमी या धुंधलापन भी स्ट्रोक का लक्षण हो सकता है। इन लक्षणों पर तुरंत मेडिकल ध्यान देने की ज़रूरत होती है, क्योंकि तुरंत इलाज से मस्तिष्क को स्थायी नुकसान से बचाया जा सकता है और रिकवरी में काफी सुधार हो सकता है।

साफ़-साफ़ दिखने वाले स्ट्रोक के लक्षण के अलावा रीजेंसी हॉस्पिटल मूक स्ट्रोक की भयावहता पर भी ज़ोर देता है क्योंकि इसमें शायद बड़े लक्षण न दिखें। लेकिन फिर भी ये मस्तिष्क के छोटे-छोटे हिस्सों को नुकसान पहुंचा सकते हैं। ये हल्के याददाश्त की समस्या, ध्यान लगाने में हल्की दिक्कत, अचानक असंतुलन, या हाथ-पैरों में हल्की कमज़ोरी के रूप में सामने आ सकते हैं। क्योंकि ये अक्सर नजरअंदाज किए जाते हैं, इसलिए साइलेंट स्ट्रोक बाद में बड़े स्ट्रोक का खतरा बढ़ा सकते हैं और नियमित न्यूरोलॉजिकल चेक-अप के महत्व को बताते हैं, खासकर उन लोगों के लिए जिन्हें हाइपरटेंशन, डायबिटीज, स्मोकिंग की आदत या दिल की बीमारी जैसे रिस्क फैक्टर हैं।

रोकथाम स्ट्रोक के खतरे को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। संतुलित आहार खाना, शारीरिक रूप से सक्रिय रहना, धूम्रपान से बचना, शराब का सेवन कम करना, ब्लड प्रेशर और डायबिटीज को मैनेज करना, और नियमित हेल्थ चेक-अप करवाने आदि से स्ट्रोक होने की संभावना काफी कम हो सकती है। जब स्ट्रोक होता है, तो तुरंत और सही इलाज बहुत ज़रूरी होता है। स्ट्रोक के प्रकार के आधार पर इलाज में खून के थक्के हटाने वाली दवाएं, क्षतिग्रस्त ब्लड वेसेल्स को ठीक करने के लिए सर्जिकल इंटरवेंशन, और मरीजों को ताकत, आज़ादी और बेहतर जीवन देने के लिए फिजियोथेरेपी, स्पीच थेरेपी और ऑक्यूपेशनल थेरेपी जैसी पूरी रिहैबिलिटेशन शामिल हो सकती है।

मरीजों की देखभाल और कम्युनिटी एजुकेशन के प्रति अपनी लगातार प्रतिबद्धता के ज़रिए  रीजेंसी हॉस्पिटल लखनऊ का मकसद लोगों को स्ट्रोक की स्थिति में तेज़ी से और ज़िम्मेदारी से काम करने के लिए ज़रूरी जानकारी देकर उन्हें सशक्त बनाना है। मेडिकल एक्सीलेंस को जागरूकता प्रयासों के साथ मिलाकर हॉस्पिटल को उम्मीद है कि वह स्ट्रोक के विनाशकारी प्रभाव को कम कर पाएगा और इस क्षेत्र में ज़्यादा जानें बचाने में मदद कर पायेगा।