नई दिल्ली : गणतंत्र दिवस के उपलक्ष्य में लाल किले में आयोजित ‘भारत पर्व’ के समापन समारोह के दौरान शनिवार को कर्नाटक का शास्त्रीय नृत्य, आंध्र प्रदेश का कुचिपुड़ी नृत्य और झारखंड के पारंपरिक व्यंजनों का सम्मिश्रण देखने को मिला। यह राज्यों की समृद्ध सांस्कृतिक, कलात्मक और पर्यटन विरासत का एक जीवंत प्रदर्शन रहा।पर्यटन मंत्रालय के मुताबिक यह सांस्कृतिक कार्यक्रम ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ की भावना के तहत राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की संस्कृति, पर्यटन, व्यंजन, हथकरघा और विरासत को दर्शाने वाला एक भव्य राष्ट्रीय मंच था।कर्नाटक सरकार के कन्नड़, पर्यटन एवं संस्कृति विभाग की ओर से शास्त्रीय नृत्य, संगीत और पारंपरिक लोक प्रदर्शनों का आयोजन किया गया, जिसमें कन्नड़ कलाकारों ने जीवंत प्रस्तुति देकर दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया, जो राज्य की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को दर्शाते हैं।इस अवसर पर कर्नाटक के शिवमोग्गा क्षेत्र का शक्तिशाली और लयबद्ध ढोल नृत्य डोलू कुनिथा मुख्य आकर्षण रहा। इस प्रस्तुति में शानदार यक्षगान भी शामिल था, जो तटीय कर्नाटक की एक अनूठी नृत्य-नाट्य परंपरा है और जिसका इतिहास चार शताब्दियों से अधिक पुराना है। नृत्य, संगीत, रंगमंच और तात्कालिक संवादों का सामंजस्यपूर्ण मिश्रण यक्षगान, आकर्षक वेशभूषा, भावपूर्ण मुद्राओं तथा सशक्त संगीत के माध्यम से पौराणिक कथाओं को जीवंत कर देता है। यह पारंपरिक रात्रिकालीन प्रदर्शन कला आज भी विश्वभर में कर्नाटक की सांस्कृतिक पहचान बनी हुई है।इसी दौरान आंध्र प्रदेश पवेलियन में पर्यटन प्रदर्शन, एक पारंपरिक फूड कोर्ट विषय पर आधारित और एक उत्कृष्ट हथकरघा प्रदर्शनी प्रस्तुत की गई। इसमें आगंतुकों को राज्य की ऐतिहासिक विरासत, कलात्मक परंपराओं और रचनात्मक उत्कृष्टता की एक जीवंत झलक मिली। यहां के 46 कलाकारों एक एक समूह ने भव्य कुचिपुड़ी शास्त्रीय नृत्य प्रस्तुति दी। इससे राज्य की शास्त्रीय नृत्य परंपरा की गरिमा, भव्यता और आध्यात्मिक गहराई की जीवंतता दिखाई दी। इस मौके पर सांस्कृतिक आदान-प्रदान और राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देने में इस उत्सव की भूमिका को और मजबूत किया है।इंस्टीट्यूट ऑफ होटल मैनेजमेंट(आईएचएम) रांची के स्टॉल पर देश-विदेश के आंगुतकों ने स्वादिष्ट भोजन का लुत्फ उठाया, जो झारखंड की समृद्ध कला और सांस्कृतिक विरासत में गहरी रुचि को दर्शाता है। इस प्रस्तुति ने न केवल झारखंड की पारंपरिक भोजन संस्कृति को बढ़ावा दिया, बल्कि आईएचएम रांची की कौशल विकास पहलों को भी प्रदर्शित किया।एक शेफ हरे कृष्ण चौधरी ने झारखंडी व्यंजनों की सादगी, पोषण मूल्य और सांस्कृतिक महत्व को उजागर किया और समझाया कि कैसे स्थानीय सामग्रियां और पारंपरिक खाना पकाने की तकनीकें टिकाऊ और सामुदायिक खाद्य प्रथाओं को दर्शाती हैं।इस पर्व के दौरान सांस्कृतिक प्रेमियों और विदेशी आंगतुकों की भारी भीड़ रही।
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