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पोलियो-मुक्त भारत की सुरक्षा में न हो चूक, बच्चों को जरूर लगवाएं सभी टीके

कानपुर (टेलीस्कोप टुडे संवाददाता)। भारत में वाइल्ड पोलियोवायरस का आखिरी केस रिपोर्ट होने के 15 साल बाद भी देश का पोलियो-फ्री स्टेटस बनाए रखना एक महत्वपूर्ण पब्लिक हेल्थ प्रायोरिटी (स्वास्थ्य प्राथमिकता) बना हुआ है। हालांकि लगातार टीकाकरण की कोशिशों से लोकल ट्रांसमिशन खत्म हो गया है, लेकिन वायरस दूसरी जगहों पर फैल रहा है। इस वजह से इसके दोबारा फैलने की संभावना बनी हुई है। इस उपलब्धि को बनाए रखने की ज़रूरत पर ज़ोर देते हुए रीजेंसी हेल्थ कानपुर ने माता-पिता से यह सुनिश्चित करने की अपील की है कि उनके बच्चों को पोलियो वैक्सीन की सभी बताई गई डोज़ मिलें और वे पल्स पोलियो कैंपेन में हिस्सा लें।

भारत में वाइल्ड पोलियोवायरस का आखिरी केस 13 जनवरी 2011 को हावड़ा, पश्चिम बंगाल में रिपोर्ट किया गया था। वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइज़ेशन (WHO) साउथ-ईस्ट एशिया रीजन को 27 मार्च 2014 को पोलियो-फ्री सर्टिफ़ाई किया गया था। हालांकि अफ़गानिस्तान और पाकिस्तान में अभी भी वाइल्ड पोलियोवायरस का फैलाव जारी है। ग्लोबल पोलियो इरेडिकेशन इनिशिएटिव रिपोर्ट अपडेट के अनुसार, 30 अप्रैल तक 2026 में दुनिया भर में वाइल्ड पोलियोवायरस के 36 केस रिपोर्ट किए गए थे। वायरस का लगातार सर्कुलेशन उन देशों में भी जिन्होंने लोकल ट्रांसमिशन को खत्म कर दिया है, इसलिए वहाँ भी ज़्यादा वैक्सीनेशन कवरेज और प्रभावी सर्विलांस बनाए रखना जरूरी है।

पोलियो एक बहुत ही संक्रामक वायरल बीमारी है। यह ज़्यादातर पाँच साल से कम उम्र के बच्चों को होती है। यह ज़्यादातर मल-मुंह के रास्ते, अक्सर गंदे पानी या खाने से फैलती है, और नर्वस सिस्टम पर हमला कर सकती है। WHO के मुताबिक, पोलियो के लगभग 200 इन्फेक्शन में से एक में ऐसा पैरालिसिस हो सकता है, जिसे ठीक नहीं किया जा सकता। पैरालिसिस से पीड़ित 5 से 10% लोगों की मौत हो जाती है, क्योंकि उनकी सांस लेने वाली मांसपेशियां काम करना बंद कर देती हैं। पोलियो का कोई इलाज नहीं है। लेकिन वैक्सीनेशन से इस बीमारी और इसके ज़िंदगी भर रहने वाले गंभीर असर से बचाव किया जा सकता है।

इस उपलब्धि पर टिप्पणी करते हुए रीजेंसी हेल्थ कानपुर की पीडियाट्रिक पल्मोनोलॉजी की एसोसिएट कंसल्टेंट डॉ. अवंतिका चौहान ने कहा, “वाइल्ड पोलियोवायरस ट्रांसमिशन से मुक्त रहने में भारत की सफलता दशकों से चल रहे लगातार टीकाकरण प्रयासों और जनता की भागीदारी को दिखाती है। हालांकि वायरस का दूसरी जगहों पर लगातार फैलना यह बताता है कि हम वैक्सीनेशन कवरेज में कमी नहीं कर सकते। माता-पिता को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उनके बच्चे बताए गए टीकाकरण (इम्यूनाइज़ेशन) शेड्यूल को पूरा करें और पल्स पोलियो कैंपेन के दौरान अतिरिक्त खुराक लें। ये उपाय बच्चों को ऐसी बीमारी से बचाने के लिए ज़रूरी हैं जिससे स्थायी विकलांगता हो सकती है।”

भारत के नेशनल इम्यूनाइज़ेशन शेड्यूल के तहत बच्चों को जन्म के समय ओरल पोलियो वैक्सीन (OPV) दी जाती है, उसके बाद 6, 10 और 14 हफ़्ते में खुराक दी जाती है, और 16 से 24 महीने पर बूस्टर डोज़ (खुराक) दी जाती है। शेड्यूल में इनएक्टिवेटेड पोलियो वैक्सीन (fIPV) की फ्रैक्शनल खुराक भी शामिल होती हैं, जो 6 और 14 हफ़्ते में दी जाती हैं। माता-पिता को अपने बच्चे के वैक्सीनेशन रिकॉर्ड चेक करने चाहिए और अगर उन्हें पक्का नहीं है कि बताई गई सभी खुराक दी गई हैं या नहीं, तो उन्हें बच्चों के डॉक्टर या स्थानीय टीकाकरण केंद्र (इम्यूनाइज़ेशन सेंटर) से सलाह लेनी चाहिए।

पल्स पोलियो कैंपेन के दौरान सभी योग्य बच्चों को पोलियो की अतिरिक्त खुराक दी जाती है। यह खुराक बच्चे को पहले टीका लगा हो या नहीं, दोनों ही स्थितियों में दी जाती है। ये अतिरिक्त खुराकें बच्चों की इम्यूनिटी को मज़बूत करती हैं और नियमित टीकाकरण में मदद करती हैं। हालांकि, ये नियमित टीकाकरण की जगह नहीं लेतीं। माता-पिता को कैंपेन से जुड़ी आधिकारिक घोषणाओं पर ध्यान देना चाहिए और तय तारीखों पर अपने बच्चों को पोलियो की खुराक दिलाने के लिए ले जाना चाहिए।

अगर किसी बच्चे का शेड्यूल खुराक नहीं मिल पाई है तो माता-पिता को शेड्यूल पूरा करने के लिए सलाह के लिए बच्चों के डॉक्टर से कंसल्ट करना चाहिए या सरकारी वैक्सीनेशन सेंटर जाना चाहिए। वैक्सीनेशन रिकॉर्ड अपडेट रखने से परिवारों को छूटी हुई खुराक पहचानने में मदद मिल सकती है और यह सुनिश्चित हो सकता है कि बच्चों को उनकी उम्र के हिसाब से रिकमेंडेड सुरक्षा मिले।

पोलियो के खिलाफ भारत की उपलब्ध्ति दिखाती है कि लगातार टीकाकरण और जनता की भागीदारी से असंभव लक्ष्य को हासिल किया जा सकता है। इस कामयाबी को बनाए रखने के लिए परिवारों और हेल्थकेयर प्रोवाइडर्स को लगातार जागरूक और सतर्क रहना होगा। इससे अब तक मिली सफलता को बरकरार रखने और बच्चों को पोलियो जैसी गंभीर बीमारी से सुरक्षित रखने में मदद मिलेगी। पोलियो से बचाव संभव है, लेकिन इसका असर बच्चे की पूरी ज़िंदगी बदल सकता है।